क्यों जरूरी हैं अरावली हमारे लिए,पढ़िए पर्यावरण विशेषज्ञ अरविंद सोनी का विशेष लेख : अरावली पर्वतमाला- वेंटिलेटर पर जीवनरेखा
20 नवंबर, 2025 को सुप्रीम कोर्ट की एक पीठ ने अरावली पर्वतमाला और पर्वत श्रृंखला की परिभाषा को लेकर एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया। अपने फैसले में पीठ ने भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला की परिभाषा के संबंध में पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) के नेतृत्व वाली समिति द्वारा की गई सिफारिशों को स्वीकार कर लिया।
उत्तर-पश्चिम भारत में फैली 692 किलोमीटर लंबी अरावली श्रृंखला के लिए ‘अरावली पहाड़ियों’ की नई परिभाषा यह निर्धारित की गई है कि ‘अरावली जिलों में स्थित कोई भी भू-आकृति, जिसकी ऊँचाई स्थानीय भू-आकृतिक स्तर (local relief) से 100 मीटर या उससे अधिक हो’। ऐसे न्यूनतम कंटूर (contour) द्वारा घिरे क्षेत्र के भीतर स्थित सम्पूर्ण भू-आकृति, जिसमें पहाड़ी, उसकी सहायक ढलानें तथा उससे जुड़ी अन्य भू-आकृतियाँ, चाहे उनका ढाल (gradient) कुछ भी हो, ‘अरावली पहाड़ियों’ का हिस्सा मानी जाएंगी। इसके अतिरिक्त, यदि दो या अधिक अरावली पहाड़ियाँ एक-दूसरे से 500 मीटर की दूरी के भीतर स्थित हों—जिस दूरी को दोनों ओर की न्यूनतम कंटूर रेखा की बाहरी सीमा के सबसे बाहरी बिंदु से मापा जाएगा—तो उन्हें मिलाकर ‘अरावली पर्वत श्रृंखला’ माना जाएगा।
एक आम व्यक्ति को इस निर्णय में कोई विशेष कमी या खामी नजर नहीं आ सकती, लेकिन पर्यावरणविदों और पर्यावरण कानून से जुड़े वकीलों के लिए यह फैसला अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि वे ही समझते हैं कि इस निर्णय को स्वीकार किए जाने के बाद किस प्रकार के गंभीर परिणाम सामने आ सकते हैं।
पीठ द्वारा ‘अरावली पहाड़ियों की समान परिभाषा’ को स्वीकार करना पहले से ही सिमटती जा रही इस भौगोलिक संरचना के लिए विनाशकारी सिद्ध हो सकता है। इसमें निम्न ऊँचाई वाली झाड़ीदार पहाड़ियाँ, घास के मैदान और रिज शामिल हैं, जिन्हें अब खनन के लिए खोला जा सकता है।
भारतीय वन सर्वेक्षण (FSI) के एक आंतरिक आकलन के अनुसार, राजस्थान में 20 मीटर या उससे अधिक ऊँचाई वाली कुल 12,081 पहाड़ियों में से केवल लगभग 1,048 पहाड़ियाँ-यानी करीब 8.7 प्रतिशत-ही 100 मीटर की ऊँचाई की शर्त को पूरा करती हैं।
इसका अर्थ यह है कि 90 प्रतिशत से अधिक अरावली पहाड़ियाँ अब अरावली की श्रेणी में नहीं आएंगी, जिससे वे खनन और निर्माण गतिविधियों के लिए संभावित रूप से खुली हो जाएंगी। इससे इन महत्वपूर्ण पारिस्थितिक तंत्रों को पिछले तीन दशकों से प्राप्त कानूनी संरक्षण समाप्त हो जाएगा, जो MoEFCC की 1992 की अरावली अधिसूचना और 2021 में राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र (NCR) योजना बोर्ड द्वारा अरावली क्षेत्रों को प्राकृतिक संरक्षण क्षेत्र घोषित किए जाने जैसी नीतियों के माध्यम से दिया गया था।

20 से 100 मीटर ऊँचाई वाली छोटी पहाड़ियों के नुकसान की कल्पना भी करना कठिन है, क्योंकि ये निचली पहाड़ियाँ प्राकृतिक पवन अवरोधक (windbreaks) के रूप में कार्य करती हैं और थार मरुस्थल की रेत और धूल को पूर्व दिशा में बहकर दिल्ली-एनसीआर सहित इंडो-गंगा के मैदानों में जाने से रोकती हैं।
अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा के कारण अधिक पहाड़ियों को खनन के नाम पर समतल कर दिया जाएगा, जिससे भारत की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखला की निरंतरता समाप्त हो जाएगी।
पिछले कुछ दशकों में पूरे अरावली क्षेत्र में जिस पैमाने पर विनाश हुआ है, उसके परिणामस्वरूप अजमेर से झुंझुनूं (राजस्थान) और दक्षिण हरियाणा के महेंद्रगढ़ जिले तक अरावली में 12 से अधिक स्थानों पर दरारें बन चुकी हैं, जिनके माध्यम से थार मरुस्थल की धूल दिल्ली-एनसीआर तक पहुंच रही है और इस क्षेत्र की प्रदूषण समस्या को और गंभीर बना रही है।
FSI की सितंबर 2025 की रिपोर्ट में इस बात पर जोर दिया गया कि “10 से 30 मीटर ऊँचाई वाली मामूली पहाड़ियाँ भी शक्तिशाली प्राकृतिक पवन अवरोधक के रूप में कार्य करती हैं” और सतह के पास रेत के लंबी दूरी तक परिवहन को प्रभावी रूप से रोकती हैं।
वास्तव में, पर्यावरण मंत्रालय के एक अधिकारी ने यह भी रेखांकित किया कि “निचली पहाड़ियाँ अत्यंत आवश्यक अवरोध हैं, और इनके हटने से वायु प्रदूषण में भारी वृद्धि होगी तथा कृषि आजीविका को गंभीर नुकसान पहुंचेगा।”
और भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि हरियाणा, राजस्थान और गुजरात के जिलों में खनन और पत्थर क्रशिंग से हुए विनाश के कारण अरावली पहाड़ियों की स्थिति अत्यंत दयनीय हो चुकी है, जो माननीय न्यायालय के लिए इस विचित्र परिभाषा को स्वीकार करने से पहले एक चेतावनी होनी चाहिए थी। हरियाणा और गुरुग्राम में अरावली की वर्तमान स्थिति बेहद चिंताजनक है। राज्य के सात अरावली जिलों में से चरखी दादरी और भिवानी जिलों में लाइसेंस प्राप्त खनन गतिविधियों ने भारत की दो अरब वर्ष पुरानी पारिस्थितिक विरासत का अधिकांश हिस्सा नष्ट कर दिया है। गुरुग्राम, नूंह और फरीदाबाद जिलों में अरावली पहाड़ियों को उस समय व्यापक रूप से लूटा गया, जब 2009 में सुप्रीम कोर्ट द्वारा खनन पर प्रतिबंध लगाए जाने से पहले वहां वैध खनन चल रहा था। हालांकि, अवैध खनन आज भी खुलेआम जारी है। महेंद्रगढ़ जिले में, जहां कई क्षेत्रों में भूजल स्तर 1,500 से 2,000 फीट तक नीचे चला गया है, वैध और अवैध दोनों प्रकार के खनन ने भारी तबाही मचाई है।
इसके बावजूद कि यह स्पष्ट संकेत मौजूद हैं कि यदि गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में अरावली पर्वतमाला में अनियंत्रित खनन की अनुमति दी गई तो क्या परिणाम होंगे, माननीय न्यायालय ने फिर भी इस विचित्र परिभाषा को स्वीकार कर लिया।
वर्तमान परिभाषा को स्वीकार किए जाने से पहले, एक दशक से अधिक समय तक FSI अरावली पहाड़ियों की पहचान के लिए 3 डिग्री ढाल (slope) के मानक का उपयोग करता रहा है। 2024 में एक तकनीकी समिति ने इन मानकों में संशोधन करते हुए निम्नलिखित विशेषताओं वाली पहाड़ियों को शामिल करने का प्रस्ताव दिया था:
– कम से कम 4.57 डिग्री की ढाल
– कम से कम 30 मीटर की ऊँचाई
इन मानकों के तहत अरावली क्षेत्र का लगभग 40 प्रतिशत हिस्सा संरक्षित हो सकता था। लेकिन आश्चर्यजनक रूप से, मंत्रालय ने अंततः सुप्रीम कोर्ट के समक्ष 100 मीटर ऊँचाई का मानक प्रस्तावित कर दिया। मंत्रालय का तर्क ऊँचाई और ढाल के आंकड़ों को भ्रामक रूप से मिलाकर प्रस्तुत करने पर आधारित था और उसने जिला-स्तरीय औसत का सहारा लिया, जो वास्तविक पहाड़ी ऊँचाइयों को प्रतिबिंबित नहीं करता। यहां तक कि मंत्रालय द्वारा सूचीबद्ध 34 अरावली जिलों में चित्तौड़गढ़ जैसे क्षेत्र को भी शामिल नहीं किया गया, जो ऊँचे अरावली शैल-उभार पर स्थित अपने किले के लिए प्रसिद्ध है, तथा सवाई माधोपुर को भी बाहर रखा गया, जहां अरावली–विंध्य संगम पर रणथंभौर टाइगर रिजर्व स्थित है।
दिल्ली, गुरुग्राम, फरीदाबाद, नोएडा और गाजियाबाद जैसे शहर पहले से ही अत्यधिक प्रदूषण से जूझ रहे हैं। अरावली क्षेत्र के और अधिक नुकसान से परिवेशीय धूल का स्तर बढ़ेगा, वायु गुणवत्ता और खराब होगी तथा चरम मौसम घटनाओं की आवृत्ति में वृद्धि होगी।
अरावली के वन घनी आबादी वाले दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र के ‘ग्रीन लंग्स’ के रूप में कार्य करते हैं- वे कार्बन डाइऑक्साइड को ऑक्सीजन में परिवर्तित करते हैं, वायुमंडलीय प्रदूषकों को रोकते हैं और शहरी तापमान को नियंत्रित करते हैं।
2018-19 तक हरियाणा के कुल क्षेत्रफल का 3,60,000 हेक्टेयर में से वनक्षेत्र का लगभग 8.2 प्रतिशत क्षरण का शिकार हो चुका हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि अरावली में खनन के कारण मरुस्थलीकरण बढ़ा है, जिससे पहाड़ियों का बड़े पैमाने पर विनाश और वन एवं हरित आवरण की भारी हानि हुई है।
हरियाणा का प्राकृतिक वन आवरण, जो उसके भूमि क्षेत्र का केवल 3.6 प्रतिशत है और पहले से ही देश में सबसे कम है, इस हालिया निर्णय के परिणामस्वरूप और घट सकता है। इसका कारण यह है कि राज्य के अधिकांश अधिसूचित वन निम्न ऊँचाई वाली पहाड़ी प्रणालियों में स्थित हैं, जो 100 मीटर की शर्त को पूरा नहीं करते।
अरावली में वन आवरण गुजरात, राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली में वर्षा को बढ़ाने और सूखे को नियंत्रित करने में सहायक होता है। अरावली पहाड़ियों के पेड़ और कैनोपी आवरण वातावरण में नमी बनाए रखते हैं, पवन की गति को नियंत्रित करते हैं और इस प्रकार वर्षा के पैटर्न को संतुलित करने में मदद करते हैं। ये वन दिल्ली-एनसीआर के लिए सुरक्षात्मक हरित फेफड़ों के रूप में भी कार्य करते हैं, जो प्रदूषकों को फंसाने, तापमान को नियंत्रित करने और समग्र जलवायु शमन में योगदान देते हैं।
अरावली पर्वतमाला एक महत्वपूर्ण जल-रीचार्ज क्षेत्र के रूप में भी कार्य करती है, क्योंकि अपक्षयित चट्टानों में मौजूद प्राकृतिक दरारें भूजल के पुनर्भरण की अनुमति देती हैं। आकलन बताते हैं कि अरावली परिदृश्य में प्रति हेक्टेयर लगभग 20 लाख लीटर भूजल पुनर्भरण की अपार क्षमता है।
692 किलोमीटर लंबे अरावली क्षेत्र के कई इलाकों में भूजल स्तर पहले ही 1,000 से 2,000 फीट तक गिर चुका है, और यदि और अधिक पहाड़ियों का खनन हुआ तो यह स्तर और नीचे जाएगा।
उत्तर-पश्चिम भारत में रहने वाले करोड़ों लोगों के लिए अरावली पर्वतमाला द्वारा प्रदान की जाने वाली महत्वपूर्ण पारिस्थितिक सेवाओं को कम करके नहीं आंका जा सकता। इसके अतिरिक्त, यह निर्णय खाद्य सुरक्षा को भी प्रभावित कर सकता है, क्योंकि दक्षिण हरियाणा और राजस्थान के अरावली क्षेत्रों में कृषि उत्पादकता पहले ही अत्यधिक खनन के कारण जल की कमी और पत्थर क्रशरों से उठने वाली धूल की परत से प्रभावित हो चुकी है, और अधिक पहाड़ियों के खनन के लिए खुलने से यह स्थिति और खराब होगी।
यह तथ्य भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि वर्तमान में अरावली के शेष वन महत्वपूर्ण वन्यजीव आवास, गलियारे और जैव-विविधता हॉटस्पॉट के रूप में कार्य करते हैं, जहां 200 से अधिक पक्षी प्रजातियां और तेंदुआ, ग्रे लंगूर, लकड़बग्घा, सियार, हनी बैजर और जंगल बिल्ली जैसे संकटग्रस्त स्तनधारी पाए जाते हैं।
अरावली पहाड़ियों की नई परिभाषा कई पहाड़ियों और वनों को समाप्त कर देगी, जिससे वन्यजीव आवास सिमटेंगे और मानव–वन्यजीव संघर्ष बढ़ेगा।
निष्कर्ष के रूप में, यह स्वीकार करना आवश्यक है कि 20 नवंबर, 2025 को दिया गया यह निर्णय इस दृष्टि से सराहनीय है कि इसने पूरी अरावली श्रृंखला में नए खनन पट्टों पर पूर्ण रोक लगाई है, लेकिन न्यायालय द्वारा समान ऊँचाई-आधारित परिभाषा को स्वीकार किया जाना अत्यंत चिंताजनक है, क्योंकि यदि इसे बिना संशोधन के लागू किया गया तो यह हजारों पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण निचली पहाड़ियों और रिज से कानूनी संरक्षण छीन लेगा। जहां खनन पर प्रतिबंध को संरक्षण की दिशा में एक बड़ी जीत माना जा रहा है, वहीं 100 मीटर ऊँचाई का नया मानदंड अभी भी एक अस्वीकार्य मापदंड है, क्योंकि यह भारत की सबसे प्राचीन पर्वतमाला के बड़े पैमाने पर विनाश का संभावित मार्ग बन सकता है।
एक पर्यावरण वकील के रूप में वर्षों तक पर्यावरण के लिए काम करने के बाद, मेरा दृढ़ विश्वास है कि ऐसे मानक उन विशाल क्षेत्रों को संरक्षण से बाहर कर देंगे जिन्हें संरक्षित किया जाना चाहिए। पर्यावरण का एक मूल सिद्धांत है-“यदि हम किसी चीज़ का सृजन नहीं कर सकते, तो हमें उसे नष्ट करने का कोई अधिकार नहीं है।”
बिंदूवार तथ्य जो जरूरी हैं हमारे लिए
अरावली की विशेषताएँ (Attributes of the Aravalli)
अरावली पर्वतमाला विश्व की सबसे प्राचीन पर्वत श्रृंखलाओं में से एक है, जो लगभग 670 किलोमीटर तक उत्तर-पश्चिम भारत में फैली हुई है। यह दिल्ली से शुरू होकर दक्षिणी हरियाणा, राजस्थान से गुजरते हुए गुजरात के अहमदाबाद तक जाती है। अरावली की सबसे ऊँची चोटी गुरु शिखर है, जिसकी ऊँचाई 1,722 मीटर (5,650 फीट) है।
अरावली पर्वतमाला थार मरुस्थल और पूर्वी राजस्थान के मैदानों व पठारों के बीच एक प्राकृतिक सीमा का कार्य करती है। यह तांबा, जस्ता, सीसा और संगमरमर जैसे खनिज संसाधनों से भी समृद्ध है।
गठन (Formation)
अरावली पर्वतमाला को पृथ्वी की सबसे प्राचीन भू-वैज्ञानिक संरचनाओं में माना जाता है, जिसकी उत्पत्ति प्रोटेरोज़ोइक युग में हुई थी।
यह अरावली–दिल्ली ऑरोजेनिक बेल्ट का हिस्सा है, जो प्रोटेरोज़ोइक काल में टेक्टोनिक प्लेटों के टकराव से बनी एक जटिल भू-वैज्ञानिक संरचना है।
यह भारतीय शील्ड का भी हिस्सा है, जिसका निर्माण कई क्रेटोनिक टक्करों से हुआ।
प्राचीन काल में अरावली पर्वत अत्यंत ऊँचे थे, लेकिन लाखों वर्षों के अपक्षय (weathering) और निरंतर खनन व खुदाई के कारण अब यह लगभग घिस चुके हैं।
अरावली पर्वतमाला का पर्यावरणीय महत्व
जैव विविधता (Biodiversity)
अरावली पर्वतमाला शुष्क पर्णपाती वनों से लेकर झाड़ीदार क्षेत्रों तक विभिन्न पारिस्थितिक तंत्रों को संजोए हुए है। यह एक जैव विविधता हॉटस्पॉट है, जहां तेंदुआ, लकड़बग्घा, लोमड़ी, विभिन्न प्रजातियों के हिरण और अनेक पक्षी प्रजातियाँ पाई जाती हैं।
जल संसाधन (Water Resources)
अरावली पर्वतमाला एक महत्वपूर्ण जल-संग्रह क्षेत्र है। बनास, साबी और लूणी जैसी कई नदियाँ अरावली से ही निकलती हैं, जो राजस्थान और गुजरात के शुष्क क्षेत्रों में कृषि और मानव उपभोग के लिए जल उपलब्ध कराती हैं।
अरावली वर्षा जल को अवशोषित कर भूजल पुनर्भरण में सहायक होती है। वास्तव में पूरे दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र में अरावली ही एकमात्र ऐसा क्षेत्र है, जहां से भूजल का पुनर्भरण होता है।
जलवायु नियमन (Climate Regulation)
अरावली पर्वतमाला उत्तर-पश्चिम भारत की जलवायु को प्रभावित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। यह थार मरुस्थल से आने वाली गर्म हवाओं के विरुद्ध अवरोध बनकर पूर्वी राजस्थान, हरियाणा और दिल्ली के मौसम को संतुलित करती है।
मानसून के दौरान अरावली बादलों को पूर्व दिशा की ओर मोड़ती है, जिससे उप-हिमालयी नदियों और उत्तरी भारत के मैदानों को लाभ होता है। सर्दियों में यह ठंडी पश्चिमी हवाओं से उपजाऊ घाटियों की रक्षा करती है।
अरावली दिल्ली-एनसीआर के “फेफड़ों” की तरह कार्य करती है और गंभीर वायु प्रदूषण के प्रभावों को कम करने में सहायक है।
अरावली पर्वतमाला का आर्थिक महत्व
खनन (Mining)
अरावली खनिजों से समृद्ध है, जिसके कारण यहां बड़े पैमाने पर खनन गतिविधियाँ होती रही हैं। राजस्थान विशेष रूप से जस्ता, सीसा, संगमरमर और अन्य खनिजों का प्रमुख उत्पादक है। इससे स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला, लेकिन खनन से पर्यावरणीय क्षरण भी गंभीर रूप से बढ़ा है।
पर्यटन (Tourism)
अरावली क्षेत्र में पर्यटन एक महत्वपूर्ण आर्थिक गतिविधि है। प्राकृतिक सौंदर्य, ऐतिहासिक किले, वन्यजीव अभयारण्य और धार्मिक स्थल हर वर्ष लाखों पर्यटकों को आकर्षित करते हैं, जिससे स्थानीय और राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था को लाभ होता है।
अरावली पर मंडराते खतरे (Threats to Aravalli)
पर्यावरणविदों का कहना है कि अरावली का विनाश अत्यंत गंभीर और दूरगामी परिणाम लेकर आएगा। इस क्षेत्र पर एक दशक से अधिक समय से अध्ययन कर रहीं पर्यावरणविद् वैशाली राणा के अनुसार,
“हर बार जब किसी पहाड़ी को विस्फोट से उड़ाया जाता है, तो हम केवल एक भौतिक संरचना ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े पूरे पारिस्थितिकी तंत्र को खो देते हैं।”
हालिया भूमि-उपयोग अध्ययनों से पता चलता है कि पहाड़ियों के लगातार विनाश के कारण जैव विविधता में भारी गिरावट, मिट्टी का क्षरण और वनस्पति आवरण में कमी आई है।
पहाड़ियों का नुकसान
1975 से 2019 के बीच अरावली की लगभग 8% (5,772.7 वर्ग किमी) पहाड़ियाँ नष्ट हो चुकी हैं। इनमें से 5% (3,676 वर्ग किमी) बंजर भूमि में और 1% (776.8 वर्ग किमी) बस्तियों में बदल गई हैं। इसके कारण थार मरुस्थल का विस्तार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र की ओर हो रहा है, जिससे मरुस्थलीकरण, प्रदूषण और अनियमित मौसम की समस्या बढ़ रही है।
खनन क्षेत्र में वृद्धि
1975 में जहां खनन क्षेत्र 1.8% था, वह 2019 में बढ़कर 2.2% हो गया। अनियंत्रित शहरीकरण और अवैध खनन अरावली के क्षरण के प्रमुख कारण हैं। राजस्थान में अरावली का 25% और 31 पर्वत श्रृंखलाएं अवैध खनन के कारण समाप्त हो चुकी हैं। खनन दिल्ली-एनसीआर में वायु प्रदूषण का एक बड़ा कारण है, विशेष रूप से श्वसनीय कण पदार्थ (RPM) के माध्यम से।
मानव बस्तियों में वृद्धि
1975 में जहां मानव बसावट 4.5% थी, वह 2019 में बढ़कर 13.3% हो गई।
वन आवरण में गिरावट
केंद्रीय अरावली क्षेत्र में 1975 से 2019 के बीच वन आवरण में 32% की गिरावट आई है। 1999 से 2019 के बीच कुल क्षेत्रफल का 0.9% वन क्षेत्र समाप्त हुआ और औसत वार्षिक वनों की कटाई दर 0.57% रही।
जल निकायों पर प्रभाव
1975 में जल निकाय 1.7% थे, जो 1989 में बढ़कर 1.9% हुए, लेकिन इसके बाद लगातार घटते गए। गहरे खनन ने जलभृतों को नुकसान पहुंचाया, झीलों को सुखा दिया और अवैध खनन से बने गड्ढों में नए जल निकाय बन गए। इससे भूजल स्तर गिर रहा है, जिसका कृषि, पशुपालन और पेयजल पर गंभीर प्रभाव पड़ेगा।
भविष्य का अनुमान
2059 तक अरावली क्षेत्र का कुल नुकसान 22% (16,360 वर्ग किमी) तक पहुंचने का अनुमान है, जिसमें से 3.5% (2,628.6 वर्ग किमी) क्षेत्र खनन के लिए उपयोग में आ सकता है।
अन्य प्रमुख चुनौतियाँ
- तेंदुआ, धारीदार लकड़बग्घा, सियार जैसी प्रजातियों सहित वनस्पति और जीव-जंतुओं में भारी गिरावट
- बनास, लूणी, साबी और साखी जैसी अरावली से निकलने वाली कई नदियों का सूख जाना
- प्राकृतिक वनों के नष्ट होने से मानव–वन्यजीव संघर्ष में वृद्धि
- अवैध खनन के कारण वनस्पति और ऊपरी मिट्टी का तेजी से नष्ट होना, जिससे उपजाऊ भूमि बंजर होती जा रही है
सुप्रीम कोर्ट के निर्णय की प्रमुख बातें
- सुप्रीम कोर्ट ने अरावली पहाड़ियों और पर्वतमालाओं की परिभाषा को लेकर पर्यावरण, वन एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) की समिति की सिफारिशों को स्वीकार किया।
- अब “अरावली पहाड़ी” वही मानी जाएगी, जो अधिसूचित अरावली जिलों में स्थित हो और स्थानीय भू-आकृतिक स्तर से कम से कम 100 मीटर ऊँची हो।
- 500 मीटर के भीतर स्थित दो या अधिक ऐसी पहाड़ियाँ मिलकर “अरावली पर्वतमाला” मानी जाएंगी।
- सुप्रीम कोर्ट ने पूरे अरावली क्षेत्र में पूर्ण खनन प्रतिबंध लगाने से इनकार किया और खनन योग्य व संरक्षण-प्रधान क्षेत्रों की पहचान के निर्देश दिए।
- जब तक सतत खनन प्रबंधन योजना (MPSM) तैयार नहीं हो जाती, तब तक नए खनन पट्टे नहीं दिए जाएंगे।
क्यों चिंताजनक है यह फैसला
- पर्यावरणविदों का मानना है कि 100 मीटर की ऊँचाई आधारित परिभाषा के कारण अरावली की अधिकांश निचली लेकिन पारिस्थितिक रूप से महत्वपूर्ण पहाड़ियाँ कानूनी संरक्षण से बाहर हो जाएंगी।
- भारतीय वन सर्वेक्षण के अनुसार, केवल 12,081 में से 1,048 पहाड़ियाँ ही इस मानक पर खरी उतरती हैं, यानी लगभग 90% अरावली क्षेत्र संरक्षण से बाहर हो सकता है।
- हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली में पहले से हुए खनन ने अरावली को गहरी क्षति पहुंचाई है और यह फैसला स्थिति को और गंभीर बना सकता है
Note : इस लेख में व्यक्त विचार लेखक के निजी विचार हैं।
लेखक के बारे में..
राजस्थान हाईकोर्ट में अधिवक्ता अरविंद सोनी को पर्यावरण कानून और खनन मामलों के विशेषज्ञ के रूप में जाना जाता है।
26 वर्षों से अधिक के कानूनी क्षेत्र के अनुभव के साथ उन्होंने सिविल, पर्यावरण और कॉमर्सियल मामलों में प्रभावी पैरवी की है।
उन्होंने बीएससी (गणित), एलएलबी और डिप्लोमा इन टैक्सेशन लॉ (DTL) की शिक्षा प्राप्त की है।
अरविंद सोनी नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल के समक्ष राजस्थान राज्य प्रदूषण नियंत्रण मंडल के लिए वरिष्ठ स्टैडिंग काउंसल हैं।
इसके अलावा वे नगर निगम जयपुर और स्टेट एनवायरोनमेंट इंपेक्ट एसेसमेंअ अथोरिटी राजस्थान के विशेष अधिवक्ता भी हैं.
उनकी कानूनी विशेषज्ञता को देखते हुए राजस्थान हाईकोर्ट ने उन्हें कई मामलों में न्यायमित्र भी नियुक्त किया हैं.