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हाईकोर्ट की पूर्व महिला जज बन सकेंगी बार काउंसिल की सदस्य, सुप्रीम कोर्ट ने Article 220 की रोक को लेकर दूर किया भ्रम

Article 220 Doesn’t Bar Former Women High Court Judges From State Bar Council Membership, Supreme Court Clarifies

नई दिल्ली। पूर्व महिला हाईकोर्ट जज अब स्टेट बार काउंसिल की सदस्य बन सकती हैं। सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि संविधान का Article 220 इसमें रोक नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि Article 220 की रोक हाईकोर्ट में दोबारा प्रैक्टिस करने पर है। इसका मतलब यह नहीं है कि पूर्व महिला जज को स्टेट बार काउंसिल की सदस्यता नहीं दी जा सकती।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि स्टेट बार काउंसिल की सदस्य बनने के बाद उन्हें संबंधित हाईकोर्ट में दोबारा प्रैक्टिस शुरू करने की जरूरत नहीं होगी।

यानी Article 220 के तहत वकालत पर लगी रोक और स्टेट बार काउंसिल की सदस्यता को अलग-अलग देखा जाएगा।

यह पूरा मामला स्टेट बार काउंसिल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए सुप्रीम कोर्ट की ओर से बनाई गई व्यवस्था से जुड़ा है।

सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही स्टेट बार काउंसिल की कुल सीटों में 30% प्रतिनिधित्व महिलाओं के लिए तय किया था। इसमें 20% सीटें चुनाव के जरिए और 10% सीटें co-option के जरिए भरने की व्यवस्था की गई है।

अब इसी व्यवस्था में co-option के जरिए शामिल की जाने वाली महिलाओं की पात्रता को लेकर सवाल उठे थे। इनमें पूर्व महिला हाईकोर्ट जजों को शामिल करने और ‘senior women members’ का मतलब क्या होगा, जैसे मुद्दे भी शामिल थे।

चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने स्टेट बार काउंसिल में महिलाओं के प्रतिनिधित्व से जुड़े मामलों की सुनवाई के दौरान इन मुद्दों पर स्थिति स्पष्ट कर दी।

Article 220 की रोक सिर्फ प्रैक्टिस पर है

सुप्रीम कोर्ट के सामने एक सवाल यह भी उठा कि अगर किसी महिला ने हाईकोर्ट की जज के तौर पर काम किया है तो क्या Article 220 की वजह से उसे स्टेट बार काउंसिल में सदस्य बनाया जा सकता है।

दरअसल Article 220 पूर्व हाईकोर्ट चीफ जस्टिस और जजों की वकालत पर रोक लगाता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इस रोक को स्टेट बार काउंसिल में co-option के रास्ते में बाधा नहीं माना जा सकता।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि बार काउंसिल की सदस्य बनने के बाद पूर्व जज को संबंधित हाईकोर्ट में फिर से प्रैक्टिस करने की जरूरत नहीं है। यानी बार काउंसिल की सदस्यता और हाईकोर्ट में वकालत करना दो अलग बातें हैं।

स्टेट बार काउंसिल में है 30% महिला प्रतिनिधित्व की व्यवस्था

यह मामला सुप्रीम कोर्ट के 8 दिसंबर 2025 के उस आदेश से जुड़ा है, जिसमें स्टेट बार काउंसिल में महिलाओं की भागीदारी सुनिश्चित करने के लिए व्यवस्था बनाई गई थी।

कोर्ट ने निर्देश दिया था कि स्टेट बार काउंसिल की कुल सीटों में 30% प्रतिनिधित्व महिलाओं का होना चाहिए। इसमें 20% सीटें चुनाव के जरिए और 10% सीटें co-option के जरिए भरी जानी हैं।

इसके बाद co-option के जरिए शामिल की जाने वाली महिलाओं को लेकर स्थिति साफ करने के लिए कोर्ट में सुझाव दिए गए। इसी प्रक्रिया के तहत 4 अगस्त 2026 के आदेश में दो कैटेगरी तय की गई थीं।

दो कैटेगरी से चुनी जाएंगी महिला सदस्य

4 अगस्त के आदेश के मुताबिक, को-ऑप्शन के जरिए चुनी जाने वाली दो महिला सदस्यों का चयन इन कैटेगरी में से किया जाना है।

पहली कैटेगरी में संबंधित हाईकोर्ट की पूर्व महिला जज होंगी। दूसरी कैटेगरी में संबंधित राज्य, राज्यों या UT की लंबे समय से वकालत कर रही वरिष्ठ महिला सदस्य होंगी।

इनमें से उपयुक्त नामों को स्टेट बार काउंसिल के निर्वाचित सदस्यों और संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की तय प्रक्रिया के तहत शॉर्टलिस्ट किया जाना है।

‘सीनियर’ का मतलब सिर्फ सीनियर एडवोकेट नहीं

सुप्रीम कोर्ट ने पूर्व महिला हाईकोर्ट जजों को शामिल करने और ‘senior women members’ शब्द का मतलब भी साफ किया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘सीनियर’ इसका मतलब सिर्फ उन महिला वकीलों से नहीं है, जिन्हें सीनियर एडवोकेट का दर्जा मिला हुआ है।

यहां सीनियर से मतलब ऐसी महिला वकील से है, जिसे लंबे समय तक वकालत का अनुभव हो और जिसे स्टेट बार काउंसिल के निर्वाचित सदस्य इस पद के लिए उपयुक्त मानें। इसके बाद संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस की प्रक्रिया के तहत नाम शॉर्टलिस्ट किया जाएगा।

चुनाव हारने वाली महिला वकील भी हो सकती हैं शामिल

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर कोई महिला वकील स्टेट बार काउंसिल का चुनाव लड़ चुकी है, लेकिन जीत नहीं पाई, तो सिर्फ इस वजह से वह co-option के लिए अयोग्य नहीं मानी जाएगी।

ऐसी महिला वकील को भी co-option के जरिए सदस्य बनाया जा सकता है।

त्रिपुरा स्टेट बार काउंसिल’ में सिर्फ एक महिला सदस्य होगी

सुप्रीम कोर्ट ने त्रिपुरा स्टेट बार काउंसिल’ के लिए अलग व्यवस्था स्पष्ट की है। यहां काउंसिल में कुल 15 सदस्य हैं। इस वजह से त्रिपुरा में दो के बजाय सिर्फ एक महिला सदस्य को co-option के जरिए शामिल किया जाएगा।

महिला भागीदारी बढ़ाने के लिए व्यवस्था जारी रहेगी

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि बार काउंसिल में महिलाओं को पर्याप्त प्रतिनिधित्व देने की यह पहल पहली बार की गई है। इसका मकसद कानूनी पेशे में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना और ज्यादा महिला वकीलों को बार काउंसिल चुनाव लड़ने के लिए प्रोत्साहित करना है।

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि आने वाले समय में संसद और एग्जीक्यूटिव अथॉरिटीज बार काउंसिल में महिलाओं के प्रतिनिधित्व के लिए अलग से उचित व्यवस्था बना सकती हैं। तब तक सुप्रीम कोर्ट की बनाई गई यह व्यवस्था लागू रहेगी।

फिलहाल, सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं के co-option से जुड़े सभी आवेदनों का निपटारा कर दिया है।

फैसले से यह भी साफ हो गया कि Article 220 किसी पूर्व हाईकोर्ट जज को स्टेट बार काउंसिल में महिला सदस्य बनाए जाने से नहीं रोकता।।

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