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विदेश यात्रा करना मौलिक अधिकार-बैंक की शिकायत पर नहीं रोकी जा सकती अनिश्चितकाल तक विदेश यात्रा, बैंक ऑफ बड़ौदा की याचिका खारिज

Bank Dues Cannot Justify Indefinite Travel Restrictions, Rajasthan HC Sets Limits on LOC

जयपुर। क्या किसी व्यक्ति पर बैंक का पैसा बकाया है तो सिर्फ इसी वजह से उसे विदेश जाने के अधिकार से रोका जा सकता है?

राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐसे ही एक मामले में अहम फैसला दिया है। कोर्ट ने कहा कि सिर्फ वित्तीय देनदारी के आधार पर किसी व्यक्ति के विदेश जाने पर अनिश्चित समय तक रोक नहीं लगाई जा सकती।

खासकर तब, जब उसके खिलाफ कोई आपराधिक मामला, FIR, आपराधिक जांच या पासपोर्ट जब्त करने की कार्रवाई लंबित न हो।

मामला बैंक ऑफ बड़ौदा की हांगकांग शाखा से जुड़े करीब 15 लाख अमेरिकी डॉलर के क्रेडिट का है। इस मामले में बैंक ने एक पर्सनल गारंटर के खिलाफ लुक आउट सर्कुलर यानी LOC जारी करवाया था। बाद में बैंक ने LOC जारी रखने की मांग की, लेकिन हाईकोर्ट ने इसे बरकरार रखने से इनकार कर दिया।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि बैंक की मांग के आधार पर एक बार खत्म हो चुकी लुक आउट सर्कुलर को सिर्फ चिट्ठी के जरिए दोबारा लागू नहीं किया जा सकता।

इसी वजह से जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस आशुतोष कुमार की डिवीजन बेंच ने बैंक ऑफ बड़ौदा की अपील खारिज कर दी। कोर्ट ने उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें गारंटर के खिलाफ जारी LOC को रद्द कर दिया गया था।

बैंक की हांगकांग शाखा से लिया था 15 लाख डॉलर का क्रेडिट

मामला बैंक ऑफ बड़ौदा की हांगकांग शाखा की ओर से दिए गए 15 लाख अमेरिकी डॉलर के क्रेडिट से जुड़ा था। इस क्रेडिट में संबंधित व्यक्ति पर्सनल गारंटर था।

लोन लेने वाली कंपनी की ओर से डिफॉल्ट होने के बाद गारंटर को हांगकांग हाईकोर्ट ने दिवालिया घोषित कर दिया। इसके बाद बैंक ने उसके खिलाफ भारत में LOC जारी करने की मांग की थी, ताकि वह देश से बाहर न जा सके।

2019 में जारी LOC की अवधि सितंबर 2020 तक थी

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखा तो सामने आया कि मेन LOC सितंबर 2019 में जारी किया गया था। इसमें साफ लिखा था कि इसकी वैधता सितंबर 2020 तक रहेगी।

इसके बाद बैंक ने LOC को आगे जारी रखने की मांग की और इसे अक्टूबर 2020 तक बढ़ाने का अनुरोध किया। लेकिन रिकॉर्ड पर ऐसा कोई आदेश या नया LOC सामने नहीं आया, जिससे यह साबित हो कि सितंबर 2020 में खत्म हो चुकी LOC को कानूनी तरीके से आगे बढ़ाया गया था।

बैंक की चिट्ठी से खत्म LOC फिर जिंदा नहीं होगी

हाईकोर्ट ने समझाया कि जब LOC की तय अवधि सितंबर 2020 में खत्म हो गई, तो उसके बाद सिर्फ बैंक की ओर से भेजी गई चिट्ठी के आधार पर उसे जारी नहीं माना जा सकता। LOC को आगे जारी रखने के लिए अलग से वैध आदेश या नई LOC जरूरी थी, जो इस मामले में रिकॉर्ड पर नहीं मिली।

बैंक की ओर से LOC को आगे जारी रखने की मांग की गई थी, लेकिन सितंबर 2020 के बाद इसे जारी रखने की कानूनी प्रक्रिया पूरी हुई हो, ऐसा रिकॉर्ड से सामने नहीं आया।

इसलिए हाईकोर्ट ने माना कि पुरानी LOC की अवधि खत्म होने के बाद उसके आधार पर विदेश यात्रा पर रोक जारी नहीं रखी जा सकती।

हाईकोर्ट ने 2021 में जारी LOC की नई गाइडलाइन को भी इस मामले में लागू नहीं माना। कोर्ट ने कहा कि बाद में आई गाइडलाइन के आधार पर पहले ही खत्म हो चुकी LOC को फिर से लागू नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने कहा-‘विदेश यात्रा करना मौलिक अधिकार’

हाईकोर्ट ने इस मामले में व्यक्ति के विदेश जाने के अधिकार को भी अहम माना। कोर्ट ने रिकॉर्ड में देखा कि संबंधित व्यक्ति के खिलाफ कोई FIR, क्रिमिनल शिकायत या जांच लंबित नहीं थी।

हाईकोर्ट ने यह भी देखा कि संबंधित व्यक्ति का पासपोर्ट जब्त करने की कोई कार्रवाई नहीं हुई थी। साथ ही रिकॉर्ड में ऐसा कोई आधार नहीं मिला, जिससे यह कहा जा सके कि उसके विदेश जाने से देश की सुरक्षा, संप्रभुता, विदेशी संबंधों, रणनीतिक हितों या आर्थिक हितों पर कोई असर पड़ेगा।

इसी आधार पर कोर्ट ने माना कि केवल वित्तीय देनदारी के कारण किसी व्यक्ति की विदेश यात्रा पर अनिश्चित समय तक रोक नहीं लगाई जा सकती।

‘बैंक की रिकवरी का रास्ता अलग है’

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया कि बैंक के पैसे की वसूली के लिए उसके पास दूसरे कानूनी रास्ते मौजूद हैं। विदेश में चल रही दिवालिया प्रक्रिया के तहत भी बैंक अपनी देनदारी की वसूली के लिए कानूनी कदम उठा सकता है।

यानी बैंक अपनी रकम की वसूली के लिए सिविल केस, रिकवरी या दिवालिया प्रक्रिया का सहारा ले सकता है। लेकिन सिर्फ बैंक की रकम बकाया होने के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चित समय तक विदेश जाने से नहीं रोका जा सकता।

LOC लगाने के लिए भी जरूरी हैं वजह और प्रक्रिया

हाईकोर्ट ने LOC को लेकर यह भी साफ किया कि किसी व्यक्ति के विदेश जाने पर रोक सिर्फ मनमाने तरीके से नहीं लगाई जा सकती। ऐसी रोक के लिए ठोस वजह और तय प्रक्रिया का पालन जरूरी है।

हाईकोर्ट ने कहा कि LOC जारी करने या उसे आगे जारी रखने के लिए उचित वजह होना जरूरी है। ऐसी पाबंदी को समय-समय पर रिव्यू भी किया जाना चाहिए और इसे जारी रखने के लिए तय प्रक्रिया का पालन भी जरूरी है।

यानी किसी व्यक्ति के खिलाफ केवल यह कहकर LOC को अनिश्चित समय तक जारी नहीं रखा जा सकता कि उसके ऊपर वित्तीय देनदारी है।

बैंक ऑफ बड़ौदा की अपील खारिज

इन सभी पहलुओं पर विचार करने के बाद जस्टिस अरुण मोंगा और जस्टिस आशुतोष कुमार की डिवीजन बेंच ने बैंक ऑफ बड़ौदा की अपील खारिज कर दी।

साथ ही कोर्ट ने कर्ज की गारंटी देने वाले व्यक्ति के खिलाफ जारी LOC रद्द करने के पहले दिए गए गए आदेश को बरकरार रखा।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि बैंक अपनी बकाया रकम की वसूली के लिए कानूनी रास्ते अपना सकता है, लेकिन सिर्फ वित्तीय देनदारी के आधार पर किसी व्यक्ति को अनिश्चित समय तक विदेश जाने से नहीं रोका जा सकता।

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