जयपुर। रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी खरीदार की इच्छा के खिलाफ उसे रिफंड लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
बिल्डर ने तय समय पर प्रोजेक्ट पूरा नहीं किया तो खरीदार के सामने सिर्फ पैसा वापस लेने का विकल्प नहीं है। वह अपनी बुक की गई दुकान का कब्जा भी मांग सकता है।
राजस्थान रियल एस्टेट अपीलेट ट्रिब्यूनल ने अलवर के जेनेसिस बाजार प्रोजेक्ट से जुड़े चार खरीदारों को बड़ी राहत देते हुए RERA अथॉरिटी का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें बिल्डर को खरीदारों की जमा रकम ब्याज सहित वापस करने का निर्देश दिया गया था।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि जब खरीदार प्रोजेक्ट से बाहर निकलने के बजाय अपनी बुक की गई दुकान का कब्जा लेना चाहता है, तो उसे रिफंड लेने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता।
रिफंड आदेश रद्द करने के साथ ही ट्रिब्यूनल ने बिल्डर को कम्प्लीशन सर्टिफिकेट लेने के बाद खरीदारों को उनकी दुकानों का कब्जा देने का निर्देश दिया है। साथ ही 10.70 फीसदी सालाना की दर से देरी का ब्याज भी देना होगा।
मामले की सुनवाई राजस्थान रियल एस्टेट अपीलेट ट्रिब्यूनल की चेयरपर्सन जस्टिस मदन गोपाल व्यास और ज्यूडिशियल मेंबर युधिष्ठिर शर्मा की बेंच ने की।
वहीं मामले में खरीदारों की ओर से अधिवक्ता दीपेंद्र यादव ने पैरवी की। उन्होंने ट्रिब्यूनल के सामने कहा कि खरीदारों ने रिफंड नहीं मांगा था, बल्कि अपनी बुक की गई दुकानों का कब्जा और देरी की अवधि का ब्याज मांगा था।
2021 में मिलना था दुकानों का कब्जा
मामला अलवर के जेनेसिस बाजार नाम के कमर्शियल प्रोजेक्ट का है। इसमें चार अलग-अलग खरीदारों ने दुकानें बुक की थीं। खरीदारों ने दुकानों की कीमत का बड़ा हिस्सा, जबकि कुछ मामलों में पूरी रकम तक बिल्डर को दे दी थी। सभी के साथ रजिस्टर्ड एग्रीमेंट भी हुए थे।
मृदुल सिंघल ने चार दुकानें बुक की थीं और करीब 90 लाख रुपये की पूरी रकम चुका दी थी। शिव दत्त गुप्ता ने एक दुकान के लिए पूरी रकम का भुगतान किया था। वहीं रवि कुमार खंडेलवाल और पूजा शर्मा व एक अन्य खरीदार ने अपनी-अपनी दुकानों के लिए तय रकम का बड़ा हिस्सा जमा किया था।
एग्रीमेंट के मुताबिक दुकानों का कब्जा 28 मार्च 2021 तक दिया जाना था। लेकिन तय समय तक खरीदारों को दुकानें नहीं मिलीं।
दो बार बढ़ी समय सीमा, फिर भी नहीं मिला कब्जा
दो बार बढ़ाई गई थी प्रोजेक्ट की समय-सीमा
प्रोजेक्ट को पूरा करने के लिए बिल्डर को RERA से दो बार समय बढ़ाया गया। पहले कब्जे की तारीख 28 मार्च 2022 तक बढ़ाई गई और इसके बाद इसे 28 मार्च 2023 तक कर दिया गया।
इसके बावजूद खरीदारों को उनकी दुकानों का कब्जा नहीं मिला। बाद में RERA पोर्टल पर प्रोजेक्ट की स्थिति “लैप्स” दिखाई गई। यानी प्रोजेक्ट के लिए RERA से मिली तय समय सीमा खत्म हो गई थी और उस अवधि में प्रोजेक्ट पूरा नहीं हो सका था।
कब्जा नहीं मिलने पर खरीदारों ने 2022 और 2024 में बिल्डर को लीगल नोटिस भेजे। उन्होंने साफ कहा कि दुकानों के लिए वे पहले ही रकम दे चुके हैं, इसलिए अब उन्हें पैसा वापस नहीं चाहिए। वे अपनी बुक की गई वही दुकानें चाहते हैं और बिल्डर से उनका कब्जा देने की मांग कर रहे थे।
RERA अथॉरिटी ने क्यों दिया था रिफंड का आदेश?
खरीदारों ने RERA में शिकायत करके कहा था कि उन्हें उनकी बुक की गई दुकानों का कब्जा दिया जाए और देरी के लिए ब्याज भी मिले। उनका कहना था कि वे प्रोजेक्ट से बाहर नहीं निकलना चाहते और अपनी दुकानों का ही कब्जा चाहते हैं।
लेकिन RERA अथॉरिटी ने 11 फरवरी 2025 को अलग फैसला लिया। अथॉरिटी ने माना कि प्रोजेक्ट की उस समय की स्थिति को देखते हुए खरीदारों को जल्द दुकान का कब्जा मिलना मुश्किल है। इसलिए दुकान देने के बजाय उनकी जमा रकम ब्याज के साथ वापस करने का आदेश दिया गया।
हालांकि बिल्डर की ओर से खरीदारों को दूसरे ब्लॉक में दुकान देने का विकल्प भी सामने आया था। लेकिन खरीदार अपनी मूल बुकिंग वाली दुकानों का कब्जा चाहते थे।
इसलिए खरीदार अथॉरिटी के इस आदेश के खिलाफ राजस्थान रियल एस्टेट अपीलेट ट्रिब्यूनल पहुंच गए। उनका कहना था कि उन्होंने रिफंड नहीं मांगा था, बल्कि अपनी दुकानों का कब्जा मांगा था।
ट्रिब्यूनल ने खरीदार की इच्छा को अहम माना
ट्रिब्यूनल ने RERA एक्ट की धारा 18 को समझाते हुए कहा कि बिल्डर तय समय पर यूनिट का कब्जा नहीं देता है तो खरीदार के पास दो रास्ते होते हैं।
ट्रिब्यूनल ने RERA एक्ट की धारा 18 को समझाते हुए कहा कि अगर बिल्डर तय समय पर दुकान का कब्जा नहीं देता है, तो खरीदार के सामने सिर्फ पैसा वापस लेने का विकल्प नहीं होता, बल्कि उसके पास दो रास्ते होते हैं।
खरीदार चाहे तो प्रोजेक्ट से बाहर निकलकर अपनी जमा रकम ब्याज और मुआवजे के साथ वापस ले सकता है। लेकिन अगर वह प्रोजेक्ट में बने रहना चाहता है, तो अपनी बुक की गई यूनिट का कब्जा मांग सकता है और देरी की अवधि का ब्याज ले सकता है।
ट्रिब्यूनल ने सुप्रीम कोर्ट के न्यूटेक प्रमोटर्स एंड डेवलपर्स के फैसले का भी हवाला दिया। इस फैसले में भी खरीदार को यह चुनाव करने का अधिकार माना गया है कि वह प्रोजेक्ट से बाहर निकलना चाहता है या अपनी यूनिट का कब्जा लेना चाहता है।
इस मामले में चारों खरीदारों ने अपनी शिकायतों में साफ तौर पर दुकानों का कब्जा मांगा था। उन्होंने रिफंड की मांग नहीं की थी।
इसलिए ट्रिब्यूनल ने कहा कि जब खरीदार खुद प्रोजेक्ट से बाहर नहीं निकलना चाहता, तो RERA अथॉरिटी उसकी जगह फैसला लेकर उसे रिफंड लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकती।
अब खरीदारों को दुकान का कब्जा और देरी का ब्याज मिलेगा
ट्रिब्यूनल ने चारों अपील स्वीकार करते हुए RERA अथॉरिटी का 11 फरवरी 2025 का रिफंड आदेश रद्द कर दिया है।
अब बिल्डर को पहले प्रोजेक्ट का कम्प्लीशन सर्टिफिकेट लेना होगा। इसके बाद संबंधित खरीदारों को उनकी बुक की गई दुकानों का कब्जा देना होगा।
इसके साथ ही बिल्डर को 28 मार्च 2021 से वैध कब्जे की पेशकश तक 10.70 फीसदी सालाना की दर से देरी का ब्याज देना होगा। हालांकि, ब्याज की गणना में कोविड के दौरान मिलने वाली 12 महीने की छूट को अलग रखा जाएगा।
यानी ट्रिब्यूनल ने साफ कर दिया कि प्रोजेक्ट में देरी होने का मतलब यह नहीं है कि खरीदार को हर हाल में पैसा वापस ही लेना होगा। अगर खरीदार अपनी बुक की गई यूनिट का कब्जा चाहता है, तो उसे उसकी यूनिट देने के साथ देरी की अवधि का ब्याज भी देना होगा।