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क्या कोई वकील अदालत में रंगीन साफा (पगड़ी) पहनकर पैरवी कर सकता है या नहीं! हाईकोर्ट में कल अहम सुनवाई

Can Lawyers Wear Colorful Safa in Court? Rajasthan High Court to Decide in Key Hearing

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट में अधिवक्ताओं की वेशभूषा से जुड़े एक महत्वपूर्ण और रोचक संवैधानिक प्रश्न पर मंगलवार को सुनवाई होने जा रही है।

मुद्दा यह है कि क्या कोई वकील अदालत में रंगीन साफा (पगड़ी) पहनकर पैरवी कर सकता है या नहीं।

इस मामले को लेकर कानूनी जगत में व्यापक चर्चा है और इसे परंपरा बनाम पेशेवर मानकों की बहस के रूप में देखा जा रहा है।

क्या हुआ था अदालत में

पिछले सप्ताह राजस्थान किराया कानून से जुड़े एक मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता किराएदार के अधिवक्ता अर्पित भूत के सहयोगी अधिवक्ता सुरेन्द्र सिंह राठौड़ पचरंगी साफा पहनकर पैरवी के लिए खड़े हुए।

इस पर जस्टिस पी.एस. भाटी ने उनसे पूछा कि वे किस प्रावधान के तहत इस वेशभूषा में अदालत में पेश हो रहे हैं।

अदालत ने अधिवक्ता को संबंधित कानूनी प्रावधान प्रस्तुत करने के निर्देश दिए। अधिवक्ता ने जवाब देने के लिए समय मांगा, जिस पर हाईकोर्ट ने मामले की अगली सुनवाई 28 अप्रैल को निर्धारित की।

मामले में मकानमालिक की ओर से अधिवक्ता नरेन्द्र थानवी और महेन्द्र थानवी उपस्थित हुए।

यह मामला कोर्ट संख्या 3 में सूचीबद्ध डी.बी. सिविल रिट-महेंद्र कुमार बनाम प्रकाश चंद के रूप में आज सुनवाई के लिए तय है।

मामले की गंभीरता को देखते हुए अदालत ने वरिष्ठ अधिवक्ताओं और अनुभवी वकीलों को न्यायालय की सहायता (अमाइकस/असिस्ट) के लिए आमंत्रित किया है, ताकि इस मुद्दे के कानूनी, सांस्कृतिक और व्यावहारिक पहलुओं पर व्यापक दृष्टिकोण सामने आ सके।

परंपरा बनाम प्रोफेशनल ड्रेस कोड

राजस्थान जैसे राज्य में साफा (पगड़ी) न केवल एक पारंपरिक परिधान है, बल्कि सम्मान और पहचान का प्रतीक भी माना जाता है।

ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या इस सांस्कृतिक पहचान को अधिवक्ताओं की वर्दी में स्थान मिल सकता है, या फिर बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के निर्धारित ड्रेस कोड के तहत इसे सीमित रखा जाएगा।

सोहनलाल सोनी की परंपरा का संदर्भ

इस बहस के बीच राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ अधिवक्ता स्वर्गीय सोहनलाल सोनी का उदाहरण भी चर्चा में है।

सोनी जी अपने विशिष्ट देसी अंदाज के लिए जाने जाते थे—वे अदालत में रंगीन साफा, धोती, बंद गले का कोट और गाउन पहनकर नियमित रूप से पैरवी करते थे।

वर्ष 1968 से वकालत शुरू कर अपने जीवनकाल (2016 तक) उन्होंने इसी वेशभूषा को अपनाए रखा, जो उनके व्यक्तित्व और परंपरा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है।

‘धोती’ पर पहले आ चुका है अहम फैसला

गौरतलब है कि इससे पहले जयपुर पीठ में भी इसी तरह का एक महत्वपूर्ण मामला सामने आया था, जिसमें यह प्रश्न उठा था कि क्या ‘धोती’ को अधिवक्ता की वर्दी का हिस्सा माना जा सकता है।

जमानत याचिका पर सुनवाई के दौरान अधिवक्ता वेदपाल शास्त्री के धोती पहनने पर सवाल खड़े किए.

इस मामले में वरिष्ठ अधिवक्ता वेद पाल शास्त्री, जो केवल हिंदी में बहस करने और पारंपरिक वेशभूषा धारण करने के लिए प्रसिद्ध हैं, केंद्र में थे।

चार दिन तक चली लंबी बहस के बाद आखिरक हाईकोर्ट ने धोती पहनकर पैरवी की अनुमति दी थी.

हाईकोर्ट ने उस प्रकरण में स्पष्ट किया था कि यदि ‘धोती’ को गरिमा और निर्धारित ड्रेस कोड के अन्य तत्वों—जैसे काला कोट, बैंड और गाउन—के साथ पहना जाए, तो यह नियमों के विरुद्ध नहीं है।

जस्टिस आर.आर. यादव द्वारा दिए गए इस फैसले को रिपोर्टेबल जजमेंट माना गया और इसे भारतीय परंपरा के सम्मान के रूप में देखा गया।

सुनवाई क्यों महत्वपूर्ण

कल की सुनवाई इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि यह तय करेगी कि अधिवक्ताओं की वेशभूषा में पारंपरिक तत्वों—जैसे रंगीन साफा-को किस हद तक स्वीकार किया जा सकता है।

यह मामला केवल एक परिधान तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पेशेवर अनुशासन, न्यायालय की गरिमा और सांस्कृतिक पहचान के बीच संतुलन का सवाल भी है।

अधिवक्ताओं से उत्सुकता

मामले की सुनवाई को लेकर अधिवक्ता समुदाय में भी उत्सुकता है। वरिष्ठ और सहयोगी अधिवक्ताओं से अपील की गई है कि वे अधिक से अधिक संख्या में उपस्थित होकर न्यायालय की सहायता करें, ताकि इस महत्वपूर्ण मुद्दे पर व्यापक और संतुलित निर्णय सामने आ सके।

संभावित प्रभाव

कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में आने वाला निर्णय भविष्य में अधिवक्ताओं के ड्रेस कोड को लेकर एक महत्वपूर्ण नजीर (precedent) बन सकता है।

यह फैसला यह भी तय करेगा कि भारतीय न्याय व्यवस्था में परंपरा और आधुनिक नियमों के बीच किस प्रकार संतुलन स्थापित किया जाए।

अब सबकी निगाहें आज की सुनवाई पर टिकी हैं, जहां यह स्पष्ट होगा कि अदालत में ‘रंगीन साफा’ केवल परंपरा का प्रतीक रहेगा या उसे कानूनी मान्यता भी मिलेगी।

इस बीच अधिवक्ताओं के बीच यह सवाल भी बेहद चर्चित हो रहा है कि यदि किसी दिन सभी अधिवक्ता एक साथ यह तय कर लें कि वे साफा पहनकर अदालत में पैरवी करेंगे, तो अदालत का दृश्य कैसा होगा?

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