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कोर्टरूम में ‘शोले’ की गूंज: नेशनल कॉन्फ्रेंस में फिल्मी क्लिप से समझाया गया हत्या, जांच और ट्रायल का पूरा विज्ञान

Cinema Meets Courtroom: ‘Sholay’ Clip Used to Explain Criminal Investigation and Trial at National Judicial Conference

चार्ली टाक, जयपुर। आमतौर पर अदालतों और न्यायिक कॉन्फ्रेंस में कानून की धाराओं, मिसालों और जटिल प्रक्रियाओं पर गंभीर विमर्श होता है। लेकिन इस बार जयपुर में रालसा की ओर से आयोजित National Cyber Safety Conference के दूसरे दिन कुछ अलग हुआ।

कॉन्फ्रेंस में सिनेमा और कानून का ऐसा संगम देखने को मिला, जिसने सभी न्यायाधीशों और न्यायिक अधिकारियों को चौंका भी दिया और सोचने पर मजबूर भी कर दिया।

देश की कालजयी फिल्म ‘शोले’ के एक दृश्य को आधार बनाकर आपराधिक जांच, एफआईआर पंजीकरण, क्षेत्राधिकार, आरोप निर्धारण, साक्ष्य प्रबंधन और ट्रायल की पूरी प्रक्रिया को समझाया गया।

यह सिर्फ एक प्रस्तुति नहीं थी-यह एक लाइव लीगल केस स्टडी थी।

फिल्म से अदालत तक: सीखने का नया तरीका

नेशनल कॉन्फ्रेंस के तीसरे सत्र को संबोधित करते हुए जस्टिस आनंद पाठक ने कहा कि आज के दौर में पारंपरिक मौखिक शिक्षण पद्धति हमेशा प्रभावी नहीं रहती।

उन्होंने स्पष्ट कहा:

“इस स्पैन ऑफ अटेंशन में आप अगर 40 मिनट ओरल टीचिंग देते हो, तो शायद उतना ग्रास्प या असिमिलेट न हो पाए। इसलिए एक फिल्म का क्लिप दिखाकर हम बता सकते हैं कि रियल टाइम अपराध क्या है, उसका इन्वेस्टिगेशन कैसे होगा और ट्रायल कैसे चलेगा।”

इस एक बयान ने पूरे कॉन्फ्रेंस के अब तक चल आ रहे पारंपरिक तरीके की दिशा बदलते हुए ‘शोले’ फिल्म के ट्रेन का सीन आपराधिक कानून की प्रयोगशाला बना दिया।

कॉन्फ्रेंस के दौरान जय—वीरू और पुलिस का वह दृश्य शामिल था जब डाकू लगातार ट्रेन का पीछा कर रहे हैं और पुलिस उन पर गोलियां चला रही हैं। इस दृश्य में ट्रेन लगातार चलती रहती है, जिससे कई स्टेशन पीछे छूटते जाते हैं।

फिल्म ‘शोले’ के ट्रेन डकैती वाले दृश्य को आधार बनाकर जस्टिस आनंद पाठक ने मौजूद सभी जजों और न्यायिक अधिकारियों से सवाल पूछा-

कि अगर ट्रेन राजस्थान से मध्य प्रदेश की सीमा पार करते हुए 50 किलोमीटर का सफर तय करती है और इस दौरान अपराध होता है, तो एफआईआर किस थाने में दर्ज होगी?

डिबेट में धौलपुर, मुरैना, भिंड और इटावा जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों का जिक्र किया गया।

इस तरह यह चर्चा केस के क्षेत्राधिकार (Jurisdiction) और जीरो पॉइंट टाइमिंग की अवधारणा पर पहुंची। जिसमें किस समय और किस स्थान पर अपराध घटित हुआ—यही तय करेगा कि: एफआईआर कहां दर्ज होगी, कौन सा थाना जांच करेगा और किस अदालत में मुकदमा चलेगा।

एक अपराध, कई धाराएं: कानून की परतें

फिल्मी दृश्य को वास्तविक अपराध मानकर यह विश्लेषण किया गया कि किन-किन धाराओं के तहत मामला दर्ज हो सकता है, जिसमें हत्या (Murder), हत्या का प्रयास (Attempt to Murder), डकैती (Dacoity), लूट (Robbery), आपराधिक साजिश (Criminal Conspiracy), आर्म्स एक्ट के उल्लंघन, रेलवे एक्ट से जुड़े अपराध और पशु क्रूरता अधिनियम के तहत मुकदमा दर्ज हो सकता है।

इस अनोखे प्रैक्टिस ने दिखाया कि एक ही घटना में कई धाराएं एक साथ लागू हो सकती हैं और जांच अधिकारी को तथ्यों के अनुरूप धाराओं का सटीक चयन करना पड़ता है।

कोर्टरूम सिमुलेशन: जांच से फैसला तक

सम्मेलन को और रोचक बनाने के लिए प्रतिभागियों को चार समूहों में विभाजित किया गया,

जिसमें जांच टीम, अभियोजन पक्ष, बचाव पक्ष, निर्णय लेखन समूह शामिल थे और इसके बाद पूरा ट्रायल क्रम समझाया गया।

इसमें जांच, चार्जशीट, आरोप निर्धारण, मुख्य परीक्षा (Examination-in-Chief), जिरह (Cross-Examination), पुनः परीक्षा, गवाहों को पुनः बुलाना, आरोपों में संशोधन, अभियुक्त का बयान और अंतिम निर्णय सब कुछ शामिल था।

फिल्म के जरिए “मिनी कोर्टरूम” का जीवंत अभ्यास किया गया।

24 घंटे में पेशी का संवैधानिक दायित्व

फिल्मी परिदृश्य में आरोपियों को मालगाड़ी से ले जाने के मामले ने एक और गंभीर मुद्दा उठाया कि क्या अभियुक्त को 24 घंटे के भीतर मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया गया?

इस मामले में संविधान और दंड प्रक्रिया संहिता की अनिवार्य शर्तों पर विस्तार से चर्चा हुई।

डिजिटल युग की चुनौती: डीपफेक और मेटाडाटा

जस्टिस पाठक ने कहा कि आज अपराध सिर्फ बंदूक और चाकू तक सीमित नहीं है। अब खतरा है: डिजिटल साक्ष्य से छेड़छाड़, चेन ऑफ कस्टडी में गड़बड़ी, डीपफेक वीडियो, फर्जी ऑडियो रिकॉर्डिंग।

उन्होंने ब्लॉकचेन तकनीक की चर्चा करते हुए बताया कि यह साक्ष्यों की प्रामाणिकता सुरक्षित रखने में मददगार हो सकती है।

जस्टिस पाठक ने मेटाडाटा विश्लेषण को भी महत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि किस समय, किस डिवाइस से, किस लोकेशन पर वीडियो या फोटो रिकॉर्ड हुआ—यह जानकारी निर्णायक हो सकती है।

क्राइम सीन की अनिवार्य वीडियोग्राफी पर जोर

सम्मेलन में यह भी चर्चा हुई कि गंभीर अपराधों में अनिवार्य वीडियोग्राफी तो है, लेकिन मानकीकृत प्रोटोकॉल नहीं है। यदि वीडियो अधूरा या गलत तरीके से बनाया गया हो तो पूरा केस कमजोर हो सकता है। इसलिए एक व्यवस्थित और राष्ट्रीय स्तर का प्रोटोकॉल बनाने की जरूरत पर बल दिया गया।

स्कूलों में कानूनी साक्षरता की बात

जस्टिस पाठक ने सुझाव दिया कि ऐसी ऑडियो-विजुअल कानूनी शिक्षा स्कूल और कॉलेज स्तर पर भी शुरू की जानी चाहिए। उन्होंने कहा:

“अगर बच्चा उस समय से उस फ्रेम ऑफ माइंड से समझेगा, तो उसे प्रक्रिया और जिम्मेदारी दोनों समझ में आएंगे।”

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