जयपुर, 8 नवंबर
जयपुर महानगर प्रथम की एडीजे कोर्ट की जज पुरवा चतुर्वेदी ने एक महत्वपूर्ण आदेश जारी करते हुए फर्जी नियुक्ति पत्र तैयार कर सरकारी नौकरी दिलाने के नाम पर ठगी करने के आरोपी की जमानत याचिका खारिज कर दी है।
केंद्र सरकार के विभाग का फर्जी नियुक्ति पत्र जारी करने जैसा गंभीर मामला होने के बावजूद पुलिस द्वारा लंबे समय तक कोई जांच नहीं करने पर कोर्ट ने जांच अधिकारी के खिलाफ सख्त टिप्पणी की।
इसके साथ ही कोर्ट ने जांच अधिकारी का मामला जयपुर पुलिस कमिश्नर को भेजकर कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं।
2015 में धोखाधड़ी, 2025 में गिरफ्तारी
टोंक निवासी आरोपी बजरंग लाल मीणा पर आरोप है कि उसने किशनलाल मीणा नामक युवक को यह कहकर झांसे में लिया कि उसकी डाक विभाग में ऊंचे अधिकारियों से पहचान है और चार लाख रुपये लेकर नौकरी लगवा देगा।
आरोपी ने जयपुर में रहकर कोचिंग कर रहे परिवादी युवक को केंद्र सरकार के डाक विभाग की ग्रामीण डाक सेवा में भर्ती का फर्जी नियुक्ति पत्र भी सौंप दिया।
बाद में जब पीड़ित और उसके पिता पत्र के सत्यापन के लिए विभाग पहुंचे, तो पता चला कि वह पत्र पूरी तरह फर्जी है।
इस मामले में 2017 में एक जीरो एफआईआर भीलवाड़ा के जहाजपुर थाने में दर्ज कि गयी.
जीरो एफआईआर को वर्ष जहाजपुर से जयपुर सांगानेर थाना को भेज दी गयी. जीरो एफआईआर के आधार पर वर्ष 2024 में जयपुर के सांगानेर थाने में धोखाधड़ी अन्य आरोपो में मामला दर्ज किया गया.
पुलिस ने दर्ज मुकदमें में आरोपी याचिकाकर्ता को 27 अक्टूबर 2025 को गिरफ्तार किया जहां से उसे न्यायिक हिरासत में भेज दिया.
सरकार का विरोध
जमानत याचिका का विरोध करते हुए लोक अभियोजक ने कहा कि “सरकारी विभाग के नियुक्ति आदेश जैसे दस्तावेज की कूटरचना करना साधारण अपराध नहीं है, यह पूरे समाज के प्रति गंभीर अपराध है। इस तरह के मामलों में जमानत देने से गलत संदेश जा सकता है।”
परिवादी ने नहीं जताई आपत्ति
सुनवाई के दौरान परिवादी पक्ष ने आरोपी को जमानत देने पर कोई आपत्ति नहीं जताई, फिर भी अदालत ने अपराध की गंभीरता को देखते हुए जमानत देने से इनकार कर दिया।
जांच अधिकारी के खिलाफ आदेश
सुनवाई के दौरान पुलिस द्वारा दी गई जानकारी और रवैये को लेकर कोर्ट ने सख्त नाराजगी जताई।
जज पुरवा चतुर्वेदी ने अपने आदेश में कहा कि जांच अधिकारी का आचरण उपेक्षापूर्ण रहा है।
कोर्ट ने जयपुर पुलिस कमिश्नर को आदेश दिया कि जांच अधिकारी की भूमिका की समीक्षा करें और “ऐसे अधिकारियों के विरुद्ध कठोर अनुशासनात्मक कार्रवाई” करें जिन्होंने इस गंभीर मामले में लापरवाही बरती है।
2017 में दर्ज केस, 2025 में गिरफ्तारी
कोर्ट ने इस बात पर हैरानी जताई कि वर्ष 2017 में दर्ज मुकदमे में आठ वर्षों तक पुलिस ने कोई अनुसंधान ही नहीं किया.
मुकदमा दर्ज होने के आठ साल बाद पुलिस ने 28 सितंबर 2025 को भारतीय डाक विभाग को पत्र लिखकर तथाकथित नियुक्ति आदेश की सत्यता के संबंध में जानकारी मांगी.
विभाग द्वारा दी गई जानकारी के अनुसार नियुक्ति आदेश फर्जी और कूटरचित पाया गया।
कोर्ट ने कहा कि 2017 में मामला दर्ज होने के साथ ही यह स्पष्ट था कि आरोपी ने कूटरचित नियुक्ति पत्र जारी किया है, लेकिन पुलिस ने आठ वर्षों तक विभाग से उसकी पुष्टि नहीं की।
जांच में गंभीर लापरवाही
कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी ने इस मुकदमे के मूल कारण — फर्जी नियुक्ति पत्र — को लेकर न तो कोई जांच की और न ही सबूत जुटाए।
डाक विभाग के स्पष्ट जवाब के बाद भी आरोपी से पूछताछ या प्रोडक्शन वारंट के लिए कोई प्रयास नहीं किया गया।
कोर्ट की सख्त टिप्पणी
जज पुरवा चतुर्वेदी ने जांच अधिकारी के खिलाफ सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि “जांच अधिकारी बिना मस्तिष्क का प्रयोग किए जांच कर रहे हैं, जो कि सब-इंस्पेक्टर रैंक का अधिकारी है। इस स्तर के अधिकारी द्वारा की गई ऐसी लापरवाही क्षम्य नहीं है।”
कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार के विभाग से जुड़ा आदेश फर्जी पाए जाने के बावजूद जांच नहीं करना गंभीर चूक है।
कोर्ट ने जयपुर पुलिस कमिश्नर को निर्देश दिया कि इस आदेश के पैरा संख्या 8 और केस डायरी का अवलोकन करें और संबंधित अधिकारी के विरुद्ध सख्त कार्रवाई करें।