जयपुर, 4 नवंबर
राजधानी जयपुर के निर्माण नगर सी-ब्लॉक में हो रहे अवैध व्यावसायिक निर्माण मामले में जयपुर महानगर प्रथम की अदालत ने जेडीए आयुक्त श्रीमती आनंदी, सचिव निशांत जैन, प्रवर्तन अधिकारी शिवनारायण यादव, राकेश मीणा और अवैध निर्माणकर्ता राजेंद्र अग्रवाल के खिलाफ जांच के आदेश दिए हैं.
जयपुर महानगर प्रथम की ACJM कोर्ट संख्या-6 की जज आकांक्षा ब्यडिवाल ने जयपुर पुलिस कमिश्नर को इस मामले की जांच करने के आदेश दिए हैं।

अधिकारियों को अदालत का नोटिस मिलने के बावजूद अवैध निर्माण नहीं रोकने पर अदालत ने इसे गंभीर मानते हुए ये आदेश जारी किए हैं।
अवैध निर्माण रहा जारी
निर्माण नगर सी-ब्लॉक की मुख्य सड़क पर हो रहे अवैध व्यावसायिक निर्माण को लेकर परिवादी निर्माण नगर विकास समिति के सदस्य प्रभात चौधरी, मुरारीलाल शर्मा और सतीश जैन ने शिकायत दी।
इस संबंध में कई बार जेडीए में शिकायतें दी गईं, किंतु कोई कार्रवाई नहीं की गई।
समिति ने इसके बाद JDA ट्रिब्यूनल में मुकदमा दायर कर निवेदन किया कि अधिकारियों की मिलीभगत से निर्माण कार्य जारी है, जिसे तत्काल रोका व ध्वस्त किया जाए।
ट्रिब्यूनल की रिपोर्ट और नोटिस
मुकदमा दायर करने पर JDA ट्रिब्यूनल द्वारा मंगाई गई रिपोर्ट में प्रवर्तन अधिकारी ने स्वीकार किया कि राजेंद्र खंडेलवाल गैर-अनुमोदित योजना में बिना स्वीकृति के बेसमेंट और ग्राउंड फ्लोर तक निर्माण कर चुका है तथा प्रथम तल का कार्य जारी है।
शिकायत के बावजूद निर्माण नहीं रोका गया और इमारत तीन मंजिला बन गई।
समिति ने अधिवक्ता पूनम चंद भंडारी के माध्यम से संबंधित अधिकारियों को कानूनी नोटिस भेजा, जिसमें हाईकोर्ट के 17 दिसंबर 2024 के फैसले — राजेंद्र बड़जात्या बनाम उत्तर प्रदेश राज्य — का हवाला देते हुए चेताया गया कि अवैध निर्माण रोकने में विफलता को कोर्ट की अवमानना माना जाएगा।
नोटिस के बाद भी कार्रवाई नहीं
कानूनी नोटिस मिलने के बाद भी जेडीए अधिकारियों ने अवैध निर्माण नहीं रोका।
शिकायतें थाना श्यामनगर और उपखंड अधिकारी तक भेजी गईं, किंतु कोई प्रभावी कदम नहीं उठाया गया।
अंततः समिति के सदस्यों — प्रभात चौधरी, मुरारी लाल शर्मा, सतीश जैन, आर.आर. मेहता और आर.के. श्रीवास्तव — ने जयपुर महानगर की एसीजेएम कोर्ट संख्या-6 में आईपीसी की धारा 210 के तहत परिवाद पेश किया।
अधिवक्ता पूनम चंद भंडारी व पंकज गुलाटी ने बहस में तर्क दिया कि जेडीए अधिकारियों की मिलीभगत से गैर-अनुमोदित भूखंड पर व्यावसायिक निर्माण जारी रहा है, जो सुप्रीम कोर्ट के आदेशों की अवमानना है।
पुलिस आयुक्त को सौंपी गई जांच
समिति के सदस्यों की ओर से दायर परिवाद और साक्ष्यों के आधार पर अदालत ने कहा कि मामला लोकसेवकों से संबंधित है, इसलिए इसकी जांच उच्च अधिकारी द्वारा की जानी चाहिए।
अदालत ने इस मामले की जांच जयपुर पुलिस कमिश्नर को तीन माह में पूर्ण कर रिपोर्ट सौंपने के आदेश दिए हैं।