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बेटे की मौत के बाद मोटर दुर्घटना मुआवज़े में आश्रित मां को अलग हिस्सा मिलेगा, परिवार को सरकारी मदद मिलने भर से मां का मुआवज़ा कम नहीं होगा: सुप्रीम कोर्ट

Dependent Mother Entitled To Separate Share In Motor Accident Compensation: Supreme Court
सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि यदि मृत सरकारी कर्मचारी की मां किसी सरकारी सहायता योजना के तहत लाभ पाने की पात्र नहीं है, तब भी उसे मोटर दुर्घटना मुआवजे में अलग और स्वतंत्र हिस्सा मिलेगा। अदालत ने आश्रित मां के अधिकार को महत्वपूर्ण बताया।

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवज़े से जुड़े एक अहम मामले में स्पष्ट किया है कि आश्रितों के अधिकारों को केवल तकनीकी आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने मोटर दुर्घटना मुआवजे से जुड़े एक अहम मामले में फैसला सुनाते हुए कहा है कि यदि किसी मृत सरकारी कर्मचारी की मां राज्य सरकार की आर्थिक सहायता योजना के तहत लाभ पाने की पात्र नहीं है, तब भी उसका मोटर दुर्घटना मुआवजे में अलग और स्वतंत्र अधिकार बना रहेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि केवल इस आधार पर आश्रित मां का मुआवजा खत्म नहीं किया जा सकता कि परिवार को किसी दूसरी सरकारी योजना के तहत आर्थिक सहायता मिल रही है।

जस्टिस विक्रम नाथ, जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय बिश्नोई की तीन सदस्यीय बेंच ने यह फैसला हरियाणा पुलिस के कांस्टेबल सचिन कुमार की मौत से जुड़े मामले में सुनाया। अदालत ने बीमा कंपनी को परिवार को बढ़ा हुआ मुआवजा देने का आदेश दिया।

कोर्ट ने विशेष रूप से यह रेखांकित किया कि एक आश्रित मां, जिसे राज्य की “करुणामूलक सहायता योजना” के तहत कोई लाभ नहीं मिलता, उसे मोटर दुर्घटना मुआवज़े में अलग हिस्सा मिलना ही चाहिए।

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किस मामले में आया फैसला?

यह मामला हरियाणा पुलिस के कांस्टेबल सचिन कुमार की मौत से जुड़ा है, जिनकी 2012 में एक सड़क दुर्घटना में मृत्यु हो गई थी। उनके परिवार में पत्नी, नाबालिग बेटी, मां और पिता थे। परिवार ने मोटर वाहन अधिनियम के तहत मुआवज़े की मांग की थी।

मोटर एक्सीडेंट क्लेम्स ट्रिब्यूनल (MACT) ने इस मामले में करीब 37.30 लाख रुपये का मुआवज़ा तय किया। हालांकि, ट्रिब्यूनल ने पिता को आश्रित नहीं माना क्योंकि वे पहले से पेंशन प्राप्त कर रहे थे।

इसके बाद बीमा कंपनी ने पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट में अपील दायर की।

हाई कोर्ट का फैसला और विवाद

मामला आगे पंजाब और हरियाणा हाई कोर्ट पहुंचा, जहां अदालत ने एक महत्वपूर्ण पहलू पर विचार किया। हाई कोर्ट ने कहा कि मृतक के परिवार को हरियाणा सरकार की 2006 की योजना के तहत आर्थिक सहायता मिलती है, जो मृत कर्मचारी की अंतिम सैलरी के बराबर होती है और 15 वर्षों तक दी जाती है।

सुप्रीम कोर्ट के एक पुराने फैसले का हवाला देते हुए हाई कोर्ट ने कहा कि इस प्रकार की सहायता को मोटर दुर्घटना मुआवज़े से घटाया जाना चाहिए, ताकि दोहरा लाभ न मिले।

इसी आधार पर हाई कोर्ट ने लगभग 29.21 लाख रुपये की कटौती कर दी और मुआवज़े की राशि घटाकर 7.70 लाख रुपये कर दी।

इसी कटौती को बाद में सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई।

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सुप्रीम कोर्ट में परिवार की दलील

परिवार की ओर से यह तर्क दिया गया कि राज्य की यह योजना एक सामाजिक सुरक्षा उपाय है और इसे मुआवज़े से घटाना अनुचित है।

सबसे महत्वपूर्ण दलील यह दी गई कि मृतक की मां को इस योजना के तहत कोई लाभ नहीं मिलता। यानी पत्नी और बच्चा इस योजना के तहत लाभार्थी हैं लेकिन मां को कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलती।

ऐसे में, यदि पूरी सहायता राशि मुआवज़े से घटा दी जाती है, तो मां का हिस्सा पूरी तरह समाप्त हो जाता है, जो न्यायसंगत नहीं है।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा ?

तीन जजों की बेंच ने मामले की विस्तार से सुनवाई की और दो महत्वपूर्ण पहलुओं पर विचार किया-

  • पहला, क्या राज्य योजना के तहत मिलने वाली सहायता को मुआवज़े से घटाया जाना चाहिए?
  • दूसरा, क्या इस कटौती के कारण किसी आश्रित का अधिकार समाप्त हो रहा है?

कोर्ट ने माना कि “डबल कम्पनसेशन” से बचने के लिए राज्य द्वारा दी गई वेतन-समान सहायता को मुआवज़े से घटाना सही है। लेकिन साथ ही अदालत ने यह भी कहा कि इस सिद्धांत को लागू करते समय यह देखना जरूरी है कि इससे किसी अन्य आश्रित के अधिकार पर असर तो नहीं पड़ रहा।

मां के अधिकार पर सुप्रीम कोर्ट की स्पष्ट राय

सुप्रीम कोर्ट ने हरियाणा की 2006 की योजना और फैमिली पेंशन नियमों का अध्ययन किया और पाया कि यदि मृतक के पीछे पत्नी और बच्चा है, तो माता-पिता इस योजना के तहत पात्र नहीं होते। इसका मतलब यह था कि मृतक की मां को कोई भी आर्थिक सहायता नहीं मिल रही थी।

कोर्ट ने कहा कि मां को भले ही राज्य योजना से लाभ न मिला हो, लेकिन बेटे की मृत्यु से उसे जो नुकसान हुआ है, वह वास्तविक और स्वतंत्र है। इसलिए उसका अधिकार खत्म नहीं किया जा सकता।

बीमा कंपनी को अनुचित लाभ से रोका

सुप्रीम कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि यदि मां को मुआवज़े से वंचित किया जाता है, तो इसका सीधा फायदा बीमा कंपनी को मिलेगा।

अदालत ने कहा कि किसी आश्रित का वैध दावा खत्म कर देना और उसके बदले बीमा कंपनी को लाभ देना “अनुचित समृद्धि” होगा, जो कानून के सिद्धांतों के खिलाफ है।

अंतिम फैसला-मुआवज़े में बढ़ोतरी

सभी तथ्यों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने मां को मुआवज़े में एक-तिहाई हिस्सा देने का आदेश दिया। कोर्ट ने कुल मुआवज़े की राशि को बढ़ाकर 7.70 लाख रुपये से 19.01 लाख रुपये कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट ने मां को लगभग 11.30 लाख रुपये का हिस्सा देने का निर्देश दिया गया। साथ ही, बीमा कंपनी को यह राशि 8 सप्ताह के भीतर अदा करने का आदेश दिया गया।

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फैसले का असर

यह फैसला मोटर दुर्घटना मुआवज़े के मामलों में एक महत्वपूर्ण मिसाल स्थापित करता है।

अब यह स्पष्ट हो गया है कि—

  • मुआवज़े की गणना करते समय हर आश्रित की पात्रता अलग-अलग देखी जाएगी।
  • राज्य योजनाओं और मुआवज़े के बीच संतुलन बनाया जाएगा।
  • किसी आश्रित के अधिकार को केवल तकनीकी आधार पर समाप्त नहीं किया जा सकता।

इस फैसले से यह भी संकेत मिलता है कि सुप्रीम कोर्ट अब केवल नियमों की व्याख्या तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सुनिश्चित कर रहा है कि न्याय का वास्तविक उद्देश्य पूरा हो।

अदालत ने यह स्पष्ट किया कि कानून का उपयोग किसी के अधिकार छीनने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें सुरक्षित करने के लिए होना चाहिए। यह निर्णय यह सुनिश्चित करता है कि भविष्य में किसी भी आश्रित को केवल इस आधार पर मुआवज़े से वंचित नहीं किया जाएगा कि वह किसी अन्य योजना का लाभार्थी नहीं है।

इस फैसले से बीमा कंपनियों द्वारा मुआवजा कम कराने की दलीलों पर भी असर पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने साफ संकेत दिया है कि केवल तकनीकी आधार पर आश्रित परिवार के अधिकार खत्म नहीं किए जा सकते।

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