जयपुर, 2 दिसंबर
राजस्थान हाईकोर्ट में एक जमानत याचिका की सुनवाई के दौरान प्रदेश में मार्बल व्यापार में करोड़ों रुपए के जीएसटी घोटाले का खुलासा हुआ है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने सुनवाई के दौरान सामने आए इस व्यापक घोटाले को “पूर्वनियोजित (premeditated) और सुव्यवस्थित तरीके से अंजाम दिया गया संगठित अपराध” बताते हुए याचिकाकर्ता आरोपी की जमानत को नामंजूर किया है।
जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने आरोपी–याचिकाकर्ता 29 वर्षीय नरेंद्र चौधरी की जमानत खारिज करते हुए कहा कि “प्राथमिक सामग्री से प्रतीत होता है कि यह व्यापक और गहरे स्तर पर फैला हुआ फर्जीवाड़ा है, जिसकी जड़ें कई राज्यों तक फैली हो सकती हैं।”
बचाव पक्ष की दलील
जीएसटी चोरी के आरोपी याचिकाकर्ता की ओर से दलील दी गई कि वह 13 अगस्त 2025 से लगभग साढ़े तीन महीने से न्यायिक अभिरक्षा में है, जबकि इस अवधि में चार्जशीट भी दाखिल हो चुकी है और उससे संबंधित वसूली भी कर ली गई है।
अधिवक्ता की ओर से कहा गया कि उसका कोई अपराध रिकॉर्ड नहीं है।
अधिवक्ता ने दलील दी कि उसके खिलाफ लगाए गए आरोप CGST Act के तहत आयुक्त के समक्ष समझौतायोग्य (compoundable) हैं।
अधिवक्ता ने यह भी कहा कि आवेदक और उसका एक सह-आरोपी जेल में हैं, जबकि मामले का मुख्य आरोपी और कथित मास्टरमाइंड पवन रेगार अब तक गिरफ्तार नहीं हुआ, जिससे विभाग की कार्रवाई “मनमानी और चुनिंदा” प्रतीत होती है।
अधिवक्ता ने परिवार के एकमात्र सहारे होने और ट्रायल में लंबा समय लगने की भी बात कही गई।
DGGI का कड़ा विरोध
हाईकोर्ट में दायर इस याचिका का डायरेक्टरेट जनरल ऑफ GST इंटेलिजेंस यानी DGGI की ओर से अधिवक्ता अक्षय भारद्वाज ने सख्त विरोध करते हुए अदालत को बताया कि यह कोई साधारण टैक्स चोरी का मामला नहीं, बल्कि बड़े स्तर का घोटाला है।
अधिवक्ता ने कहा कि अब तक की जांच में यह घोटाला 40 करोड़ रुपये की टैक्स चोरी तक पहुंच चुका है और यह आगे बहुत बड़े स्तर तक जा सकता है।
DGGI ने कोर्ट में दावा किया कि आरोपी ने 13 फर्जी फर्में गरीब और अनपढ़ लोगों के नाम पर बनाई थीं और उनकी जानकारी के बिना इन फर्मों का इस्तेमाल कर देशभर में मार्बल की अवैध आवाजाही की गई।
अधिवक्ता ने कहा कि ई-वे बिलों के माध्यम से बिना टैक्स दिए भारी मात्रा में मार्बल भेजा जाता था, जिससे बड़े पैमाने पर राजस्व नुकसान हुआ।
DGGI की ओर से कहा गया कि आरोपी गिरोह पहले फर्जी GST रजिस्ट्रेशन कर माल को बिना बिल और बिना टैक्स के चोरी-छिपे भेजते थे।
GST रिटर्न दाखिल न करके या बहुत देर से कर बड़े पैमाने पर ई-वे बिलों के जरिए अवैध परिवहन किया जाता था।
55 हजार में होती थी फर्म तैयार
अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि आरोपी 55 हजार रुपए में फर्जी फर्म तैयार करते थे।
DGGI के अधिवक्ता ने अदालत को बताया कि पवन रेगार नाम का व्यक्ति प्रति फर्म ₹55,000 लेकर फर्जी कंपनियाँ खड़ी करता था और इस पूरे नेटवर्क का मुख्य संचालक (key operator) माना जा रहा है, जो अभी फरार है।
DGGI ने कोर्ट को बताया कि दिल्ली की R&D यूनिट से इनपुट मिलने पर जब DGGI ने छापेमारी की, तो आरोपी ने कथित रूप से महत्वपूर्ण दस्तावेज को मुंह में लेकर निगलने की कोशिश की।
हाईकोर्ट का आदेश
हाईकोर्ट ने आरोपी की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए कहा कि इस स्तर पर आरोपी को जमानत नहीं दी जा सकती।
जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने मामले को गंभीर मानते हुए कहा कि जांच एजेंसी के तथ्यों से यह केस सामान्य जीएसटी उल्लंघन या प्रक्रियागत गलती का मामला नहीं है, बल्कि यह व्यापक, संगठित और देशव्यापी नेटवर्क बनाकर किए गए आर्थिक अपराध की ओर संकेत करता है।
कोर्ट ने कहा कि इस मामले में विभिन्न अदालतों के पूर्व फैसले लागू नहीं होते क्योंकि यह प्रकरण तथ्यों और गंभीरता के हर स्तर पर उनसे अलग और अधिक गंभीर है।
हाईकोर्ट ने कहा कि जांच रिकॉर्ड दर्शाता है कि गरीब मजदूरों और सीमित साधनों वाले व्यक्तियों के नाम पर करीब 13 फर्जी फर्में खड़ी की गईं, जिनका उपयोग ई-वे बिल के जरिए देशभर में बड़े पैमाने पर मार्बल व अन्य सामान की अवैध ढुलाई के लिए किया गया।
हाईकोर्ट ने इसे संगठित अपराध बताते हुए कहा कि तलाशी के दौरान आरोपी द्वारा सबूत से छेड़छाड़ के संकेत मिले-एक दस्तावेज़ को आरोपी ने मुंह में डालकर नष्ट करने का प्रयास किया—जो स्वयं अपराध की गंभीरता और उसकी मंशा को दर्शाता है।