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फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनाकर हड़पी करोड़ो की जमीन, चुरू सीजेएम कोर्ट ने सुनाई देवरानी, देवरानी पुत्र सहित 4 को जेल की सजा

चुरू, 8 सितंबर

राजस्थान के चूरू में करोड़ों की पैतृक संपत्ति हड़पने के बहुचर्चित मामले में मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट हरीश कुमार की अदालत ने ऐतिहासिक फैसला सुनाया है.

13 साल तक चली कानूनी लड़ाई के बाद, कोर्ट ने ​परिवादीया के रिश्ते में देवरानी सविता गुप्ता, देवरानी पुत्र— पुत्रवधु सहित चार आरोपियों को अलग अलग धाराओं के तहत दोषी करार देते हुए 7—7 साल के कठोर कारावास और लाखों रुपये के जुर्माने की सजा सुनाई है.

सीजेएम हरीशकुमार ने अपने फैसले में सख्त टिप्पणी करते हुए कहा हैं कि इस मामले में स्वअर्जित सपंति की मालिक जीवित रहते अपने जीवनकाल में उस संपति का लाभ नहीं ले पायी, सिर्फ इसलिए कि उसने अपने रिश्तेदारों पर भरोंसा किया.

अदालतें समाज में गलत संदेश नहीं दे सकती

सीजेएम हरीश कुमार ने अपने फैसले में कहा कि वर्तमान सामाजिक परिपेक्ष्य में संपंति की लालसा रिश्तों की मर्यादा को समाप्त करने और विश्वास का हनन करने का एक बड़ा उदाहरण हैं.

कोर्ट ने कहा कि देश में कानून का शासन है और न्याय होने के साथ दिखना भी जरूरी हैं. इस तरह के मामलों में जहां सबसे करीब रिश्तेदारों ने सपंति मालिक का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनाकर जमीन हड़पने का जो कृत्य किया हैं.

इस तरह के अपराधों में दोषियों को किसी तरह का लाभ देना कानून और व्यवस्था के प्रति गलत संदेश देना होगा.

क्या हैं मामला

मामला 2012 में शुरू हुआ था, जब उत्तरप्रदेश के मेरठ निवासी प्रतिभा गुप्ता ने अपनी ही सास पुष्पादेवी, देवरानी सविता गुप्ता, उनके बेटे नागेंद्र, और नागेंद्र के सास-ससुर योगेश कुमार और अनिता उर्फ सुनिता के खिलाफ चुरू पुलिस थाने में मामला दर्ज कराया.

ट्रायल के दौरान मामले की आरोपी और परिवादीया की सास पुष्पादेवी की मृत्यु हो गयी.

वही इस मामले में परिवादीया प्रतिभा गुप्ता की भी ट्रायल के दौरान ही मृत्यु हो गयी.

मुकदमें के अनुसार आरोपियों ने परिवादीया का फर्जी मृत्यु प्रमाण पत्र बनवाकर चुरू स्थित करोड़ो कि 2974 वर्ग मीटर की पुश्तैनी संपत्ति को हड़प लिया.

पुलिस ने इस मामले में जालसाजी, धोखाधड़ी और आपराधिक षड्यंत्र जैसी गंभीर धाराओं के तहत आरोप पत्र पेश किया था.

मुकदमें की ट्रायल के दौरान कई गवाह पक्षद्रोही हो गए. बचाव पक्ष ने गवाहों के पक्षद्रोही होने का तर्क दिया.

बचाव पक्ष ने पुलिस जांच पर भी गंभीर सवाल उठाए, जिसमें अभियुक्तों के हस्ताक्षर की फोरेंसिक जांच नहीं कराना शामिल था.

हालांकि, कोर्ट ने इन सभी तर्कों को खारिज कर दिया. अदालत ने एक महत्वपूर्ण न्यायिक सिद्धांत का उल्लेख अपने फैसले में करते हुए कहा कि “आदमी झूठ बोल सकता है, लेकिन परिस्थितियां और दस्तावेज नहीं”

कोर्ट ने कहा कि भले ही कुछ गवाह मुकर जाएं, लेकिन जब दस्तावेजी सबूत मजबूत हों, तो कोर्ट उन्हीं के आधार पर फैसला सुना सकती है.

सजा और जुर्माना

मुख्य मजिस्ट्रेट की अदालत ने चारों दोषियों को आईपीसी की अलग अलग धाराओं में सजा सुनाते हुए उन पर 14—14 लाख का जुर्माना भी लगाया हैं.

IPC की धारा 420 के तहत चारों दोषियों को 3 साल की सजा और प्रत्येक को 1—1 लाख का जुर्माना लगाया.

IPC की धारा 467 के तहत प्रत्येक दोषी को 7 साल की सजा और 7 लाख का जुर्माना।

IPC की धारा 468 के तहत प्रत्येक को 4 साल की सजा और 2 लाख का जुर्माना।

IPC की धारा 471 के तहत प्रत्येक को 5 साल की सजा और 1 लाख का जुर्माना ।

IPC की धारा 474 के तहत प्रत्येक दोषी को 5 साल की सजा और 3 लाख का जुर्माना।

सभी सजाए साथ साथ चलने से दोषियों को अधिकतम 7 साल के जेल की सजा भुगतनी होगी.

मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट चुरू की अदालत का यह फैसला उन लोगो के लिए एक कड़ा संदेश है जो फर्जी दस्तावेजों और साजिश के जरिए दूसरों की संपत्ति हड़पने का प्रयास करते हैं

सरकारी प्रयास

इस फैसले का एक बड़ा पहलू ये भी है कि मामले में जिस शिकायतकर्ता महिला के आधार पर मुकदमा दर्ज किया गया था. ट्रायल के दौरान ही उसका निधन हो गया था.

मामले में सरकारी लोक अभियोजक गोरधन सिंह कहते है कि हमारे लिए एक बड़ी चुनौती थी कि ट्रायल में गवाही होने से पूर्व ही परिवादीया प्रतिभा गुप्ता का निधन हो गया था

ट्रायल में उनके बयान नहीं हुए थे ऐसे में केवल दस्तावेजी साक्ष्य ही हमारे लिए एक उम्मीद थी.

अदालत ने इस मामले में बेहद गंभीरता दिखाई है जिस तरह से जमीन हड़पने के मामले बढ रहे है ये फैसला एक नज़ीर हैं.

गोरधन सिंह, एपीपी चुरू सीजेएम कोर्ट

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