हाईकोर्ट ने कहा-वैवाहिक विवाद के दौरान नाबालिग बच्चों की केवल कस्टडी प्राप्त करने के उद्देश्य से हैबियस कॉर्पस याचिका दायर नहीं की जा सकती
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जोधपुर मुख्यपीठ ने नाबालिग बच्चे की कस्टडी को लेकर दायर एक महत्वपूर्ण हैबियस कॉर्पस याचिका को खारिज करते हुए स्पष्ट किया है कि पिता के पास रह रहे नाबालिग बच्चे को “अवैध हिरासत” नहीं माना जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि बच्चे की कस्टडी से जुड़े विवादों के समाधान के लिए हैबियस कॉर्पस याचिका उचित उपाय नहीं है, बल्कि इसके लिए कानून में उपलब्ध अन्य वैधानिक उपाय अपनाए जाने चाहिए।
जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने मां की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए यह आदेश दिया है।
पिता के पास बच्चा
याचिकाकर्ता नीतू कुमारी ने राजस्थान हाईकोर्ट में हैबियस कॉर्पस याचिका दायर कर दावा किया कि—
याचिकाकर्ता ने आरोप लगाया कि उनका 2 वर्ष 7 माह का नाबालिग बेटा उसके पिता गोरधन के पास है और बच्चे के जीवन को खतरा है।
याचिका में कहा गया कि बच्चा निजी प्रतिवादी, जो कि बच्चे का पिता है, की अवैध हिरासत में है और उसे तत्काल मुक्त कराकर मां को सौंपा जाना चाहिए।
याचिका में दलील
याचिकाकर्ता मां की ओर से पेश अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि पति-पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद चल रहा है और इसी कारण बच्चे को मां से अलग रखा गया है।
यह भी तर्क दिया गया कि बच्चे की सुरक्षा खतरे में है, इसलिए अदालत को हस्तक्षेप करते हुए बच्चे को मां की अभिरक्षा में देने का आदेश देना चाहिए।
राज्य सरकार का पक्ष
राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता ने याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह मामला कस्टडी विवाद से संबंधित है, न कि किसी प्रकार की अवैध हिरासत से।
सरकार ने तर्क दिया कि नाबालिग बच्चे का पिता के साथ रहना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है और ऐसे मामलों में हैबियस कॉर्पस याचिका स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए।
सरकार ने अदालत को बताया कि नाबालिग बच्चा अपने पिता के साथ रह रहा है, जो कानूनन उसका प्राकृतिक अभिभावक भी है। ऐसे में इसे अवैध हिरासत नहीं कहा जा सकता।
पुलिस अधिकारियों ने भी अदालत के समक्ष अपनी स्थिति स्पष्ट की और बताया कि बच्चा किसी गैरकानूनी बंधन में नहीं है।
हाईकोर्ट का स्पष्ट रुख
दोनों पक्षों को सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि—
“जब बच्चा नाबालिग हो और अपने पिता के पास रह रहा हो, तो उसे अवैध हिरासत नहीं कहा जा सकता।”
अदालत ने माना कि पति और पत्नी के बीच वैवाहिक विवाद है और इसी कारण दोनों ही पक्ष बच्चे की कस्टडी चाहते हैं, लेकिन केवल कस्टडी प्राप्त करने के उद्देश्य से हैबियस कॉर्पस याचिका दायर नहीं की जा सकती।
कानूनी उपचार का रास्ता बताया
खंडपीठ ने कहा कि यदि मां को बच्चे की कस्टडी को लेकर कोई शिकायत है, तो उसके लिए गार्जियनशिप, फैमिली कोर्ट या अन्य सक्षम न्यायिक मंच उपलब्ध हैं।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि हैबियस कॉर्पस जैसी असाधारण संवैधानिक याचिका का उपयोग कस्टडी विवादों के निपटारे के लिए नहीं किया जाना चाहिए।
इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं को ध्यान में रखते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है।
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद हाईकोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा—
“नाबालिग बच्चा यदि अपने पिता के पास रह रहा है, तो उसे अवैध हिरासत नहीं माना जा सकता।”
खंडपीठ ने कहा कि हैबियस कॉर्पस याचिका का उद्देश्य किसी व्यक्ति को गैरकानूनी हिरासत से मुक्त कराना होता है, न कि कस्टडी विवादों का निपटारा करना।
अदालत ने यह भी कहा कि वर्तमान मामला पति-पत्नी के बीच वैवाहिक मतभेद और बच्चे की कस्टडी से जुड़ा है, जिसे हैबियस कॉर्पस के दायरे में नहीं लाया जा सकता।
कस्टडी के लिए अलग कानूनी प्रक्रिया
हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता को स्पष्ट रूप से यह भी बताया कि यदि वह बच्चे की कस्टडी चाहती हैं, तो इसके लिए कानून में अलग-अलग वैधानिक उपाय उपलब्ध हैं।
हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता गार्जियनशिप कानून के तहत याचिका या फैमिली कोर्ट में कस्टडी के लिए आवेदन कर सकती हैं। इसके साथ ही सक्षम न्यायिक मंच पर बाल हित (Welfare of Child) के आधार पर कार्यवाही कर सकती हैं।
अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में बच्चे का सर्वश्रेष्ठ हित सर्वोपरि होता है, जिसका आकलन केवल उचित साक्ष्यों और पूर्ण सुनवाई के बाद ही किया जा सकता है।
हैबियस कॉर्पस की सीमाएं स्पष्ट
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि हैबियस कॉर्पस एक असाधारण संवैधानिक उपाय है और इसका उपयोग केवल उन्हीं मामलों में किया जाना चाहिए, जहां किसी व्यक्ति की स्वतंत्रता का वास्तविक और प्रत्यक्ष उल्लंघन हो।
केवल इस आधार पर कि मां बच्चे की कस्टडी चाहती है, उसे अवैध हिरासत का मामला नहीं बनाया जा सकता।
याचिका खारिज
इन सभी तथ्यों और कानूनी पहलुओं पर विचार करते हुए हाईकोर्ट ने कहा कि याचिका में कोई दम नहीं है।
अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया कि—
हाईकोर्ट ने कहा कि हर कस्टडी विवाद को अवैध हिरासत नहीं कहा जा सकता और भावनात्मक आधार पर संवैधानिक याचिकाओं का दुरुपयोग नहीं होना चाहिए।