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कॉलेजियम की अंतिम कवायद के लिए तीनों सदस्य अगले सप्ताह जयपुर में, राजस्थान हाईकोर्ट को जल्द मिल सकते हैं नए जज

Rajasthan High Court Collegium Nears Final Decision on Judges Appointment

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट में लंबे समय से लंबित जजों की नियुक्ति प्रक्रिया अब अपने निर्णायक चरण में पहुंच गई है।

कॉलेजियम के तीनों वरिष्ठ सदस्य अगले सप्ताह जयपुर पीठ में एक साथ बैठकर अंतिम मंथन करेंगे, जिससे नए जजों की नियुक्ति का रास्ता साफ होने की पूरी संभावना है।

करीब तीन महीनों से जारी यह प्रक्रिया अब अंतिम दौर में है।

दिसंबर के तीसरे सप्ताह में पहली बार कॉलेजियम स्तर पर रिक्त पदों को भरने के लिए औपचारिक बैठक करने पर विचार हुआ था।

हालांकि शुरुआती चरण में यह कानूनी प्रश्न भी उठा कि क्या कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व में यह प्रक्रिया आगे बढ़ाई जा सकती है।

इसी दौरान देश के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत द्वारा सभी हाईकोर्टों को भेजे गए पत्र ने इस कवायद को गति दी।

पत्र में रिक्त पदों पर शीघ्र नामों की सिफारिश करने के निर्देश दिए गए थे।

बेहद जटिल है स्क्रूटनी भी

इसके बाद फरवरी में कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा ने सभी न्यायाधीशों से संभावित नामों और उनकी राय मांगी।

इस प्रक्रिया के तहत 30 से अधिक अधिवक्ताओं के नामों की एक विस्तृत सूची तैयार की गई।

लेकिन स्क्रूटनी के दौरान कई नाम बाहर हो गए। उम्र सीमा, दस्तावेजों में कमी और आयकर रिकॉर्ड में विसंगतियों के कारण आधे से अधिक नाम सूची से हट गए।

फरवरी और मार्च में कॉलेजियम के तीनों सदस्य कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा, जस्टिस पी एस भाटी और जस्टिस वीनित माथुर ने जोधपुर और जयपुर दोनों पीठों में लगातार बैठकर न केवल सुनवाई की, बल्कि चयन प्रक्रिया पर भी गहन विचार-विमर्श किया।

गौरतलब है कि हाईकोर्ट का कॉलेजियम तीन सबसे वरिष्ठतम जजों का समूह होता है, जिसमें मुख्य न्यायाधीश के बाद के दो वरिष्ठतम सदस्य शामिल होते हैं।

5 से 8 मई तक जयपुर में…

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश ने 28 अप्रैल के एक आदेश के जरिए जस्टिस पी.एस. भाटी और जस्टिस वीनित माथुर को 5 से 8 मई तक जयपुर पीठ में सुनवाई के लिए नामित किया गया है।

पिछले तीन महीनों में यह तीसरा अवसर होगा जब तीनों सदस्य जयपुर में एक साथ मौजूद रहेंगे और अंतिम निर्णय की दिशा में आगे बढ़ेंगे।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश नियमित रूप से जोधपुर मुख्यपीठ में प्रत्येक माह दो सप्ताह तक सुनवाई कर रहे हैं।

ACJ के प्रयास

वर्तमान कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा का कार्यकाल इसी वर्ष 26 सितंबर को समाप्त होने वाला है।

परंपरा के अनुसार सेवानिवृत्ति से एक माह पूर्व नीतिगत निर्णयों से दूरी बनाई जाती है, ऐसे में कॉलेजियम के पास अब लगभग चार माह का सीमित समय ही शेष है।

50 स्वीकृत पदों वाले इस हाईकोर्ट में वर्तमान में केवल 39 जज कार्यरत हैं, जिससे 11 पद रिक्त हैं और इसका सीधा असर लंबित मामलों के निस्तारण पर पड़ रहा है।

इन 11 रिक्त पदों में से एक नाम—अधिवक्ता शीतल मिर्धा—पिछले एक वर्ष से केंद्र सरकार के पास लंबित है।

ऐसे में कॉलेजियम फिलहाल 10 पदों के लिए ही सुप्रीम कोर्ट को सिफारिश भेज सकता है।

इन 10 पदों में से 5 पद न्यायिक अधिकारियों के लिए आरक्षित हैं, जबकि शेष 5 पदों के लिए अधिवक्ताओं का चयन किया जाना है।

पदों का वर्गीकरण समझिए

राजस्थान हाईकोर्ट में कुल 50 स्वीकृत पदों का विभाजन एक निश्चित अनुपात के आधार पर किया गया है।

प्रत्येक तीन अधिवक्ताओं पर एक न्यायिक अधिकारी को हाईकोर्ट जज के रूप में नियुक्त किया जाता है।

इसी आधार पर 33 पद अधिवक्ता कोटे और 17 पद न्यायिक अधिकारी कोटे के लिए निर्धारित हैं।

वर्तमान में न्यायिक अधिकारी कोटे से 12 जज कार्यरत हैं, ऐसे में इस श्रेणी से 5 और नाम भेजे जाने की संभावना है।

वहीं अधिवक्ता कोटे से 6 नामों का चयन सबसे कठिन माना जा रहा है।

चयन प्रक्रिया की जटिलता

पिछले चार महीनों में कॉलेजियम की 3-4 औपचारिक बैठकों के अलावा एक दर्जन से अधिक अनौपचारिक चर्चाएं हो चुकी हैं, जो इस चयन प्रक्रिया की जटिलता को दर्शाती हैं।

एक अहम पहलू यह भी है कि सुप्रीम कोर्ट में राजस्थान से जुड़े दो जज कार्यरत हैं, जिनका राज्य की न्यायपालिका में महत्वपूर्ण प्रभाव है। ऐसे में कॉलेजियम के लिए उनकी राय को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।

इन सभी परिस्थितियों के बीच अब कॉलेजियम अंतिम चरण में पहुंच चुका है। अगले सप्ताह जयपुर पीठ में होने वाली बैठकों के दौरान नामों पर अंतिम सहमति बनने की पूरी संभावना है।

उधर, संभावित उम्मीदवारों के बीच उत्सुकता चरम पर है।

अधिवक्ता समुदाय में प्रतिस्पर्धा तेज है और डोजियर सिस्टम भी इस प्रक्रिया में अहम भूमिका निभा रहा है। अब सभी की नजरें कॉलेजियम के अंतिम निर्णय पर टिकी हैं, जो राजस्थान की न्यायपालिका की दिशा और दशा तय करेगा।

अंकल सैम’ से दूरी बनाना बड़ी चुनौती

देश की न्यायपालिका में जजों की नियुक्ति और कॉलेजियम सिस्टम को लेकर समय-समय पर सवाल उठते रहे हैं।

सबसे प्रमुख चिंता पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर रहती है, खासकर तब जब चयन प्रक्रिया में कथित रूप से “अंकल सैम” यानी प्रभाव, सिफारिश या व्यक्तिगत संबंधों की भूमिका पर चर्चा होती है।

आलोचकों का कहना है कि कई मामलों में जजों के रिश्तेदारों, जूनियर अधिवक्ताओं या उनके करीबी लोगों के चयन को लेकर सवाल खड़े होते रहे हैं।

इससे न केवल चयन प्रक्रिया की विश्वसनीयता प्रभावित होती है, बल्कि न्यायपालिका की निष्पक्ष छवि पर भी असर पड़ता है।

हालांकि, कॉलेजियम प्रणाली का उद्देश्य योग्य और सक्षम उम्मीदवारों का चयन करना है, लेकिन इस प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी और जवाबदेह बनाने की मांग लगातार उठती रही है।

विशेषज्ञ मानते हैं कि मेरिट आधारित चयन को सुनिश्चित करने और किसी भी प्रकार के प्रभाव से दूरी बनाए रखने के लिए सख्त मानकों और स्पष्ट प्रक्रियाओं की आवश्यकता है।

ऐसे में “अंकल सैम” यानी अनौपचारिक प्रभावों से दूरी बनाना कॉलेजियम के लिए सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है, ताकि न्यायपालिका में जनता का विश्वास मजबूत बना रहे।

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