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FIR और चार्जशीट के आधार पर नहीं छिनेगा पंचायत पद, कानून में तय शर्तें जरूरी; पंचायत प्रशासक को हाईकोर्ट से राहत, पंचायती राज विभाग का हटाने का आदेश रद्द

FIR, Arrest and Chargesheet Alone Cannot Remove Panchayat Office Holder, Rajasthan HC Rules

जयपुर। केवल पुलिस के पास FIR दर्ज होने, गिरफ्तारी होने या चार्जशीट पेश हो जाने से किसी व्यक्ति को पंचायत पद से हटाया नहीं जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए अजमेर जिले की रूपनगढ़ ग्राम पंचायत के प्रशासक पद से हटाए गए इकबाल छीपा को राहत दी है।

हाईकोर्ट ने इकबाल छीपा की याचिका स्वीकार करते हुए पद से हटाने का 19 जून 2026 का आदेश रद्द कर दिया।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने कहा कि पंचायत के पद से हटाने के लिए कानून में कुछ तय शर्तें हैं और इस मामले में अभी वे शर्तें पूरी नहीं हुई थीं।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि उसके फैसले से FIR में लगाए गए आरोपों पर कोई फैसला नहीं हुआ है।

अगर आगे संबंधित कोर्ट मामले में संज्ञान लेता है और कानून के मुताबिक पद पर बने रहने की अयोग्यता की स्थिति बनती है, तो अधिकारी दोबारा कार्रवाई कर सकते हैं।

इकबाल छीपा की ओर से अधिवक्ता रवि कुमार पलसानिया ने पक्ष रखा।

उनके साथ अधिवक्ता विकास मीणा और तनिश्क गौतम ने भी पैरवी की। वहीं, राज्य सरकार की ओर से एएजी कपिल प्रकाश माथुर ने पक्ष रखा। उनकी सहायता अधिवक्ता आशुतोष उदावत और शाश्वत धनकर ने की।

गंभीर आरोपों में FIR और चार्जशीट हुई थी दाखिल

इकबाल छीपा के खिलाफ रूपनगढ़ थाने में वर्ष 2024 में FIR दर्ज हुई थी। FIR में धोखाधड़ी और फर्जी दस्तावेजों से जुड़े IPC की धाराओं के साथ एससी-एसटी एक्ट की धाराएं भी लगाई गई थीं।

मामले में गिरफ्तारी के बाद इकबाल न्यायिक हिरासत में रहे और बाद में पुलिस ने कोर्ट में चार्जशीट भी दाखिल कर दी।

इसके बाद पंचायती राज विभाग ने 19 जून 2026 को आदेश जारी कर उन्हें प्रशासक के पद से हटा दिया थी।

इकबाल छीपा ने इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी और कहा कि केवल FIR, गिरफ्तारी और चार्जशीट के आधार पर उन्हें पद से नहीं हटाया जा सकता।

याचिकाकर्ता ने कहा- सिर्फ FIR काफी नहीं

इकबाल छीपा का कहना था कि जब तक कानून में बताई गई वजह से उन्हें पद के लिए अयोग्य नहीं माना जाता, तब तक उन्हें पंचायत के पद से नहीं हटाया जा सकता।

वहीं राज्य सरकार ने इसका विरोध किया। सरकार की ओर से कहा गया कि इकबाल के खिलाफ गंभीर अपराधों के आरोप हैं और इनमें नैतिक चरित्र से जुड़े अपराध भी शामिल हैं।

उन्हें गिरफ्तार किया जा चुका है और पुलिस चार्जशीट भी पेश कर चुकी है। इसलिए सरकार ने माना कि छीपा को पद से हटाने का फैसला गलत नहीं था।

पंचायत पद से कब हटाया जा सकता है?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने राजस्थान पंचायती राज एक्ट की धारा 19 का हवाला देते हुए समझाया कि पंचायत पद पर बने रहने के लिए कानून में कुछ साफ नियम हैं।

हली स्थिति यह है कि जब किसी व्यक्ति को कोर्ट किसी अपराध में दोषी ठहराए और उसे छह महीने या उससे ज्यादा की सजा हो।

दूसरी स्थिति तब बनती है, जब कोई कोर्ट किसी ऐसे अपराध का संज्ञान लेने के बाद आरोपी के खिलाफ आरोप तय कर दे, जिसमें पांच साल या उससे ज्यादा की सजा का प्रावधान है।

यानी सिर्फ पुलिस के पास FIR दर्ज होने, गिरफ्तारी होने या चार्जशीट दाखिल होने से ही व्यक्ति पंचायत पद के लिए अयोग्य नहीं हो जाता। कानून में बताई गई इन स्थितियों में से किसी एक के पूरा होने पर ही पद से हटाने की कार्रवाई का आधार बनता है।

इकबाल छीपा के मामले में कोर्ट ने क्या देखा?

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि इकबाल छीपा के मामले में अभी तक संबंधित कोर्ट ने केस का संज्ञान नहीं लिया था। उनके खिलाफ आरोप भी तय नहीं हुए थे।

इसके अलावा, किसी अपराध में उन्हें दोषी ठहराकर छह महीने या उससे ज्यादा की सजा भी नहीं हुई थी। यानी कानून में पंचायत पद से हटाने के लिए जो स्थितियां बताई गई हैं, उनमें से कोई भी इस मामले में लागू नहीं हुई थी।

इसी आधार पर हाईकोर्ट ने माना कि सिर्फ FIR, गिरफ्तारी और चार्जशीट के आधार पर इकबाल छीपा को पंचायत पद से हटाना सही नहीं था। कोर्ट ने 19 जून 2026 का हटाने वाला आदेश रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने हटाने का आदेश रद्द किया

हाईकोर्ट ने इकबाल छीपा की याचिका मंजूर करते हुए उन्हें पद से हटाने का 19 जून 2026 का आदेश रद्द कर दिया। यानी जिस आदेश के आधार पर उन्हें पंचायत पद से हटाया गया था, वह अब लागू नहीं रहेगा।

हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया कि अगर आगे संबंधित कोर्ट इस मामले में संज्ञान लेता है और कानून के मुताबिक पद से हटाने की वजह बनती है, तो अधिकारी नया आदेश जारी कर सकते हैं।

इसलिए इस फैसले का मतलब यह नहीं है कि FIR में लगाए गए आरोप खत्म हो गए हैं या इकबाल छीपा को मामले में क्लीन चिट मिल गई है।

हाईकोर्ट ने सिर्फ इतना तय किया है कि मौजूदा स्थिति में FIR, गिरफ्तारी और चार्जशीट के आधार पर उन्हें पंचायत पद से हटाना कानून के मुताबिक सही नहीं था।

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