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पूर्व विधायक शोभारानी कुशवाह को राजस्थान हाईकोर्ट से बड़ी राहत

Former MLA Shobharani Kushwah Gets Major Relief from Rajasthan High Court; Criminal Proceedings Quashed in Fraud Case

धोखाधड़ी से जुड़े मामले में आपराधिक कार्यवाही रद्द, ट्रायल कोर्ट का आदेश अपास्त

जयपुर, 3 दिसंबर

राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर से इस वक्त की बड़ी खबर सामने आई है। पूर्व विधायक शोभारानी कुशवाह को राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया है।

यह राहत धोखाधड़ी से जुड़े उस प्रकरण में दी गई है, जिसमें भरतपुर ट्रायल कोर्ट ने उनके खिलाफ गंभीर धाराओं में संज्ञान लिया था।

जस्टिस समीर जैन की एकलपीठ ने शोभारानी कुशवाह की याचिका पर विस्तृत सुनवाई के बाद ट्रायल कोर्ट के आदेश को अपास्त करते हुए कार्यवाही को रद्द करने का आदेश दिया है।

भरतपुर ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द

18 अक्टूबर 2022 को भरतपुर की ट्रायल कोर्ट ने शोभारानी कुशवाह के खिलाफ धारा 420 (धोखाधड़ी), धारा 406 (आपराधिक न्यासभंग) और धारा 120-बी (आपराधिक साजिश) के तहत संज्ञान लिया था।

इसी आदेश को शोभारानी कुशवाह द्वारा हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

साथ ही 12 मई 2023 को भरतपुर सेशन कोर्ट के आदेश को भी चुनौती दी गई थी, जिसमें ट्रायल कोर्ट के संज्ञान आदेश को बरकरार रखा गया था।

हाईकोर्ट ने दोनों ही आदेशों को अपास्त करते हुए शोभारानी के खिलाफ चल रही पूरी आपराधिक कार्यवाही को रद्द कर दिया।

याचिका का निस्तारण, कोर्ट ने दी राहत

पूर्व विधायक की ओर से दायर आपराधिक विविध याचिका को निस्तारित करते हुए एकलपीठ ने माना कि इस मामले में दर्ज की गई कार्यवाही न्यायोचित नहीं है और इसे जारी रखना उचित नहीं होगा।

इसके साथ ही, शोभारानी कुशवाह पर चल रही आपराधिक कार्यवाही का अंत हो गया है।

अधिवक्ताओं ने की मजबूत दलीलें

याचिकाकर्ता की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता माधव मित्र और अधिवक्ता जया मित्र ने मामले में दलीलें पेश करते हुए कहा कि दर्ज प्रकरण में संज्ञान लेने के लिए आवश्यक वैधानिक आधार नहीं थे, और न ही उपलब्ध सामग्री से कोई प्राथमिक दृष्टया अपराध बनता है।

अधिवक्ता ने आगे दलील दी कि याचिकाकर्ता एक महिला हैं, जो न तो कंपनी के प्रबंधन से जुड़ी हैं और न ही निदेशक मंडल की सदस्य हैं, बल्कि केवल एक शेयरधारक मात्र हैं। मात्र शेयरधारक होना कंपनी के दैनिक संचालन या निर्णय लेने में भागीदारी का अधिकार नहीं देता।

अधिवक्ता ने कहा कि जांच के दौरान ऐसा कोई भी साक्ष्य प्राप्त नहीं हुआ है जिससे यह संकेत मिले कि याचिकाकर्ता का कथित अपराधों से कोई संबंध है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि किसी शेयरधारक की जिम्मेदारी सीमित होती है और केवल शेयरधारक होने भर से कोई दायित्वपूर्ण (vicarious) आपराधिक जिम्मेदारी नहीं थोपी जा सकती। साथ ही ‘actus non facit reum nisi mens sit rea’ (अर्थात—जब तक मन दोषी न हो, केवल कृत्य किसी को दोषी नहीं बनाता) के सिद्धांत का हवाला देते हुए कहा गया कि इस मामले में याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई दोषपूर्ण मानसिक तत्व (mens rea) भी नहीं दर्शाया गया है।

चार्जशीट तक दाखिल नहीं हुई

अधिवक्ता ने दलील देते हुए कहा कि याचिकाकर्ता के विरुद्ध कोई चार्जशीट दाखिल नहीं की गई, न ही धारा 173(8) दंड प्रक्रिया संहिता के तहत उनके खिलाफ कोई लंबित कार्यवाही रखी गई।

अधिवक्ता ने कहा कि यह स्पष्ट संकेत है कि जांच में उनके खिलाफ कोई आपत्तिजनक सामग्री नहीं मिली। अतः आपराधिक कार्यवाही को जारी रखना न्याय की प्रक्रिया का दुरुपयोग होगा और इसलिए याचिकाकर्ता धारा 482 Cr.P.C. के तहत राहत पाने की हकदार हैं।

अधिवक्ता ने यह भी बताया कि शिकायतकर्ताओं ने पहले छत्तीसगढ़ में और बाद में पंजाब में भी कार्यवाही दर्ज करवाई थी—लेकिन दोनों स्थानों पर भी याचिकाकर्ता का नाम नहीं था। वह कंपनी में मात्र 8000 शेयर रखती हैं और उनके संबंधियों के विरुद्ध ही चार्जशीट दायर की गई थी।

समझौता हो चुका है—विवाद निजी व सिविल प्रकृति का

सीनियर अधिवक्ता ने यह भी कहा कि शिकायतकर्ताओं/प्रतिवादियों के साथ समझौता हो चुका है और यह विवाद पूरी तरह निजी व सिविल प्रकृति का है, जो निवेशकों और कंपनी के बीच वित्तीय लेन-देन से संबंधित है।

अधिवक्ता माधव मित्र ने Gian Singh v. State of Punjab (2012) 10 SCC 303 का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि व्यावसायिक या वित्तीय लेन-देन जैसे निजी विवादों में, विशेषकर समझौता होने पर, आपराधिक कार्यवाही को रद्द किया जा सकता है।

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