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BREAKING NEWS: राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ के सबसे पुराने मुकदमें का निस्तारण, हाईकोर्ट की स्थापना के महज दो साल बाद 1979 में दर्ज हुई अपील का 47 साल बाद हुआ निस्तारण

Rajasthan High Court Seeks Compliance Report in Police Recruitment Height Dispute, Summons Officials on October 15
राजा हरि सिंह बनाम राजा ईश्वरी सिंह मामले में हाईकोर्ट ने सुनाया फैसला, अंतिम डिक्री के बाद अपील का निस्तारण; 50वें स्थापना दिवस से पहले बड़ी उपलब्धि

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में दशकों से लंबित एक ऐतिहासिक मुकदमे का आखिरकार निस्तारण हो गया है।

राजा हरि सिंह बनाम राजा ईश्वरी सिंह से जुड़े करीब 66 साल पुराने संपत्ति विवाद में हाईकोर्ट ने 47 साल से पेडिंग सिविल फर्स्ट अपील का निस्तारण कर दिया।

जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने मंगलवार को इस अपील का निस्तारण करते हुए यह आदेश पारित किया।

इस मामले की ऐतिहासिकता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि विवाद से जुड़ी अपील 2 जुलाई 1979 को राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में दायर हुई थी।

उस समय जयपुर पीठ की स्थापना को महज दो साल हुए थे।

और करीब 47 साल बाद अब 13 अक्टूबर 2026 को इस अपील का निस्तारण हुआ है।

खास बात यह है कि जयपुर पीठ 31 जनवरी 2027 को अपने 50वें स्थापना दिवस की ओर बढ़ रही है और उससे करीब तीन महीने पहले इतने पुराने मामले का निस्तारण हुआ है।

मामला जयपुर राजघराने की चल और अचल संपत्तियों के बंटवारे से जुड़ा था।

दशकों तक चली न्यायिक प्रक्रिया के दौरान मूल पक्षकारों में से कई की मृत्यु हो गई और उनके कानूनी उत्तराधिकारी मुकदमे में शामिल हुए। आखिरकार, संपत्तियों के विभाजन से संबंधित बाद की कार्यवाही और अंतिम डिक्री के बाद हाईकोर्ट में लंबित अपील भी निस्तारित हो गई।

1961 में शुरू हुआ विवाद, 1979 में हाईकोर्ट पहुंची अपील

मामले के अनुसार, संपत्तियों के बंटवारे को लेकर वर्ष 1961 में मुकदमा शुरू हुआ था।

जयपुर शहर के अतिरिक्त जिला न्यायाधीश संख्या-1 ने 23 दिसंबर 1978 को प्रारंभिक डिक्री पारित की। इस फैसले को चुनौती देते हुए 2 जुलाई 1979 को राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ में सिविल फर्स्ट अपील दायर की गई।

यह अपील सिविल फर्स्ट अपील संख्या 19/1980 के रूप में लंबित रही। करीब 47 साल तक चली न्यायिक प्रक्रिया के दौरान विवाद से जुड़े पक्षकारों और परिस्थितियों में बदलाव आया। इसी बीच संपत्तियों के विभाजन की कार्यवाही भी आगे बढ़ती रही।

अपील लंबित रहते ही पारित हो गई अंतिम डिक्री

मामले में अहम मोड़ तब आया, जब प्रारंभिक डिक्री के आधार पर संपत्तियों के विभाजन की कार्यवाही पूरी हुई।

अतिरिक्त जिला न्यायाधीश संख्या-1, जयपुर शहर ने 13 अगस्त 2026 को विविध प्रार्थना पत्र संख्या 32/2024 में अंतिम डिक्री पारित की।

इसके तहत संबंधित पक्षकारों के बीच संपत्तियों का विभाजन किया गया।

हाईकोर्ट के समक्ष यह तथ्य रखा गया कि अंतिम डिक्री पक्षकारों की सहमति से पारित हुई थी और संपत्तियों के अंतिम विभाजन को लेकर कोई आपत्ति नहीं उठाई गई।

ऐसे में अपील के निस्तारण के लिए बाद में विकसित हुई परिस्थितियां महत्वपूर्ण बन गईं।

हाईकोर्ट ने क्यों किया 47 साल पुरानी अपील का निस्तारण?

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने अंतिम डिक्री पारित होने और संपत्तियों के विभाजन की स्थिति पर विचार किया।

हाईकोर्ट के समक्ष अपीलकर्ताओं की ओर से ऐसा कोई ठोस कानूनी आधार नहीं बताया गया, जिससे प्रारंभिक डिक्री में हस्तक्षेप करना आवश्यक हो।

हाईकोर्ट ने माना कि जब संपत्तियों का अंतिम विभाजन हो चुका है और अंतिम डिक्री के बाद मामले की परिस्थितियां बदल गई हैं, तो अपील को आगे जारी रखने का औचित्य नहीं रह जाता। इसी आधार पर जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने अपील का निस्तारण कर दिया।

सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

जस्टिस अशोक कुमार जैन ने अपने आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले Shipping Corporation of India v. Machado Brothers and Others, (2004) 11 SCC 168 का भी उल्लेख किया।

इस फैसले में मुकदमे की सुनवाई के दौरान परिस्थितियां बदलने और विवाद को आगे जारी रखने का औचित्य समाप्त होने की स्थिति में अदालत द्वारा उचित आदेश पारित करने के सिद्धांत पर विचार किया गया था।

हाईकोर्ट ने वर्तमान मामले में अंतिम डिक्री और संपत्तियों के विभाजन की स्थिति को ध्यान में रखते हुए अपील में हस्तक्षेप का पर्याप्त आधार नहीं पाया और लंबित अपील का निस्तारण कर दिया।

अतिरिक्त दस्तावेज रिकॉर्ड पर लेने के आवेदन भी स्वीकार

सुनवाई के दौरान अपीलकर्ताओं की ओर से सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश 41 नियम 27 और धारा 151 के तहत आवेदन प्रस्तुत किए गए थे।

हाईकोर्ट ने इन आवेदनों को स्वीकार करते हुए संबंधित दस्तावेज रिकॉर्ड पर लिए।

अंतिम डिक्री और पक्षकारों के बीच हुए समझौते से जुड़े दस्तावेज भी अदालत के समक्ष रखे गए।

अंतिम आदेश में अदालत ने 23 दिसंबर 1978 की प्रारंभिक डिक्री में हस्तक्षेप नहीं किया और 13 अगस्त 2026 की अंतिम डिक्री के मद्देनजर अपील का निस्तारण कर दिया।

इसके साथ ही लंबित अन्य आवेदनों का भी निस्तारण किया गया।

जयपुर पीठ के 50वें स्थापना दिवस से पहले अहम पड़ाव

राजस्थान हाईकोर्ट की जयपुर पीठ की स्थापना वर्ष 1977 में हुई थी। ऐसे में स्थापना के शुरुआती दौर में दायर हुई इस अपील का 2026 में निस्तारण होना एक उल्लेखनीय न्यायिक घटनाक्रम है।

करीब 66 साल पुराने संपत्ति विवाद से जुड़ी 47 साल लंबित अपील का अंत ऐसे समय हुआ है, जब जयपुर पीठ अपने 50वें स्थापना दिवस की ओर बढ़ रही है।

यह मामला दिखाता है कि दशकों तक लंबित रहने वाले विवादों में बाद की न्यायिक कार्यवाही, अंतिम डिक्री और पक्षकारों के बीच सहमति जैसे पहलू अपील के निस्तारण में निर्णायक भूमिका निभा सकते हैं।

मामले में अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता आर.के. डागा के साथ राहुल सिंह चौहान तथा प्रतिवादियों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता एम.एम. रंजन के साथ रोहन अग्रवाल उपस्थित हुए।

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