जयपुर। जयपुर के मोटर दुर्घटना दावा अधिकरण (MACT) ने एक कथित फर्जी सड़क हादसे के मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए 85 लाख रुपये के मुआवजा दावे को खारिज कर दिया।
ट्रिब्यूनल ने मामले के तत्कालीन जांच अधिकारी एएसआई नंदलाल जांगिड़ की भूमिका पर सवाल उठाए हुए गंभीर आरोप लगाए हैं.
अदालत ने कहा कि तत्कालिन जांच अधिकारी ने वाहन मालिक और अन्य लोगों के साथ मिलकर गलत तरीके से वाहन को मामले में शामिल दिखाया और तथ्यों के विपरीत चालान पेश किया।
ट्रिब्यूनल ने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (सतर्कता), राजस्थान को आदेश दिया कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ उचित कार्रवाई कर दो माह में रिपोर्ट पेश करें.
क्या हैं मामला
मामला वर्ष 2018 की एक कथित सड़क दुर्घटना से जुड़ा था, जिसमें गौतम विश्वास नामक व्यक्ति की मौत हो गई थी।
मृतक की पत्नी लतिका देवी और परिवार के अन्य सदस्यों ने दावा किया था कि जयपुर-दिल्ली रोड पर एक वैगनआर कार ने लापरवाही से वाहन चलाते हुए उनकी मोटरसाइकिल को टक्कर मार दी, जिससे गौतम विश्वास की मृत्यु हो गई।
परिवार ने दावा किया कि मृतक निजी मेडिकल प्रैक्टिस करते थे और लगभग 40 हजार रुपये मासिक आय अर्जित करते थे, जिसके आधार पर 85 लाख रुपये का क्लेम दायर किया गया।
मामले में यूटर्न
बीमा कंपनी ने इस पूरे मामले को संदिग्ध बताते हुए अदालत में कहा कि जिस कार को दुर्घटना में शामिल बताया गया, उसी वाहन के खिलाफ विभिन्न अदालतों में कई अन्य दुर्घटना दावे भी लंबित हैं।
बीमा कंपनी ने आरोप लगाया कि वाहन को बार-बार अलग-अलग मामलों में दिखाकर फर्जी क्लेम हासिल करने का प्रयास किया जा रहा है।
क्या कहा अदालत ने
सुनवाई के दौरान ट्रिब्यूनल ने पाया कि दुर्घटना की FIR घटना के करीब 15 दिन बाद दर्ज कराई गई थी।
इतना ही नहीं, घटनास्थल के शुरुआती रिकॉर्ड और रोज़नामचे में कथित दुर्घटनाग्रस्त कार का नंबर दर्ज नहीं था।
अदालत ने यह भी नोट किया कि प्रत्यक्षदर्शी बताए गए गवाहों के बयानों में गंभीर विरोधाभास थे। एक गवाह ने कहा कि मोटरसाइकिल डिवाइडर से टकराई थी, जबकि दूसरे ने दावा किया कि कार ने पीछे से टक्कर मारी।
ट्रिब्यूनल ने कहा कि केवल चार्जशीट दाखिल हो जाने से यह मान लेना पर्याप्त नहीं है कि दुर्घटना वास्तव में उसी वाहन से हुई थी।
लोग झूठ बोल सकते हैं, लेकिन परिस्थितियां नहीं
अदालत ने राजस्थान हाईकोर्ट के कई पुराने फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि मोटर दुर्घटना कानून सामाजिक कल्याण के लिए बनाया गया है, लेकिन इसका दुरुपयोग कर फर्जी दावे पेश करना न्याय व्यवस्था और समाज दोनों के लिए घातक है।
फैसले में अदालत ने टिप्पणी की कि “लोग झूठ बोल सकते हैं, लेकिन परिस्थितियां नहीं।” ट्रिब्यूनल ने कहा कि दावे को साबित करने के लिए विश्वसनीय और ठोस दस्तावेजी साक्ष्य जरूरी होते हैं।
यदि दस्तावेजों और गवाहों के बयानों में विरोधाभास हो, तो दावा खारिज किया जा सकता है।
अदालत ने अंततः यह निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता यह साबित करने में असफल रहे कि कथित वाहन वास्तव में दुर्घटना में शामिल था। इसके चलते पूरा मुआवजा दावा खारिज कर दिया गया।
एएसआई नंदलाल जांगिड़ की भूमिका
मामले का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा वह रहा, जिसमें ट्रिब्यूनल ने तत्कालीन जांच अधिकारी एएसआई नंदलाल जांगिड़ की भूमिका पर सवाल उठाए।
अदालत ने कहा कि जांच अधिकारी ने वाहन मालिक और अन्य लोगों के साथ मिलकर गलत तरीके से वाहन को मामले में शामिल दिखाया और तथ्यों के विपरीत चालान पेश किया।
ट्रिब्यूनल ने अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक (सतर्कता), राजस्थान को आदेश दिया कि संबंधित अधिकारी के खिलाफ उचित कार्रवाई कर दो माह में रिपोर्ट प्रस्तुत की जाए।