जीडी गोयनका विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता मूट प्रतियोगिता का समापन समारोह; मुख्य अतिथि जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा-ट्रॉफी और प्रमाण-पत्र पीछे छूट जाते हैं, लेकिन वकील की तरह सोचने की क्षमता जिंदगीभर साथ रहती है
गुरुग्राम। जीडी गोयनका विश्वविद्यालय में आयोजित आठवें GD Goenka–CIArb (India) International Commercial Arbitration Moot Competition, 2026 के समापन समारोह में मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित करते हुए जस्टिस अशोक कुमार जैन ने कहा कि कानूनी पेशा गहरे परिवर्तन के दौर से गुजर रहा है।
उन्होंने कहा कि अब न्याय केवल भौतिक अदालतों तक सीमित नहीं है, बल्कि निष्पक्षता, स्वतंत्रता और कानून के शासन का सम्मान करने वाली विभिन्न संस्थागत प्रक्रियाओं के माध्यम से भी न्याय सुनिश्चित किया जा सकता है।
जस्टिस जैन ने कानूनी पेशे में न्यायाधीशों और अधिवक्ताओं के संबंध पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। उन्होंने कहा—
“अदालत कोई युद्ध का मैदान नहीं है…..
जस्टिस जैन ने कहा कि न्यायाधीश और अधिवक्ता न्याय प्रशासन में अलग-अलग भूमिकाएं निभाने वाले सहभागी हैं। अधिवक्ता मामले को अदालत के समक्ष प्रस्तुत करता है, जबकि न्यायाधीश उसका निर्णय करता है। दोनों कानून के शासन के प्रति समान संवैधानिक प्रतिबद्धता से जुड़े हैं।
उन्होंने कहा कि एक अच्छा अधिवक्ता मामले को सटीकता के साथ प्रस्तुत करके न्यायाधीश के कार्य को आसान बनाता है, जबकि एक अच्छा न्यायाधीश धैर्य और खुले मन से मामले की सुनवाई करके अधिवक्ता का सम्मान करता है। उनके अनुसार मध्यस्थता की कार्यवाही में भी यह पेशेवर संबंध विशेष महत्व रखता है।
“ट्रॉफी और प्रमाण-पत्र पीछे छूट जाते हैं”
जस्टिस अशोक जैन ने समापन समारोह में विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि एक ट्रॉफी किसी शेल्फ पर रखी जा सकती है और प्रमाण-पत्र किसी फाइल में रखा जा सकता है, लेकिन वकील की तरह सोचने की क्षमता पूरे पेशेवर जीवन में साथ रहती है।
उन्होंने कहा कि मूट कोर्ट विद्यार्थियों में कानूनी तर्क, अनुशासन, शोध और विचारों की स्पष्टता विकसित करता है। इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि यह विद्यार्थियों को विरोधी पक्ष के तर्कों का सम्मान करना सिखाता है।

मूट कोर्ट सिर्फ प्रतियोगिता नहीं, पेशेवर जीवन की तैयारी
कानून विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए जस्टिस जैन ने कहा कि मूट कोर्ट केवल ट्रॉफी जीतने की प्रतियोगिता नहीं है। यह कानून के विद्यार्थी को पेशेवर जीवन में प्रवेश से पहले अदालत और वकालत की वास्तविक चुनौतियों का अनुभव देने वाला महत्वपूर्ण माध्यम है।
उन्होंने कहा कि कक्षा में कानून पढ़ाया जाता है, किताबों में कानून का अध्ययन किया जाता है और न्यायिक फैसलों में कानून की व्याख्या देखने को मिलती है, लेकिन मूट कोर्ट में विद्यार्थी यह सीखता है कि किसी क्लाइंट के पक्ष में कानून को प्रभावी ढंग से कैसे प्रस्तुत किया जाए।
मूट कोर्ट के दौरान विद्यार्थी तथ्यों को समझता है, कानूनी प्रश्नों की पहचान करता है, लागू कानून पर शोध करता है, विभिन्न प्राधिकारों के बीच अंतर करता है, विपक्ष के संभावित तर्कों का अनुमान लगाता है और अंततः न्यायिक अथवा मध्यस्थ मंच के समक्ष अपने पक्ष को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत करता है।
उन्होंने प्रतियोगिता के आयोजन के लिए GD Goenka University, School of Law, Moot Court Society, Chartered Institute of Arbitrators (India), Society of Indian Law Firms और International Centre for Dispute Resolution, Singapore सहित आयोजन से जुड़े सभी संस्थानों और व्यक्तियों को बधाई दी।
ESG अब केवल अकादमिक चर्चा नहीं
जस्टिस अशोक जैन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता में Environmental, Social and Governance (ESG) से जुड़े मुद्दे अब केवल अकादमिक चर्चा तक सीमित नहीं हैं।
जस्टिस जैन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता का बढ़ता महत्व इस बदलती कानूनी व्यवस्था का महत्वपूर्ण उदाहरण है।
आधुनिक व्यापार में स्थिरता, पर्यावरणीय अनुपालन, कॉरपोरेट जिम्मेदारी, श्रम मानक, सप्लाई-चेन दायित्व, पारदर्शिता और गवर्नेंस लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं।
उन्होंने कहा कि इन पहलुओं ने वाणिज्यिक अनुबंधों में भी जगह बनाई है और जब ऐसे अनुबंधों से कानूनी अधिकार एवं दायित्व पैदा होते हैं, तो उनसे जुड़े विवाद भी सामने आ सकते हैं। ऐसे मामलों में वकीलों को कानून के साथ-साथ व्यापार और वैश्विक वाणिज्य की बदलती वास्तविकताओं को भी समझना होगा।
मध्यस्थता में Party Autonomy की केंद्रीय भूमिका
जस्टिस अशोक जैन ने अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता में Party Autonomy यानी पक्षकारों की स्वायत्तता के महत्व पर भी चर्चा की। उन्होंने Bharat Aluminium Co. v. Kaiser Aluminium Technical Services Inc. और Centrotrade Minerals & Metals Inc. v. Hindustan Copper Ltd. जैसे मामलों का उल्लेख करते हुए मध्यस्थता में पक्षकारों की स्वायत्तता के महत्व को रेखांकित किया।
उन्होंने कानून विद्यार्थियों से कहा कि उनका पेशेवर जीवन भी उनके अपने चुनावों से आकार लेगा—वे क्या सीखते हैं, किससे मार्गदर्शन लेते हैं, किन सिद्धांतों से समझौता नहीं करते और भविष्य में किस प्रकार के वकील बनना चाहते हैं।
अंतरराष्ट्रीय वाणिज्य ने बदली विवादों की प्रकृति
जस्टिस जैन ने कहा कि आधुनिक वाणिज्य में एक अनुबंध एक देश में तैयार हो सकता है, दूसरे देश में लागू हो सकता है, किसी तीसरे क्षेत्राधिकार से वित्तपोषित हो सकता है और किसी अन्य कानूनी व्यवस्था के अधीन हो सकता है।
ऐसे मामलों में विवाद होने पर पक्षकार विशेषज्ञता, प्रक्रियात्मक लचीलेपन, तटस्थता और प्रवर्तनीयता वाले विवाद समाधान तंत्र की ओर देखते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि मध्यस्थता केवल “एक वैकल्पिक अदालत” नहीं है, बल्कि पक्षकारों के समझौते और लागू कानूनी ढांचे के अनुरूप विवादों के समाधान के लिए विकसित एक विशेष व्यवस्था है।

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता को जहाज से जोड़कर समझाया
जस्टिस अशोक जैन ने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के संदर्भ में Redfern और Hunter की प्रसिद्ध उपमा का उल्लेख किया, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने ONGC Ltd. v. Afcons Gunanusa JV में उद्धृत किया है।
उन्होंने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की तुलना एक जहाज से करते हुए कहा कि पक्षकार उसके मालिकों की तरह होते हैं, जो व्यापक दिशा तय करते हैं, जबकि दैनिक संचालन के लिए मध्यस्थ न्यायाधिकरण पर भरोसा किया जाता है।
इसी उदाहरण को विद्यार्थियों के पेशेवर जीवन से जोड़ते हुए उन्होंने कहा कि उनकी कानूनी शिक्षा जहाज है, सिद्धांत कम्पास हैं और मार्गदर्शक उन्हें रास्ता पढ़ना सिखाते हैं। लेकिन अंततः अपने पेशेवर जीवन की दिशा उन्हें स्वयं तय करनी होगी।
जटिल कानून को सरल और स्पष्ट बनाना जरूरी
जस्टिस जैन ने कहा कि मध्यस्थ कार्यवाही में सटीकता बेहद महत्वपूर्ण है। मामले तकनीकी हो सकते हैं, दस्तावेजों की संख्या बहुत अधिक हो सकती है और अनुबंधीय व्यवस्थाएं कई न्यायक्षेत्रों तक फैली हो सकती हैं।
ऐसे मामलों में मध्यस्थ न्यायाधिकरण को वाणिज्य, वित्त, प्रौद्योगिकी, बुनियादी ढांचे, पर्यावरण और अंतरराष्ट्रीय विनियमन से जुड़े जटिल प्रश्नों पर विचार करना पड़ सकता है। ऐसे में अधिवक्ता के लिए जरूरी है कि वह जटिल कानूनी मुद्दों को बिना उनकी गंभीरता कम किए स्पष्ट और समझने योग्य तरीके से प्रस्तुत कर सके।
उन्होंने कहा कि यही एक दुर्लभ पेशेवर कौशल है और इसे विकसित करने में ऐसी मूट कोर्ट प्रतियोगिताओं की महत्वपूर्ण भूमिका है।
भविष्य के वकीलों को तकनीक और स्थिरता भी समझनी होगी
जस्टिस अशोक जैन ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय वाणिज्यिक मध्यस्थता का भविष्य ऐसे वकीलों का है, जो केवल अनुबंध और प्रक्रिया तक सीमित न रहें, बल्कि प्रौद्योगिकी, स्थिरता, कॉरपोरेट जिम्मेदारी और वैश्विक वाणिज्य की बढ़ती परस्पर संबद्धता को भी समझें।
उन्होंने विद्यार्थियों से उत्साह के साथ भाग लेने, ईमानदारी से प्रतिस्पर्धा करने और विनम्रता के साथ सीखने का आह्वान किया।
युवा वकीलों की भूमिका पर बात करते हुए जस्टिस जैन ने जस्टिस संजय करोल की कही बात “We want the younger bar to grow” का उल्लेख किया।
उन्होंने कहा कि वरिष्ठ अधिवक्ताओं और कानूनी पेशे से जुड़े अनुभवी लोगों की जिम्मेदारी है कि वे अगली पीढ़ी के लिए अवसर पैदा करें। जिन लोगों को वरिष्ठों और मार्गदर्शकों से सीखने का अवसर मिला है, उन्हें आने वाली पीढ़ी के लिए भी सीखने और आगे बढ़ने की जगह बनानी चाहिए।
उन्होंने कहा कि मूट कोर्ट जैसी प्रतियोगिताएं इसी प्रक्रिया का हिस्सा हैं, जहां कानून विद्यार्थी अपने तर्कों को परखते हैं, चुनौतियों का सामना करते हैं, गलतियों से सीखते हैं और धीरे-धीरे अपनी पेशेवर आवाज विकसित करते हैं।
निडर होकर तर्क करें, सम्मान के साथ
प्रतिभागियों को संबोधित करते हुए जस्टिस अशोक जैन ने कहा—
“निडर होकर तर्क करें, लेकिन सम्मान के साथ। गहराई से शोध करें, लेकिन खुले विचारों वाले बने रहें। गंभीरता से प्रतिस्पर्धा करें, लेकिन पेशेवर नैतिकता को कभी न भूलें।”
उन्होंने कहा कि विद्यार्थियों को केवल तर्क जीतना नहीं सीखना चाहिए, बल्कि कानून को समझना सीखना चाहिए। एक महान वकील वह नहीं है जिसके पास हमेशा अंतिम शब्द हो, बल्कि वह है जो कानून, तथ्यों और तर्कों को समझकर प्रभावी ढंग से अपना पक्ष रख सके।
समापन पर जस्टिस अशोक कुमार जैन ने सभी प्रतिभागी टीमों को शुभकामनाएं दीं और उनके उज्ज्वल पेशेवर भविष्य की कामना की। उन्होंने कहा कि उनके तर्क सटीक हों, शोध कठोर हो, वकालत प्रभावी हो और उनका आचरण हमेशा कानूनी पेशे की गरिमा के अनुरूप बना रहे।
पुरस्कार वितरण और सम्मान
प्रतियोगिता के समापन समारोह के साथ ही विजेता और उपविजेता टीमों को ट्राफी और प्रमाण पत्र के साथ ही नकद पुरस्कार भी दिए गए.
समारोह में दिल्ली हाईकोर्ट के जज जस्टिस तेजस करिया ने विशिष्ट अतिथि के रूप में छात्रों को संबोधित किया।
वही समारोह की अध्यक्षता सोसाइटी ऑफ इंडियन लॉ फर्म्स वं चेयरमैन, चार्टर्ड इंस्टीट्यूट ऑफ आर्बिट्रेटर्स इंडिया के डॉ ललित भसीन ने की।
कार्यक्रम के अंत में जीडी गोयनका विश्वविद्यालय स्कूल ऑफ लॉ के डीन प्रो. डॉ. आशीष वर्मा ने सभी का आभार जताया।
कार्यक्रम का प्रतिवेदन मूट कोर्ट समिति संयोजक डॉ. शिल्पिका पांडे की ओर से पेश किया गया।