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राजस्थान हाईकोर्ट मेरा दूसरा घर और मेरी पाठशाला, यहीं घुटनों के बल चलना सीखा और यहीं अपने पैरों पर खड़ा होना भी सीखा-जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी

Justice Pushpendra Singh Bhati Emotional Farewell Speech: “Rajasthan High Court Was My Second Home and My School”

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने सोमवार को राजस्थान हाईकोर्ट में आयोजित अपने विदाई समारोह में अपने करीब साढ़े तीन दशक लंबे विधिक जीवन, बार-बेंच के संबंध, न्यायिक जिम्मेदारियों, गुरुओं, सहकर्मियों और युवा अधिवक्ताओं को लेकर अपने विचार साझा किए।

राजस्थान हाईकोर्ट में दोपहर 3.30 बजे आयोजित हुई विदाई रेफरेंस को संबोधित करते हुए जस्टिस भाटी ने राजस्थान हाईकोर्ट के नवनियुक्त मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल का स्वागत करते हुए कहा कि राजस्थान की धरती उनके लिए किसी स्वर्ग से कम नहीं है और यहां की बार, लॉ फ्रेटर्निटी तथा न्यायिक परिवार उन्हें प्यार, सम्मान और आत्मीयता देगा।

उन्होंने कहा कि उन्होंने जस्टिस संजय कुमार अग्रवाल को पिछले कुछ समय में एक बड़े भ्राता के रूप में देखा है। उनकी एकेडमिक्स और विधिक विद्वता का भारतीय न्यायपालिका में विशेष सम्मान है।

उन्होंने कहा कि जस्टिस अग्रवाल एक वरिष्ठ न्यायाधीश होने के साथ-साथ कर्मठ, निष्ठावान और सकारात्मक सोच वाले कप्तान हैं और उन्हें पूरा विश्वास है कि उनके नेतृत्व में राजस्थान न्यायपालिका नई ऊंचाइयों को छुएगी और नए शिखर बनाएगी।

“आज मेरे पास शब्द बहुत कम पड़ रहे हैं”

अपने विदाई संबोधन की शुरुआत में जस्टिस भाटी ने कहा कि आज हृदय में उमड़ रहे भावों को व्यक्त करने के लिए उनके पास शब्द बहुत कम पड़ रहे हैं।

उन्होंने कहा कि 1992 से शब्द उनके जीवन के अभिन्न साथी रहे हैं। बार में शब्द अभिव्यक्ति और तर्क के साधन थे, जबकि न्यायपीठ पर वही शब्द उत्तरदायित्व का माध्यम बन गए।

लेकिन आज मिले स्नेह, आत्मीयता और उदार भावनाओं के सामने उन्हें लगा कि उनके शब्द स्वयं अपना सामर्थ्य खो बैठे हैं।

उन्होंने कहा कि समारोह में उनके बारे में व्यक्त किए गए स्नेहपूर्ण विचारों को वह अपनी उपलब्धियों का प्रमाण पत्र नहीं, बल्कि स्नेह का आशीर्वाद मानकर स्वीकार करते हैं।

लॉर्ड टेनिसन की पंक्ति “I am a part of all that I have met” का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि आज यह पंक्ति उन्हें कविता से अधिक अपनी जीवंत कथा लगती है।

“राजस्थान हाईकोर्ट मेरा दूसरा घर और मेरी पाठशाला रहा”

जस्टिस भाटी ने कहा कि उनका विधिक जीवन इसी संस्थान से जुड़ा है। यहीं उन्होंने घुटनों के बल चलना सीखा और यहीं अपने पैरों पर खड़ा होना सीखा।

उन्होंने कहा कि विधिक क्षेत्र में वह आज जो कुछ भी बन पाए हैं, उसका श्रेय राजस्थान हाईकोर्ट की बार, बेंच, इसकी परंपराओं, न्यायालय के कक्षों, यहां बनी मित्रताओं और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता को जाता है।

उन्होंने कहा कि राजस्थान हाईकोर्ट से उनका संबंध किसी पद से शुरू नहीं हुआ, बल्कि वर्ष 1992 में एक युवा अधिवक्ता के सपनों, आशंकाओं और अनिश्चितताओं के साथ शुरू हुआ था।

“जोधपुर की बार, जोधपुर की बेंच, जोधपुर की धरती और राजस्थान के विधि जगत ने मुझे बहुत कुछ दिया है। मैं इन सबका ऋणी हूं।”

“यदि आज तक कुछ सार्थक कर पाया हूं तो इन विराट व्यक्तित्वों के कारण”

जस्टिस भाटी ने अपने गुरुओं और वरिष्ठ न्यायाधीशों को याद करते हुए कहा कि उनके जीवन में अनेक विराट व्यक्तित्वों का मार्गदर्शन रहा।

उन्होंने सर आइजैक न्यूटन के प्रसिद्ध कथन का उल्लेख किया—

“If I have seen further than others, it is by standing on the shoulders of giants.”

उन्होंने जस्टिस एन एन माथुर, जस्टिस गोविंद माथुर, वरिष्ठ अधिवक्ता राजेश्वर गुप्ता, वरिष्ठ अधिवक्ता प्रदीप शाह सहित अपने गुरुओं के योगदान को याद किया।

उन्होंने राजस्थान हाईकोर्ट के कई पूर्व मुख्य न्यायाधीशों और वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ काम करने का अवसर मिलने को अपने लिए सौभाग्य बताया।

इनमें जस्टिस अशोक माथुर, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी, जस्टिस अजय रस्तोगी सहित अनेक न्यायाधीश शामिल रहे।

उन्होंने जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस विजय विष्णोई को अपना बड़ा भाई बताते हुए कहा कि उनसे उन्हें बहुत मार्गदर्शन और सीख मिली।

“16 नवंबर 2016 को कुछ कदमों की दूरी ने पूरी दुनिया का अंतर पैदा कर दिया”

जस्टिस भाटी ने अपने न्यायाधीश बनने के दिन को याद करते हुए कहा कि 16 नवंबर 2016 को नियति ने उन्हें अधिवक्ता से न्यायाधीश की भूमिका में आने का अवसर दिया।

उन्होंने कहा कि उस समय जस्टिस एस.पी. शर्मा, जस्टिस दिनेश माहेश्वरी और जस्टिस विनीत माथुर जैसे वरिष्ठ न्यायाधीशों के साथ बेंच पर बैठने का अवसर मिला।

उन्होंने कहा कि अधिवक्ता और न्यायाधीश के बीच की दूरी भले ही कुछ कदमों की हो, लेकिन उत्तरदायित्व की दृष्टि से वह एक पूरी दुनिया का अंतर है।

“अधिवक्ता एक पक्ष का प्रतिनिधित्व करता है, जबकि न्यायाधीश प्रत्येक पक्ष को सुनता है। अधिवक्ता का कार्य अपने तर्क से न्यायालय को सहमत करना है, लेकिन न्यायाधीश का दायित्व है कि वह किसी पूर्व निष्कर्ष से प्रभावित हुए बिना विधि, साक्ष्य और तर्क के आधार पर निर्णय करे।”

“हर फाइल के पीछे एक इंसानी कहानी होती है”

जस्टिस भाटी ने न्यायाधीश के दायित्व को रेखांकित करते हुए कहा कि न्यायालय पर केवल वकीलों का विश्वास नहीं होता, बल्कि संविधान, नागरिक और पूरी व्यवस्था का विश्वास जुड़ा होता है।

उन्होंने कहा कि कोई मुकदमा केवल कॉज लिस्ट में दर्ज एक संख्या नहीं होता।

“हर फाइल के पीछे एक मानवीय कहानी होती है—किसी की स्वतंत्रता, किसी की आजीविका, किसी का घर, किसी का परिवार, किसी की वर्षों की प्रतीक्षा और कभी-कभी किसी की अंतिम शेष आशा।”

उन्होंने न्यायाधीशों की पारंपरिक प्रार्थना का उल्लेख करते हुए कहा—

“Give me grace to hear patiently, to consider diligently, and to understand rightly and to decide justly.”

जस्टिस भाटी ने कहा कि वह इस कसौटी पर कितने सफल रहे, इसका निर्णय वह स्वयं नहीं कर सकते।

“कोई न्यायाधीश अपने ही न्यायिक जीवन की अपील में स्वयं नहीं बैठ सकता। इसका निर्णय संस्था करेगी, बार करेगी, वादकारी करेंगे और अंततः समय करेगा।”

उन्होंने बताया कि अपने न्यायिक जीवन में उन्हें करीब 64,700 मामलों में निर्णय देने का अवसर मिला।

उन्होंने कहा कि हर निर्णय से पहले उन्होंने सुनने और समझने का प्रयास किया और हमेशा यह याद रखा कि न्यायिक अधिकार कोई व्यक्तिगत विशेषाधिकार नहीं, बल्कि संविधान द्वारा मनुष्य के हाथों में सौंपा गया पवित्र न्यास है।

“दो लाइन की याचिका, बच्ची को 300 किमी दूर जाने से मिली राहत”

जस्टिस भाटी ने अपने शुरुआती वकालत के दिनों का एक प्रसंग सुनाया। उन्होंने बताया कि एक दिन उनके पड़ोसी उनके पास आए। उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने बताया कि उनकी बेटी को अगले दिन 300 किलोमीटर दूर बोर्ड परीक्षा देने जाना था।

उन्होंने पूछा कि क्या न्यायपालिका कुछ कर सकती है और क्या कोई वकील उनकी मदद कर सकता है।

जस्टिस भाटी ने बताया कि वह उस समय नए वकील थे। उन्होंने एक बुजुर्ग टाइपिस्ट के पास बैठकर एक छोटी-सी याचिका तैयार की। उसमें मांग थी कि छात्रा को नजदीकी परीक्षा केंद्र दिया जाए।

उन्होंने तत्कालीन बेंच के समक्ष मामला रखा। याचिका देखने के बाद आदेश हुआ—

“Stay granted, Centre at Jodhpur.”

जस्टिस भाटी ने कहा कि युवा अधिवक्ताओं को यह समझना चाहिए कि जो बात सहज, सच्चे मन और वास्तविक अधिकार को व्यक्त करती है, उसे न्यायालय में पीछे जाने की जरूरत नहीं होती।

“A याचिका में व्यक्ति की पहचान सुरक्षित रखी”

एक अन्य प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने बताया कि एक व्यक्ति ने सोने के तस्करों को पकड़वाने में मदद की थी। नीति के अनुसार उसे बरामद सोने में हिस्सा मिलना था, लेकिन उसे डर था कि याचिका दाखिल करने पर उसकी जान को खतरा हो सकता है।

जस्टिस भाटी ने उसकी पहचान सुरक्षित रखने के लिए “A” के नाम से याचिका दाखिल की। याचिका में लिखा गया कि संबंधित व्यक्ति भारत का नागरिक है और उसकी पूरी पहचान सीलबंद लिफाफे में रखी गई है, जिसे केवल न्यायालय के आदेश पर खोला जाए।

जब मामला कॉज लिस्ट में “A” के नाम से आया तो बेंच ने सवाल किया।

जस्टिस भाटी ने बताया कि उन्होंने समझाया कि मामला व्यक्ति के जीवन के अधिकार से जुड़ा है और उसकी पहचान सामने आने पर उसकी जान को खतरा हो सकता है। इसके बाद न्यायालय ने सरकार से जवाब मांगा और उसकी पहचान सुरक्षित रखी गई।

उन्होंने कहा कि ये उदाहरण अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिए नहीं बताए, बल्कि यह बताने के लिए बताए हैं कि मामला छोटा या बड़ा नहीं होता, अधिकार महत्वपूर्ण होता है।

“जब सारी प्रक्रियाएं थक जाती हैं, तब न्याय की प्रक्रिया काम आती है”

जस्टिस भाटी ने कहा कि संविधान के तहत न्याय की प्रक्रिया इतनी मजबूत है कि जब बाकी सभी रास्ते समाप्त होने लगते हैं, तब न्यायालय नागरिक को वह स्थान देता है जो कोई दूसरी व्यवस्था नहीं दे सकती।

उन्होंने कहा कि विशेषकर 40 वर्ष से कम उम्र के युवा अधिवक्ताओं को न्याय की इस ताकत को समझना चाहिए।

“क्लर्क को सिर्फ क्लर्क बनाकर मत छोड़िए”

जस्टिस भाटी ने अपने संबोधन में अधिवक्ताओं के क्लर्कों की भूमिका को भी महत्वपूर्ण बताया।

उन्होंने एक घटना का जिक्र किया जब क्लर्क एसोसिएशन के वरिष्ठ क्लर्कों के सम्मान कार्यक्रम में उन्हें पता चला कि उनके कार्यालय के नौ क्लर्कों में से किसी का भी सम्मान नहीं हुआ।

कारण पूछा तो पता चला कि वे सभी नौ लोग आगे चलकर वकील बन चुके थे।

जस्टिस भाटी ने कहा कि यह कहानी युवा अधिवक्ताओं के लिए संदेश है कि पढ़ते रहिए और आगे बढ़ते रहिए।

“किसी युवा को केवल क्लर्क बनाकर मत छोड़िए। उसे जीवन की प्रगतिशील और प्रकाशमान यात्रा पर अपने साथ लेकर चलिए। उसकी प्रगति की जिम्मेदारी भी आपके कंधों पर है।”

उन्होंने क्लर्कों को भी अधिवक्ताओं का “कृष्ण रूपी सारथी” बताया।

जिला न्यायपालिका को किया सलाम

जस्टिस भाटी ने राजस्थान की जिला न्यायपालिका की जमकर सराहना की। उन्होंने कहा कि आम नागरिक के लिए जिला न्यायालय कोई अधीनस्थ व्यवस्था नहीं, बल्कि न्याय का पहला चेहरा है।

उन्होंने कहा कि अपने न्यायिक कार्यकाल के दौरान उनका न्यायिक अधिकारियों के साथ हमेशा सम्मानजनक संबंध रहा। उन्होंने उन्हें न्यायिक व्यवस्था के सहयोगी के बजाय न्याय की साझा यात्रा के महत्वपूर्ण सहभागी के रूप में देखा।

“राजस्थान की न्यायपालिका पुराने मामलों के निस्तारण में अग्रिम पंक्ति में”

जस्टिस भाटी ने “टारगेट केस” की अवधारणा का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि इसका उद्देश्य पुराने मामलों को खत्म करना और नागरिकों को यह विश्वास दिलाना था कि उनका मुकदमा अनिश्चितकाल तक लंबित नहीं रहेगा।

उन्होंने कहा कि कई बार उन्हें लगता था कि टारगेट पूरा करने के लिए लगातार दबाव बनाने के कारण न्यायिक अधिकारी उनसे नाराज होते होंगे। लेकिन उन्हें गर्व है कि राजस्थान की न्यायपालिका पुराने मामलों के निस्तारण में देश की अग्रिम पंक्ति में रही है।

उन्होंने कहा कि इसका श्रेय राजस्थान के प्रत्येक न्यायिक अधिकारी को जाता है, जो कठिन परिस्थितियों में भी न्याय का दीप जलाए रखते हैं।

“कई जगह सड़क और पानी की सुविधा भी नहीं होती, लेकिन वहां न्यायिक अधिकारी संविधान और आखिरी नागरिक के विश्वास की ज्योति जलाए रखते हैं। मैं राजस्थान के हर न्यायिक अधिकारी को सलाम करता हूं।”

ऊंची आवाज से कोई बड़ा वकील नहीं बनतायुवाओं को संदेश

जस्टिस पुष्पेंद्र सिंह भाटी ने अपने विदाई संबोधन में युवा वकीलों को चार सूत्रों में अपनी सीख दी—

“Prepare deeply, speak simply, disagree fearlessly, but disagree courteously.

उन्होंने कहा कि आक्रामकता से कभी प्रभावी वकील नहीं बनता और ऊंची आवाज से कोई बड़ा वकील नहीं बनता। न्यायालय के सामने मजबूत तैयारी, स्पष्ट तर्क और शालीनता ही अधिवक्ता की असली ताकत है।

उन्होंने कहा—

“विश्वसनीयता तक पहुंचने का कोई छोटा मार्ग नहीं है। सत्यनिष्ठा से बड़ी कोई वरिष्ठता नहीं है।”

जस्टिस भाटी ने कहा कि उनका राजस्थान हाईकोर्ट से संबंध पद के साथ समाप्त नहीं होगा। राजस्थान की बार, बेंच, उनके गुरु, सहकर्मी और यहां के लोग उनके विधिक जीवन का ऐसा हिस्सा हैं, जिन्हें वह हमेशा अपने साथ लेकर जाएंगे।

जम्मू-कश्मीर एवं लद्दाख हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश के रूप में नई संवैधानिक जिम्मेदारी संभालने जा रहे जस्टिस भाटी का यह विदाई संबोधन उनके लिए केवल विदाई नहीं, बल्कि उस संस्था के प्रति कृतज्ञता का वक्तव्य रहा, जिसने उनके शब्दों में उन्हें “उनकी स्वयं की संभावनाओं से कहीं अधिक” बनाया

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