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‘अदालत में समस्याएं ब्लैक एंड व्हाइट नहीं, ज्यादातर ग्रे होती हैं : अच्छा वकील वही, जो दलील के साथ उसके सामाजिक प्रभाव को भी समझे-जस्टिस विजय बिश्नोई

Justice Vijay Bishnoi on Law, Free Speech and Judicial Balance: “Real-Life Problems Are Rarely Black and White”

सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस विजय बिश्नोई का लॉ स्टूडेंट को संबोधन ‘असहमति को समझना ही अच्छे संवाद की पहचान: अच्छा वकील वही, जो विचार के साथ उसके सामाजिक प्रभाव को भी समझे.

जयपुर। सुप्रीम कोर्ट के न्यायाधीश जस्टिस विजय बिश्नोई ने देशभर से आए युवा कानून विद्यार्थियों और अधिवक्ताओं को संबोधित करते हुए कहा कि कानून केवल धाराओं, फैसलों और दलीलों का विषय नहीं है।

कानून की वास्तविक समझ तब विकसित होती है, जब व्यक्ति किसी विचार के दोनों पक्षों को सुनने, असहमति को समझने और उसके सामाजिक प्रभाव पर विचार करने की क्षमता विकसित करता है।

जस्टिस विजय बिश्नोई राजस्थान विश्वविद्यालय जयपुर में आयोजित एक कार्यक्रम को मुख्य अतिथि के रूप में संबोधित कर रहे थे।

उन्होंने कहा कि एक अच्छे वकील और न्यायाधीश के लिए संवैधानिक मूल्यों, सामाजिक वास्तविकताओं और किसी कानूनी विचार के व्यावहारिक प्रभाव को समझना भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

जस्टिस बिश्नोई ने अपने संबोधन की शुरुआत हल्के-फुल्के अंदाज में करते हुए कहा कि वे युवा अधिवक्ताओं की तुलना में संक्षिप्त रहने का अपना वादा शायद बेहतर तरीके से निभाएंगे।

उन्होंने कहा कि एक न्यायाधीश अपने जीवन का अधिकांश समय दलीलें सुनने में बिताता है और युवा अधिवक्ताओं की दलीलों से बेहतर किसी सुनने वाले कान के लिए कोई दूसरा ‘टॉनिक’ नहीं हो सकता।

उन्होंने युवा अधिवक्ताओं की उस स्थिति का भी उल्लेख किया, जिसमें वे पूरी तैयारी और थोड़ी घबराहट के साथ अपनी दलीलें रखते हैं।

‘मूट प्रपोजिशन आधुनिक फ्री स्पीच लॉ का लगभग पूरा सिलेबस’

जस्टिस विजय बिश्नोई ने कार्यक्रम में तैयार किए गए मूट कोर्ट प्रपोजिशन की सराहना करते हुए कहा कि इसे तैयार करने वालों ने काफी मेहनत की है।

उनके अनुसार, यह प्रपोजिशन आधुनिक फ्री स्पीच कानून का लगभग पूरा सिलेबस अपने भीतर समेटे हुए है और अगले कुछ दिनों तक प्रतिभागियों के लिए यह उनके अध्ययन और बहस का केंद्र बना रहेगा।

हालांकि, उन्होंने कहा कि वे उन सभी केस लॉ और कानूनी बिंदुओं पर चर्चा नहीं करना चाहते, जिन्हें प्रतिभागी संभवतः पहले ही पढ़ और बहस कर चुके हैं।

इसके बजाय उन्होंने संवैधानिक मूल्यों पर बात करना उचित समझा, जो भविष्य में अदालतों के सामने आने वाली वास्तविक और जटिल परिस्थितियों से निपटने में युवा वकीलों की मदद करेंगे।

‘वास्तविक जिंदगी ब्लैक एंड व्हाइट नहीं, समस्याएं ग्रे होती हैं’

जस्टिस बिश्नोई ने कहा कि मूट कोर्ट की समस्या को जानबूझकर जटिल बनाया गया है ताकि युवा प्रतिभागियों को रचनात्मक ढंग से सोचने का अवसर मिले।

उन्होंने कहा कि वास्तविक जीवन में आने वाली कई कानूनी समस्याओं का कोई स्पष्ट या पहले से तय समाधान नहीं होता।

उन्होंने कहा कि वास्तविक जिंदगी शायद ही कभी पूरी तरह ‘ब्लैक एंड व्हाइट’ होती है, जहां सही और गलत के बीच स्पष्ट रेखा खींची जा सके।

इसके विपरीत, अधिकांश समस्याएं ‘ग्रे’ होती हैं। आज के दौर में, जब भौतिक सीमाओं के अलावा दुनिया में कई सीमाएं तेजी से खत्म हो रही हैं, ऐसी समस्याएं और भी अधिक नैतिक एवं कानूनी रूप से जटिल हो गई हैं।

‘दलील महत्वपूर्ण है, राय नहीं’

अपने चैंबर का उदाहरण देते हुए जस्टिस बिश्नोई ने बताया कि उनके लॉ रिसर्चर्स के साथ प्रत्येक सप्ताह एक डिबेट आयोजित होती है। इसमें एक महत्वपूर्ण नियम है—बहस में आपकी राय से ज्यादा आपकी दलील महत्वपूर्ण है।

उन्होंने कुछ सप्ताह पहले हुई एक बहस का उदाहरण दिया, जिसका विषय था—मारिजुआना को कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए या नहीं।

जस्टिस बिश्नोई ने बताया कि कुछ देशों में व्यक्तिगत और चिकित्सकीय उपयोग के लिए मारिजुआना को अनुमति दी गई है। उन्होंने कहा कि उनका अपना दृष्टिकोण सावधानीपूर्ण है और यह उनके न्यायिक अनुभव से भी प्रभावित होता है।

उन्होंने एनडीपीएस एक्ट से जुड़े मामलों का उदाहरण देते हुए कहा कि जब उनके सामने 18 या 19 वर्ष की उम्र का कोई आरोपी आता है, तो एक ओर उनके सामने इस बात की उम्मीद होती है कि युवा व्यक्ति सुधर सकता है, वहीं दूसरी ओर समाज को नशीले पदार्थों से होने वाले नुकसान से बचाने का दायित्व भी होता है।

उन्होंने कहा कि ऐसे मामले उनके लिए सबसे कठिन मामलों में शामिल होते हैं।

‘असहमति से विचार और मजबूत होता है’

जस्टिस बिश्नोई ने बताया कि बहस के दौरान उनके रिसर्चर्स ने उनके विपरीत पक्ष को बेहद प्रभावी तरीके से रखा। उन्होंने मारिजुआना के संभावित चिकित्सकीय लाभ और व्यक्तिगत स्वायत्तता के सिद्धांत पर अपनी दलीलें रखीं।

उन्होंने कहा कि इस बहस के बाद उनकी अपनी राय नहीं बदली, लेकिन इस अभ्यास से उन्हें अपने ही दृष्टिकोण को बेहतर तरीके से समझने और असहमति रखने वाले लोगों के विचारों के प्रति अधिक सम्मान विकसित करने का अवसर मिला।

उन्होंने कहा कि अच्छा संवाद किसी विचार को पूरी तरह तलाशने का अवसर देता है, लेकिन साथ ही यह भी याद दिलाता है कि बहस के मंच पर प्रभावशाली लगने वाले विचार को वास्तविक दुनिया में लागू किए जाने के बाद उसके सामाजिक प्रभाव की कसौटी पर भी परखा जाना चाहिए।

‘एक अच्छा वकील यही सवाल पूछता है’

जस्टिस बिश्नोई ने कहा कि किसी भी कानूनी विचार को केवल इस आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए कि वह बहस में कितना प्रभावशाली है।

महत्वपूर्ण सवाल यह है कि जब उस विचार को वास्तविक समाज में लागू किया जाएगा, तब उसका क्या प्रभाव पड़ेगा।

उन्होंने कहा कि यही वह सवाल है जो एक अच्छा वकील पूछता है और जिसे एक समझदार न्यायाधीश कभी नहीं भूलता।

उन्होंने कहा कि इस तरह के आयोजन और विषय विद्यार्थियों को अकादमिक चर्चा और वास्तविक जीवन के बीच अंतर समझने का अवसर देते हैं। यही इस प्रकार की बहसों की वास्तविक परीक्षा है।

फ्री स्पीच और संवैधानिक मूल्यों पर जोर

जस्टिस विजय बिश्नोई ने अपने संबोधन को आगे बढ़ाते हुए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और कठिन तथ्यों के सामने संवैधानिक सिद्धांतों के इस्तेमाल के सवाल पर भी चर्चा की।

उन्होंने कहा कि अदालतों के सामने आने वाले मामलों में केवल कानून की किताबों में मौजूद सिद्धांतों को दोहराना पर्याप्त नहीं होता, बल्कि परिस्थितियों, तथ्यों और समाज पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को भी समझना जरूरी है।

उन्होंने फ्री स्पीच के संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट द्वारा ‘heckler’s veto’ की अवधारणा से जुड़े न्यायिक दृष्टिकोण का उल्लेख करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता जैसे संवैधानिक अधिकारों के मामलों में न्यायालयों को संवैधानिक सिद्धांतों और वास्तविक परिस्थितियों के बीच संतुलन को समझना होता है।

उन्होंने युवाओं को रचनात्मक सोच, मजबूत तर्क और संवैधानिक मूल्यों के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया।

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