महेश जोशी के बेटे रोहित जोशी की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज करने का विस्तृत फैसला जारी, हाईकोर्ट ने ACB और स्पेशल जज की कार्यप्रणाली पर उठाए गंभीर सवाल
जयपुर। राजस्थान की राजनीति और प्रशासनिक गलियारों में हलचल मचाने वाले पूर्व मंत्री डॉ. महेश जोशी गिरफ्तारी प्रकरण में राजस्थान हाईकोर्ट ने ऐसा फैसला सुनाया है, जिसने राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB), पुलिस तंत्र और न्यायिक व्यवस्था तीनों के सामने कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
राजस्थान हाईकोर्ट ने डॉ. महेश जोशी की गिरफ्तारी को चुनौती देने वाली महेश जोशी के बेटे रोहित जोशी की हैबियस कॉर्पस याचिका खारिज करने का आपरेटिव पार्ट का फैसला पहले ही सुना दिया था.
हाईकोर्ट ने बुधवार को इस मामले में अपना विस्तृत फैसला जारी करते हुए राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB), पुलिस तंत्र और न्यायिक व्यवस्था पर सख्त टिप्पणीयां की हैं.
जस्टिस उमाशंकर व्यास और जस्टिस अशोक कुमार जैन की खंडपीठ की ओर से जस्टिस अशोक कुमार जैन द्वारा बुधवार को दिए इस फैसले में दर्ज टिप्पणियां राज्य की एसीबी के लिए किसी बड़े झटके से कम नहीं हैं।
हाईकोर्ट ने फैसले में साफ कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई दस्तावेज नहीं है जिससे साबित हो कि गिरफ्तार किए गए व्यक्ति को गिरफ्तारी के वास्तविक आधार बताए गए थे।
इतना ही नहीं, कोर्ट ने यह तक कह दिया कि राजस्थान पुलिस, विशेष रूप से एसीबी को “ग्राउंड ऑफ अरेस्ट” की मूलभूत समझ तक नहीं है।

हाईकोर्ट की सबसे बड़ी टिप्पणी
फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि एसीबी ने केवल अपराध की धाराएं बताकर गिरफ्तारी कर ली, जबकि कानून के अनुसार आरोपी को यह बताना अनिवार्य है कि उसकी भूमिका क्या है, उसके खिलाफ क्या सामग्री है और किन कारणों से उसकी गिरफ्तारी आवश्यक समझी गई।
खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि “गिरफ्तारी का कारण” और “गिरफ्तारी का आधार” दोनों अलग-अलग बातें हैं। केवल एफआईआर या धाराओं का उल्लेख करना संविधान और कानून की आवश्यकताओं को पूरा नहीं करता।
ACB के जवाबों में मिले विरोधाभास, कोर्ट बोली “मैनिपुलेटेड फैक्ट्स”
सुनवाई के दौरान अदालत के सामने एसीबी द्वारा दिए गए अलग-अलग जवाब भी चर्चा का विषय बने।
प्रारंभिक जवाब में दावा किया गया कि डॉ. महेश जोशी को गिरफ्तारी के आधार बताए गए थे।
बाद में दाखिल विस्तृत जवाब में कहा गया कि परिवार को जानकारी दी गई थी।
हाईकोर्ट ने इन विरोधाभासों पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि बाद में पेश किए गए कई तथ्य प्रारंभिक जवाब में नहीं थे और यह सुरक्षित रूप से कहा जा सकता है कि एसीबी ने बाद में “मैनिपुलेटेड फैक्ट्स” प्रस्तुत किए।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यहां तक कहा कि रिकॉर्ड पर मौजूद परिस्थितियां दस्तावेजों में संभावित हेरफेर की ओर संकेत करती हैं।
हालांकि भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों की जांच प्रभावित न हो, इसलिए अदालत ने इस पहलू पर विस्तृत निष्कर्ष देने से फिलहाल परहेज किया, लेकिन भविष्य में इस मुद्दे को उठाने का रास्ता खुला रखा।
स्पेशल जज की भूमिका पर भी सवाल
फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने केवल एसीबी को ही नहीं, बल्कि विशेष न्यायाधीश की भूमिका पर भी सवाल उठाए जिसने गिरफ्तारी के दिन पुलिस रिमांड मंजूर किया था।
हाईकोर्ट ने कहा कि डॉ. महेश जोशी की ओर से 7 मई को ही गिरफ्तारी की वैधता पर आपत्ति उठाई गई थी और सुप्रीम कोर्ट के निर्णयों का हवाला भी दिया गया था।
इसके बावजूद संबंधित न्यायाधीश ने उस आवेदन पर तत्काल निर्णय नहीं लिया और रिमांड दे दिया।
खंडपीठ ने कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि जब किसी आरोपी को रिमांड के लिए अदालत में पेश किया जाए तो न्यायिक अधिकारी का यह दायित्व है कि वह यह सुनिश्चित करे कि अनुच्छेद 22(1) के तहत गिरफ्तारी संबंधी सभी संवैधानिक अधिकारों का पालन हुआ है या नहीं।
क्या कहा सुप्रीम कोर्ट ने?
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के कई महत्वपूर्ण फैसलों का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने दोहराया कि गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी के आधार लिखित रूप में उसकी समझ की भाषा में बताना अनिवार्य है।
यदि ऐसा नहीं किया जाता तो यह केवल प्रक्रिया की त्रुटि नहीं बल्कि संविधान के अनुच्छेद 22(1) के तहत प्रदत्त मौलिक अधिकार का उल्लंघन माना जाएगा।
कोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के आधार बताने का उद्देश्य केवल सूचना देना नहीं, बल्कि आरोपी को अपने बचाव का अवसर उपलब्ध कराना है ताकि वह जमानत या अन्य कानूनी उपायों का उपयोग कर सके।
फिर भी क्यों खारिज हुई याचिका?
फैसले का सबसे दिलचस्प पहलू यह रहा कि हाईकोर्ट ने कानून के अनिवार्य प्रावधानों के उल्लंघन की बात स्वीकार करने के बावजूद याचिका खारिज कर दी।
हाईकोर्ट ने कहा कि गिरफ्तारी के तुरंत बाद आरोपी को विशेष न्यायाधीश के समक्ष पेश किया गया था और बाद में कई न्यायिक रिमांड आदेश पारित हो चुके हैं।
चूंकि अब हिरासत न्यायालयों के आदेशों पर आधारित है, इसलिए हैबियस कॉर्पस याचिका के जरिए गिरफ्तारी को अवैध घोषित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता के पास विशेष न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश को कानून के अनुसार चुनौती देने का विकल्प खुला है।
राजस्थान पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को ट्रेनिंग देने के निर्देश
फैसले के अंत में हाईकोर्ट ने बेहद महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि राजस्थान पुलिस और राज्य के न्यायिक अधिकारियों को सुप्रीम कोर्ट द्वारा जारी गिरफ्तारी संबंधी दिशा-निर्देशों का विशेष प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए।
कोर्ट ने माना कि यदि शुरुआती स्तर पर ही संवैधानिक प्रावधानों का सही पालन सुनिश्चित किया जाए तो ऐसे विवाद उत्पन्न ही नहीं होंगे।
इसी उद्देश्य से अदालत ने आदेश की प्रति राजस्थान हाईकोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और राज्य सरकार के अतिरिक्त मुख्य सचिव (गृह) को भेजने के निर्देश दिए हैं।
फैसले का दुरगामी असर
महेश जोशी प्रकरण में आया यह फैसला केवल एक गिरफ्तारी विवाद तक सीमित नहीं माना जा रहा।
हाईकोर्ट का यह फैसला भविष्य में राजस्थान पुलिस, एसीबी और ट्रायल कोर्टों के लिए एक महत्वपूर्ण मार्गदर्शक साबित होगा।
फैसले ने यह स्पष्ट कर दिया है कि किसी भी व्यक्ति की स्वतंत्रता से जुड़ा मामला केवल औपचारिक कार्रवाई का विषय नहीं है।
गिरफ्तारी के समय संविधान और कानून द्वारा निर्धारित प्रत्येक प्रक्रिया का अक्षरशः पालन करना अनिवार्य है, अन्यथा पूरी कार्रवाई न्यायिक जांच के दायरे में आ सकती है।
यही कारण है कि भले ही डॉ. महेश जोशी की याचिका खारिज हो गई हो, लेकिन हाईकोर्ट की तीखी टिप्पणियां आने वाले समय में राजस्थान की जांच एजेंसियों और न्यायिक तंत्र के लिए बड़े सबक के रूप में देखी जा रही हैं।