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NLU जोधपुर के छात्र ने खटखटाया हाईकोर्ट का दरवाजा, दावा-जिस समारोह में मुख्यमंत्री थे मुख्य अतिथि, उसी दीक्षांत समारोह से पांच मिनट पहले टॉपर से छीने गए दो गोल्ड मेडल!

NLU Jodhpur Gold Medal Controversy Reaches Rajasthan High Court, Student Claims Medals Snatched Minutes Before Convocation

मेरे नाम के मेडल और सर्टिफिकेट तैयार थे, लेकिन मंच पर पहुंचने से पहले कहा गया-आपको गोल्ड मेडल नहीं मिलेगा”

जोधपुर। देश की प्रतिष्ठित विधि शिक्षण संस्थाओं में शामिल नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी (NLU) जोधपुर एक गंभीर विवाद के केंद्र में आ गई है।

एलएलएम (आईपीआर) के छात्र अनुज शुक्ला ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर आरोप लगाया है कि विश्वविद्यालय ने 17वें दीक्षांत समारोह में उन्हें दिए जाने वाले दो गोल्ड मेडल अंतिम क्षणों में रोक दिए।

इतना ही नहीं, छात्र का दावा है कि उसके नाम से तैयार मेडल और प्रमाणपत्र भी बाद में किसी अन्य छात्र को दे दिए गए।

गौरतलब है कि इस दीक्षांत समारोह के मुख्य अतिथि के रूप में खुद राज्य के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा शामिल हुए थे, वहीं राज्य के लॉ मिनिस्टर जोगाराम पटेल विशिष्ट अतिथि के रूप में शामिल हुए थे।

इस मामले में राजस्थान हाईकोर्ट ने सुनवाई करते हुए विश्वविद्यालय से जवाब मांगा है और याचिकाकर्ता की मार्कशीट जारी करने संबंधी निर्देशों पर भी स्थिति स्पष्ट करने को कहा है।

यह मामला अब केवल एक छात्र के गोल्ड मेडल का नहीं रह गया, बल्कि देशभर में प्रसिद्ध एनएलयू जोधपुर विश्वविद्यालय प्रशासन की पारदर्शिता, परीक्षा प्रणाली, पुनर्मूल्यांकन प्रक्रिया और अकादमिक निर्णयों की वैधता पर भी बड़े सवाल खड़े कर रहा है।

क्या है पूरा मामला?

हाईकोर्ट में दायर याचिका के अनुसार, अनुज शुक्ला एलएलएम (IPR) बैच 2023-24 के छात्र हैं।

उनका कहना है कि विश्वविद्यालय की गोल्ड मेडल कमेटी की 8 फरवरी 2025 की बैठक में उन्हें दो गोल्ड मेडल देने की अनुशंसा की गई थी, जिसे 15 फरवरी 2025 को अकादमिक काउंसिल ने भी मंजूरी दे दी थी।

शुक्रवार को याचिकाकर्ता लॉ स्टूडेंट ने स्वंय ही मामले की पैरवी कर अदालत के समक्ष अपना पक्ष रखा

याचिका में कहा गया है कि 23 फरवरी 2025 को आयोजित 17वें दीक्षांत समारोह में उन्हें गोल्ड मेडल मिलने की पूरी तैयारी थी।

विश्वविद्यालय द्वारा जारी दीक्षांत समारोह की ब्रोशर में भी उनका नाम शामिल था और अतिथियों व गणमान्य व्यक्तियों के बीच यही जानकारी साझा की गई थी।

लेकिन समारोह शुरू होने से महज पांच मिनट पहले एक फैकल्टी सदस्य और कंट्रोलर ऑफ एग्जामिनेशन (COE) ने बताया कि उन्होंने री-इवैल्यूएशन के लिए आवेदन किया था, इसलिए उन्हें गोल्ड मेडल नहीं दिया जाएगा।

छात्र अनुज शुक्ला ने केवल निष्पक्षता और पारदर्शिता की मांग की है। उनका आरोप है कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने उन्हें उचित सुनवाई का अवसर नहीं दिया और अंतिम समय में मनमाने ढंग से निर्णय बदल दिया।

उन्होंने हाईकोर्ट से मांग की है कि पूरे मामले की न्यायिक जांच हो, गोल्ड मेडल आवंटन प्रक्रिया की समीक्षा की जाए और उन्हें न्याय दिलाया जाए।

82 नंबर से घटाकर कर दिए 65 नंबर

याचिका में छात्र ने बताया कि उन्होंने एलएलएम प्रथम सेमेस्टर में “रिसर्च मेथोडोलॉजी” विषय की उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन किया था।

मूल परीक्षा में उन्हें 100 में से 82 अंक मिले थे, लेकिन पुनर्मूल्यांकन के बाद अंक घटाकर 65 कर दिए गए।

छात्र का कहना है कि इतने बड़े अंतर से अंक कम होना अप्रत्याशित था। उन्होंने इस संबंध में परीक्षा नियंत्रक को ईमेल भी भेजा और उत्तर पुस्तिका देखने का अवसर मांगा, लेकिन कोई जवाब नहीं मिला।

याचिका के अनुसार, इसके बावजूद उन्होंने दूसरे सेमेस्टर में बेहतर प्रदर्शन किया और एलएलएम की दोनों स्ट्रीम में अपने बैच में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए।

अंक घटने पर पुराने अंक ही मान्य रहेंगे

मामले का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यह है कि छात्र ने दावा किया है कि पुनर्मूल्यांकन परिणाम आने के बाद विश्वविद्यालय के परीक्षा विभाग ने उन्हें बताया था कि यदि अंकों में 10 प्रतिशत से अधिक वृद्धि होती है तो नए अंक लागू होंगे, अन्यथा मूल अंक ही मान्य रहेंगे।

छात्र ने यह भी दावा किया कि यही प्रक्रिया अन्य विद्यार्थियों के मामलों में भी अपनाई जाती रही है।

यानी विश्वविद्यालय ने पहले मूल अंक मानकर छात्र को टॉपर घोषित किया, गोल्ड मेडल के लिए चयनित किया और फिर दीक्षांत समारोह के ठीक पहले अचानक निर्णय बदल दिया।

गोल्ड मेडल रोकिए, सुनवाई कर लीजिए-COE ने नहीं मानी बात

याचिका में कहा गया है कि जब अनुज शुक्ला को गोल्ड मेडल नहीं दिए जाने की सूचना मिली तो उन्होंने परीक्षा नियंत्रक से निष्पक्ष सुनवाई का अवसर देने का अनुरोध किया।

छात्र के अनुसार, COE ने न केवल सुनवाई से इनकार कर दिया बल्कि दूसरे कर्मचारियों से नियमों की पुष्टि करवाने की कोशिश की, जो स्वयं स्पष्ट उत्तर नहीं दे पा रहे थे।

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया कि परीक्षा विभाग के एक कर्मचारी ने छात्र से कहा कि “इस अवसर का अनुचित लाभ मत उठाइए।”

छात्र ने विश्वविद्यालय प्रशासन से यह भी कहा कि यदि अंक या नियमों को लेकर भ्रम है तो अंतिम मार्कशीट और डिग्री प्रमाणपत्र की दोबारा जांच कर ली जाए, क्योंकि उन्हें संबंधित अधिकारियों द्वारा सत्यापित और हस्ताक्षरित किया जा चुका था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया।

“मेरे नाम के मेडल किसी और को दे दिए गए”

अनुज शुक्ला ने अपनी याचिका में गंभीर आरोप लगाया है कि समारोह के दौरान उनके नाम से तैयार दोनों गोल्ड मेडल और प्रमाणपत्र बाद में दूसरे छात्र को दे दिए गए।

याचिका में कहा गया है कि जब तक छात्र अपनी बात रखने की कोशिश करता रहा, तब तक कुलपति दीक्षांत समारोह में व्यस्त थे।

बाद में COE द्वारा निर्णय बदल दिया गया और दोनों गोल्ड मेडल प्रतिवादी नंबर-3 को प्रदान कर दिए गए। जबकि मेडल और प्रमाणपत्रों पर पहले से याचिकाकर्ता का नाम अंकित था।

यदि यह आरोप सही साबित होता है तो यह केवल प्रशासनिक लापरवाही नहीं, बल्कि अकादमिक प्रक्रियाओं की गंभीर विफलता मानी जाएगी।

बैक डेट में जारी हुई नई मार्कशीट!

याचिका में एक और चौंकाने वाला दावा किया गया है। छात्र का कहना है कि उन्होंने विश्वविद्यालय प्रशासन, कुलाधिपति और कुलपति के समक्ष भी मामला उठाया, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं हुई।

इसके बाद 17 मार्च 2025 को परीक्षा विभाग ने नई मार्कशीट जारी की, जिसे 23 फरवरी 2025 की तारीख में सत्यापित और हस्ताक्षरित बताया गया। छात्र ने इसे “बैक डेट” में दस्तावेज जारी करने का मामला बताया है।

यानी छात्र का आरोप है कि दीक्षांत समारोह के बाद दस्तावेज तैयार किए गए, लेकिन उन पर पुरानी तारीख डालकर यह दिखाने की कोशिश की गई कि निर्णय पहले ही लिया जा चुका था।

RTI से मांगी बैठक की कार्यवाही

अनुज शुक्ला ने इस पूरे घटनाक्रम के बाद सूचना के अधिकार (RTI) के तहत 23 फरवरी 2025 की बैठक की कार्यवाही की जानकारी भी मांगी है।

याचिका में कहा गया है कि गोल्ड मेडल देने का अधिकार केवल अकादमिक काउंसिल के पास है, जैसा कि नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी एक्ट, 1999 की धारा 15(k) में उल्लेखित है। ऐसे में अंतिम समय में निर्णय बदलना नियमों के विपरीत है।

हाईकोर्ट में क्या हुआ?

राजस्थान हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता लॉ स्टूडेंट की इस याचिका पर शुक्रवार, 22 मई को सुनवाई हुई।

हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान प्रतिवादी विश्वविद्यालय की ओर से पेश अधिवक्ता ने आवेदन पर जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा।

इसके बाद जस्टिस संजीत पुरोहित ने मामले को जुलाई 2026 के दूसरे सप्ताह में सूचीबद्ध करने के आदेश दिए।

कोर्ट ने अंतरिम रूप से यह भी कहा कि विश्वविद्यालय याचिकाकर्ता की मार्कशीट जारी करने के संबंध में आवश्यक निर्देश पूरे करे।

कई बड़े सवालों के घेरे में राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय

यह पूरा मामला कई गंभीर प्रश्न खड़े कर रहा है—

यदि पुनर्मूल्यांकन के बाद अंक घटे थे तो छात्र को पहले टॉपर और गोल्ड मेडल विजेता क्यों घोषित किया गया?

क्या विश्वविद्यालय की परीक्षा शाखा और अकादमिक परिषद के बीच समन्वय की कमी थी?

क्या अंतिम क्षण में नियम बदले गए?

क्या किसी छात्र के नाम से तैयार मेडल किसी अन्य को दिए जा सकते हैं?

यदि मार्कशीट बाद में जारी हुई तो उस पर पुरानी तारीख क्यों डाली गई?

क्या विश्वविद्यालय ने छात्र को सुनवाई का अवसर दिए बिना निर्णय लिया?

इन सवालों के जवाब अब अदालत की कार्यवाही और विश्वविद्यालय के आधिकारिक जवाब से सामने आएंगे।

शिक्षा जगत में चर्चा का विषय बना मामला

देशभर के विधि शिक्षण संस्थानों में यह मामला चर्चा का विषय बन गया है।

कानूनी शिक्षा से जुड़े विशेषज्ञों का मानना है कि यदि किसी छात्र को दीक्षांत समारोह से ठीक पहले इस तरह सम्मान से वंचित किया जाता है, तो यह केवल प्रशासनिक निर्णय नहीं बल्कि छात्र के शैक्षणिक और मानसिक अधिकारों से भी जुड़ा मामला बन जाता है।

विशेषज्ञों का कहना है कि विश्वविद्यालयों की परीक्षा और पुनर्मूल्यांकन प्रणाली पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए। यदि नियम स्पष्ट नहीं होंगे तो विद्यार्थियों का संस्थानों पर विश्वास कमजोर होगा।

विश्वविद्यालय की ओर से फिलहाल विस्तृत जवाब नहीं

अदालत में विश्वविद्यालय की ओर से अभी विस्तृत जवाब दाखिल नहीं किया गया है। सुनवाई के दौरान विश्वविद्यालय के वकील ने समय मांगा है। ऐसे में मामले के सभी तथ्यों पर अंतिम स्थिति आगामी सुनवाई के बाद ही स्पष्ट हो सकेगी।

हालांकि अदालत ने मार्कशीट संबंधी निर्देशों पर विश्वविद्यालय से जवाब तलब कर मामले को गंभीरता से लिया है।

प्रतिष्ठित संस्थान पर साख का संकट

नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी, जोधपुर देश के शीर्ष विधि विश्वविद्यालयों में गिनी जाती है। यहां से निकलने वाले छात्र न्यायपालिका, कॉर्पोरेट सेक्टर और अंतरराष्ट्रीय संस्थानों तक में महत्वपूर्ण पदों पर कार्यरत हैं।

ऐसे प्रतिष्ठित संस्थान में गोल्ड मेडल जैसे सर्वोच्च अकादमिक सम्मान को लेकर विवाद सामने आना विश्वविद्यालय की साख पर भी असर डाल सकता है।

अब सबकी नजर जुलाई 2026 में होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी है, जहां यह स्पष्ट हो सकता है कि आखिर दीक्षांत समारोह से पांच मिनट पहले ऐसा क्या हुआ कि एक छात्र के हाथों से दो गोल्ड मेडल छीन लिए गए।

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