नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाते हुए साफ कर दिया कि कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे पैरा-टीचर्स (Para-Teachers) सिर्फ लंबे समय तक सेवा देने के आधार पर स्थायी सरकारी नौकरी (Regularisation) का दावा नहीं कर सकते।
कोर्ट ने कहा कि ऐसा करने से सरकारी भर्ती की पूरी प्रक्रिया कमजोर हो जाएगी और नियमों के बाहर एक समानांतर व्यवस्था बन जाएगी।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एसवीएन भट्टी की बेंच ने कहा कि पैरा-टीचर्स का सरकारी शिक्षक बनने की इच्छा रखना स्वाभाविक है। लेकिन यह तय करना कि कौन व्यक्ति सरकारी शिक्षक बनने के योग्य है, यह पूरी तरह राज्य का अधिकार है।
कोर्ट ने साफ कहा कि राज्य की जिम्मेदारी है कि वह छात्रों को बेहतर से बेहतर शिक्षक उपलब्ध कराए, इसलिए वह अपने मानकों के आधार पर ही चयन करेगा।
‘सिर्फ अनुभव नहीं शिक्षा की गुणवत्ता भी जरूरी’
कोर्ट ने यह भी कहा कि भले ही पैरा-टीचर्स वर्षों से काम कर रहे हों, लेकिन सिर्फ अनुभव के आधार पर उन्हें स्थायी नौकरी देना सही नहीं है।
ऐसा करने से सरकारी भर्ती के नियमों का उल्लंघन होगा और यह संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के खिलाफ जाएगा, जो समान अवसर की बात करते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह स्वाभाविक है कि पैरा-टीचर्स सरकारी शिक्षक बनना चाहते हैं, लेकिन सरकार का दायित्व सिर्फ नियुक्ति देना नहीं, बल्कि छात्रों को बेहतर और योग्य शिक्षक उपलब्ध कराना भी है।
कोर्ट ने कहा कि शिक्षा व्यवस्था को केवल अस्थायी उपायों (ad hoc measures) के सहारे नहीं चलाया जा सकता।
झारखंड के पैरा-टीचर्स का मामला
यह मामला झारखंड में सर्व शिक्षा अभियान (SSA) के तहत नियुक्त हजारों पैरा-टीचर्स से जुड़ा था।
ये शिक्षक 5 से 15 साल तक संविदा पर काम कर रहे थे और उन्हें लगभग ₹7,400 से ₹8,400 प्रतिमाह मानदेय दिया जा रहा था।
पैरा-टीचर्स ने सुप्रीम कोर्ट में मांग की थी कि:
- उन्हें नियमित सहायक शिक्षक (Assistant Teacher/Sahayak Acharya) बनाया जाए।
- नियमित शिक्षकों के बराबर वेतन दिया जाए।
- और झारखंड भर्ती नियमों में स्वतः समायोजन (automatic absorption) का प्रावधान न होने को असंवैधानिक घोषित किया जाए।
‘काम एक जैसा, वेतन अलग क्यों?’-पैरा-टीचर्स की दलील
पैरा-टीचर्स का कहना था कि वे वही काम कर रहे हैं जो नियमित सरकारी शिक्षक करते हैं।
उन्होंने यह भी कहा कि उनकी नियुक्ति प्रक्रिया भी काफी हद तक वैसी ही थी जैसी स्थायी शिक्षकों की होती है। इसके अलावा उन्होंने वेतन में भारी अंतर का मुद्दा भी उठाया।
राज्य का जवाब-‘नियमों के बाहर नहीं हो सकती भर्ती’
झारखंड सरकार ने कोर्ट में कहा कि पैरा-टीचर्स की नियुक्ति केवल एक केंद्रीय योजना के तहत संविदा आधार पर की गई थी। और उन्हें स्थायी नौकरी का कोई अधिकार नहीं है।
सरकार का कहना था कि यदि अदालत सीधे नियमितीकरण का आदेश देती है, तो यह संविधान के Article 14 और 16 के तहत तय सार्वजनिक भर्ती प्रक्रिया का उल्लंघन होगा।
हाई कोर्ट का फैसला बरकरार
इस मामले में पहले Jharkhand High Court ने पैरा-टीचर्स की याचिका खारिज कर दी थी।
अब सुप्रीम कोर्ट ने भी उस फैसले में दखल देने से इनकार कर दिया और हाई कोर्ट के निर्णय को सही ठहराया। कोर्ट ने पैरा-टीचर्स की स्वतः नियमितीकरण की मांग खारिज कर दी।
हालांकि, अदालत ने झारखंड सरकार को निर्देश दिया कि वह नियमित भर्ती प्रक्रिया समय-समय पर आयोजित करे और पैरा-टीचर्स के लिए आरक्षित पदों को जल्द भरे।
कोर्ट ने अपने फैसले में Secretary State of Karnataka v Umadevi का भी हवाला दिया।
इस ऐतिहासिक फैसले में भी कहा गया था कि सरकारी नौकरी में नियमितीकरण (regularisation) नियमों के अनुसार ही होना चाहिए, न कि सिर्फ लंबे समय तक काम करने के आधार पर।
अदालत ने माना कि पैरा-टीचर्स की उम्मीद (legitimate expectation) जरूर बनती है, लेकिन यह सरकार पर बाध्यकारी अधिकार नहीं बन जाता।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को भी लगाई फटकार
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने नियमितीकरण की मांग स्वीकार नहीं की, लेकिन झारखंड सरकार की आलोचना भी की।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार को समय-समय पर भर्ती प्रक्रिया निकालनी चाहिए थी, ताकि पैरा-टीचर्स को नियमित पदों पर आने का अवसर मिल सके।
अदालत ने कहा कि सरकार 2012 और 2022 के नियमों के तहत आरक्षित 50% पदों पर पैरा-टीचर्स की भर्ती के लिए जल्द अधिसूचना जारी करे।
फिर भी राहत-50% सीटें पैरा-टीचर्स के लिए
हालांकि कोर्ट ने पैरा-टीचर्स की मांग को पूरी तरह खारिज नहीं किया।
कोर्ट ने बताया कि झारखंड सरकार ने पहले से ही एक नियम बनाया है, जिसमें 50% पद पैरा-टीचर्स के लिए आरक्षित हैं।
साथ ही कोर्ट ने राज्य सरकार को निर्देश दिया कि वह इन पदों पर नियमित भर्ती प्रक्रिया जल्द शुरू करे।
कोर्ट ने यह भी माना कि अगर शिक्षकों को नौकरी की सुरक्षा नहीं होगी, तो वे बेहतर तरीके से काम नहीं कर पाएंगे।
कोर्ट ने कहा कि शिक्षक और छात्र का रिश्ता अस्थायी नहीं होता, बल्कि लंबे समय तक चलता है। ऐसे में कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे शिक्षक से पूरी जिम्मेदारी की उम्मीद करना सही नहीं है।
‘एड-हॉक सिस्टम खत्म करना जरूरी’
कोर्ट ने सरकार को सलाह दी कि वह शिक्षा व्यवस्था को मजबूत बनाए और अस्थायी (ad-hoc) व्यवस्था को धीरे-धीरे खत्म करे।
कोर्ट ने कहा कि सिर्फ शिक्षा देना ही लक्ष्य नहीं होना चाहिए, बल्कि अच्छी और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देना जरूरी है।
अदालत ने टिप्पणी की कि जिस शिक्षक को खुद अपनी नौकरी की सुरक्षा नहीं है, उससे बच्चों का भविष्य सुरक्षित करने की उम्मीद करना गलत सोच है।
कोर्ट का अंतिम फैसला: डॉ. राधाकृष्णन का भी जिक्र
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम निर्णय में कहा कि केवल लंबे समय तक संविदा पर काम करने के आधार पर नियमित सरकारी नौकरी का दावा नहीं किया जा सकता। अदालत ने स्पष्ट किया कि सार्वजनिक भर्ती संविधान के Article 14, 16 और 309 के तहत तय नियमों के अनुसार ही होगी।
कोर्ट का फैसला एक संतुलन बनाने की कोशिश है, एक तरफ पैरा-टीचर्स की उम्मीदें और उनका अनुभव और दूसरी तरफ राज्य की जिम्मेदारी कि वह योग्य और प्रशिक्षित शिक्षकों की भर्ती करे।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि सरकारी नौकरी कोई अधिकार नहीं, बल्कि एक प्रक्रिया है, जिसे नियमों के तहत ही पूरा किया जाना चाहिए। लेकिन साथ ही कोर्ट ने यह भी संकेत दिया है कि सरकार को पैरा-टीचर्स के अनुभव को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए और उन्हें उचित अवसर देना चाहिए।
फैसले के अंत में सुप्रीम कोर्ट ने भारत के पूर्व राष्ट्रपति और शिक्षाविद डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन का उल्लेख करते हुए कहा कि शिक्षा की गुणवत्ता इस बात पर निर्भर करती है कि समाज किस तरह के शिक्षक चुनता है।
यह फैसला आने वाले समय में शिक्षा व्यवस्था और सरकारी भर्ती दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण दिशा तय कर सकता है।