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एक FIR से नहीं बनेगा (BNS-111) ‘ऑर्गेनाइज्ड क्राइम’: राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

Rajasthan High Court Clarifies Scope of Organised Crime Under BNS Section 111, Says One FIR Is Not Enough

हाईकोर्ट ने कहा- धारा 111 लगाने के लिए जरूरी है लगातार आपराधिक गतिविधि और कई चार्जशीटें; ट्रायल कोर्ट केवल “पोस्ट ऑफिस” की तरह काम नहीं कर सकती, पहली बार BNS की धारा 111 की विस्तृत व्याख्या करते हुए महत्वपूर्ण फैसला

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने साइबर अपराध और संगठित अपराध (Organised Crime) को लेकर एक महत्वपूर्ण और दूरगामी प्रभाव वाला फैसला सुनाते हुए कहा है कि केवल एक आपराधिक घटना या कुछ लोगों के एक साथ शामिल होने भर से किसी मामले को “ऑर्गेनाइज्ड क्राइम” नहीं माना जा सकता।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 111 के तहत संगठित अपराध साबित करने के लिए “सतत अवैध गतिविधि”, पूर्व से सक्रिय आपराधिक सिंडिकेट और एक से अधिक चार्जशीट जैसी कानूनी शर्तों का होना अनिवार्य है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह महत्वपूर्ण टिप्पणी श्रीगंगानगर के विनय बघला, हंसराज और प्रशांत सोनी द्वारा दायर क्रिमिनल रिवीजन याचिका पर सुनवाई करते हुए की।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में ट्रायल कोर्ट द्वारा लगाए गए संगठित अपराध से जुड़े आरोपों की वैधानिकता पर विस्तार से वर्णन किया है।

क्या है मामला

मामला श्रीगंगानगर के पुरानी आबादी थाना क्षेत्र में दर्ज एक साइबर फ्रॉड केस से जुड़ा है।

पुलिस के अनुसार 2 नवंबर 2024 को गश्त के दौरान पुलिस को सूचना मिली थी कि कुछ लोग विभिन्न व्यक्तियों के बैंक खातों, एटीएम कार्ड और चेक बुक का इस्तेमाल साइबर ठगी की रकम निकालने के लिए कर रहे हैं।

सूचना के आधार पर पुलिस ने विनय बघला को पकड़ा, जिसके पास से कई बैंक दस्तावेज और एटीएम कार्ड बरामद किए गए।

पुलिस जांच में आरोप लगाया गया कि साइबर फ्रॉड से प्राप्त रकम विभिन्न बैंक खातों के जरिए निकाली जाती थी और इसे क्रिप्टोकरेंसी USDT के लेनदेन में इस्तेमाल किया जाता था।

पुलिस ने इस आधार पर भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 सहित कई गंभीर धाराओं में मामला दर्ज कर लिया।

याचिकाकर्ता की ओर से दलीलें

याचिकाकर्ताओं विनय बघला, हंसराज और प्रशांत सोनी की ओर से अधिवक्ता एस.आर. गोदारा ने हाईकोर्ट में तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट ने बिना पर्याप्त कानूनी आधार के भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा 111 (Organised Crime) सहित गंभीर धाराओं में आरोप तय कर दिए।

अधिवक्ता ने कहा कि रिकॉर्ड पर ऐसा कोई ठोस साक्ष्य नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि याचिकाकर्ता किसी “ऑर्गेनाइज्ड क्राइम सिंडिकेट” का हिस्सा थे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से कहा गया कि पुलिस ने केवल एक FIR और एक कथित घटना के आधार पर धारा 111 लगा दी, जबकि कानून के अनुसार “continuing unlawful activity” साबित करने के लिए पिछले 10 वर्षों में एक से अधिक चार्जशीट और उन पर सक्षम अदालत द्वारा संज्ञान लिया जाना आवश्यक है।

अधिवक्ता ने दलील दी कि केवल कई लोगों का किसी घटना में शामिल होना “ऑर्गेनाइज्ड क्राइम” नहीं बनाता।

इसके लिए यह साबित होना जरूरी है कि आरोपी पहले से संगठित आपराधिक गिरोह के रूप में कार्य कर रहे थे और लगातार आपराधिक गतिविधियों में संलिप्त थे।

याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी कहा गया कि ट्रायल कोर्ट ने बिना न्यायिक विवेक का इस्तेमाल किए केवल चार्जशीट में लिखे आरोपों को स्वीकार कर लिया। अदालत का कर्तव्य था कि वह यह देखती कि आरोपित अपराधों के आवश्यक कानूनी तत्व रिकॉर्ड पर मौजूद हैं या नहीं।

याचिकाकर्ताओं ने यह भी तर्क दिया कि यदि प्रत्येक सामूहिक अपराध या साइबर फ्रॉड मामले में धारा 111 जैसी कठोर धाराएं लगा दी जाएं, तो सामान्य आपराधिक कानून और संगठित अपराध कानून के बीच का अंतर ही समाप्त हो जाएगा।

राज्य सरकार की ओर से दलीलें

राज्य सरकार की ओर से लोक अभियोजक एस.आर. चौधरी ने अदालत में कहा कि जांच के दौरान यह सामने आया कि आरोपियों के पास से कई व्यक्तियों के बैंक खाते, एटीएम कार्ड, चेक बुक और बैंकिंग दस्तावेज बरामद हुए थे, जिनका उपयोग साइबर फ्रॉड से प्राप्त रकम निकालने के लिए किया जा रहा था।

सरकार की ओर से कहा गया कि जांच में यह भी सामने आया कि साइबर ठगी से प्राप्त रकम को विभिन्न बैंक खातों के माध्यम से घुमाकर USDT क्रिप्टोकरेंसी के लेनदेन में इस्तेमाल किया जा रहा था। पुलिस के अनुसार यह पूरा नेटवर्क योजनाबद्ध तरीके से संचालित किया जा रहा था और इसमें कई लोग शामिल थे।

राज्य सरकार ने अदालत में तर्क दिया कि आरोप तय करने के चरण पर विस्तृत साक्ष्य परीक्षण की आवश्यकता नहीं होती। यदि रिकॉर्ड पर प्रथमदृष्टया आरोप बनते दिखाई देते हैं, तो ट्रायल कोर्ट आरोप तय कर सकती है और मुकदमे को आगे बढ़ाया जा सकता है।

सरकार की ओर से यह भी कहा गया कि साइबर अपराध अब संगठित स्वरूप ले चुके हैं और आर्थिक लाभ के लिए कई लोग मिलकर योजनाबद्ध तरीके से अपराध कर रहे हैं।

इसलिए ऐसे मामलों में BNS की धारा 111 लगाने का उद्देश्य गंभीर और संरचित आर्थिक अपराधों पर प्रभावी कार्रवाई करना है।

हाईकोर्ट ने कहा-ट्रायल कोर्ट “पोस्ट ऑफिस” नहीं

हालांकि हाईकोर्ट ने धारा 111 की व्याख्या करते हुए कहा कि केवल आरोपों या एक घटना के आधार पर किसी मामले को “ऑर्गेनाइज्ड क्राइम” नहीं माना जा सकता, बल्कि इसके लिए कानून में निर्धारित सभी आवश्यक शर्तों का पूरा होना जरूरी है।

फैसले में हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट की भूमिका पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

कोर्ट ने कहा कि आरोप तय करते समय अदालत केवल पुलिस की चार्जशीट को यांत्रिक तरीके से स्वीकार नहीं कर सकती।

अदालत का यह दायित्व है कि वह यह जांचे कि आरोपित अपराध के आवश्यक कानूनी तत्व प्रथमदृष्टया मौजूद हैं या नहीं।

कोर्ट ने कहा कि यदि बिना पर्याप्त आधार के गंभीर धाराएं लगा दी जाएं, तो यह किसी व्यक्ति को अनावश्यक आपराधिक मुकदमे और कठोर दंड प्रक्रिया में धकेलने जैसा होगा। इसलिए आरोप तय करते समय न्यायिक विवेक का प्रयोग अनिवार्य है।

धारा 111 BNS की विस्तृत व्याख्या

अपने 65 पृष्ठों के विस्तृत फैसले में हाईकोर्ट ने पहली बार भारतीय न्याय संहिता की धारा 111 (Organised Crime) की गहराई से व्याख्या की।

कोर्ट ने कहा कि यह धारा सामान्य अपराधों के लिए नहीं, बल्कि ऐसे आपराधिक सिंडिकेट्स के लिए बनाई गई है, जो लगातार, संगठित और आर्थिक लाभ के उद्देश्य से अपराध करते हैं।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि “ऑर्गेनाइज्ड क्राइम सिंडिकेट” का मतलब केवल दो या अधिक लोगों का साथ होना नहीं है। इसके लिए यह दिखाना जरूरी है कि समूह पहले से संगठित रूप में काम कर रहा था और लगातार अवैध गतिविधियों में शामिल था।

“एक FIR से नहीं बनेगा ऑर्गेनाइज्ड क्राइम”

हाईकोर्ट ने फैसले में कहा कि धारा 111 लागू करने के लिए “continuing unlawful activity” यानी सतत अवैध गतिविधि साबित होना जरूरी है। इसके तहत पिछले 10 वर्षों में एक से अधिक चार्जशीट दाखिल होना और उन मामलों में अदालत द्वारा संज्ञान लिया जाना आवश्यक है। केवल एक FIR या एक घटना के आधार पर किसी को संगठित अपराधी नहीं कहा जा सकता।

कोर्ट ने कहा कि यदि हर सामूहिक अपराध को “ऑर्गेनाइज्ड क्राइम” मान लिया जाए, तो सामान्य आपराधिक कानून और विशेष संगठित अपराध कानूनों के बीच का अंतर समाप्त हो जाएगा।

कोर्ट की बड़ी टिप्पणी

हाईकोर्ट ने कहा कि संगठित अपराध कानूनों का उद्देश्य गंभीर और लगातार चलने वाले आपराधिक नेटवर्क पर कार्रवाई करना है, न कि हर मामले में कठोर धाराएं जोड़ देना।

अदालत ने यह भी कहा कि कानून की कठोर धाराओं का दुरुपयोग व्यक्तिगत स्वतंत्रता और निष्पक्ष न्याय व्यवस्था के लिए खतरा बन सकता है।

यह फैसला भविष्य में साइबर फ्रॉड और संगठित अपराध से जुड़े मामलों में महत्वपूर्ण नज़ीर माना जा रहा है, क्योंकि इसमें पहली बार BNS की धारा 111 की सीमाओं और आवश्यक कानूनी शर्तों को इतने विस्तार से स्पष्ट किया गया है।

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