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स्थायी पैरोल पर राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला, सजा के समय लागू नियमों से तय होगी पात्रता; 2021 के नियमों के आधार पर आवेदन खारिज करने वाला सरकार का आदेश रद्द

Permanent Parole Eligibility Must Be Considered Under Rules Applicable at Conviction: Rajasthan HC

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने परमानेंट पैरोल को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि कैदी की सजा के समय जो पैरोल नियम लागू थे, उसी आधार पर उसके परमानेंट पैरोल के आवेदन पर विचार किया जाना चाहिए। बाद में लागू हुए नए नियमों के आधार पर पुराने कन्विक्शन वाले मामले में आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता।

इसी आधार पर जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस संदीप शाह की डिवीजन बेंच ने एक कैदी की परमानेंट पैरोल आवेदन खारिज करने वाला राज्य सरकार का 16 जुलाई 2026 का आदेश रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि जिस समय कैदी को सजा मिली थी, उस समय जो पैरोल नियम लागू थे, उन्हीं के आधार पर उसके आवेदन पर विचार किया जाएगा। बाद में बदले गए नियमों के आधार पर पुराने मामले का आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता।

हाईकोर्ट ने मामला संबंधित कमेटी को वापस भेजते हुए 1958 के पैरोल नियमों के अनुसार उसके आवेदन पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए हैं।

22 फरवरी 2019 को दोषी ठहराया गया था

मामला आशीष उर्फ छोटू लाल से जुड़ा है। करीब 27 साल का आशीष सेंट्रल जेल, जोधपुर में उम्रकैद की सजा काट रहा है। उसे 22 फरवरी 2019 को POCSO Act के मामले में दोषी ठहराया गया था।

आशीष को पहले तीन बार रेगुलर पैरोल मिल चुकी थी। इसके बाद उसने परमानेंट पैरोल के लिए आवेदन किया। उसकी ओर से कहा गया कि उसकी कन्विक्शन के समय 1958 के पैरोल नियम लागू थे, इसलिए उसके आवेदन पर उन्हीं नियमों के तहत विचार होना चाहिए।

सरकार ने 2021 के नियमों के आधार पर आवेदन खारिज किया

राज्य सरकार ने 16 जुलाई 2026 को आशीष का परमानेंट पैरोल का आवेदन खारिज कर दिया। सरकार ने इसके लिए 2021 के पैरोल नियमों को आधार बनाया और माना कि इन नियमों के तहत आशीष परमानेंट पैरोल के लिए पात्र नहीं है।

आशीष की ओर से कहा गया कि उसकी कन्विक्शन 22 फरवरी 2019 को हुई थी। उस समय 2021 के नियम लागू नहीं थे। इसलिए उसके आवेदन पर उस समय लागू 1958 के पैरोल नियमों के तहत विचार किया जाना चाहिए।

वहीं सरकार का कहना था कि परमानेंट पैरोल के आवेदन पर 2026 में विचार किया जा रहा है, इसलिए उस समय लागू नियमों के आधार पर ही उसकी पात्रता तय की जानी चाहिए।

‘कन्विक्शन के समय लागू 1958 के नियमों से होगा विचार’

जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस संदीप शाह की बेंच ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि परमानेंट पैरोल के मामले में कन्विक्शन के समय लागू नियमों को ध्यान में रखना होगा।

हाईकोर्ट ने कहा कि आशीष की कन्विक्शन 22 फरवरी 2019 को हुई थी और उस समय 1958 के नियम लागू थे। इसलिए उसके परमानेंट पैरोल आवेदन पर 1958 के नियमों के तहत ही विचार किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने इसी आधार पर माना कि 2021 के नियमों को लागू करके आशीष का आवेदन खारिज करना सही नहीं था। कोर्ट ने राज्य सरकार का 16 जुलाई 2026 का आदेश रद्द कर दिया और मामले को संबंधित कमेटी को वापस भेज दिया।

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का भी दिया हवाला

हाईकोर्ट ने इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के Hitesh फैसले का भी हवाला दिया। उसमें कहा गया था कि समय से पहले रिहाई यानी प्रीमैच्योर रिलीज के मामले में कन्विक्शन की तारीख पर राज्य सरकार की जो पॉलिसी लागू थी, वही मुख्य आधार होगी। हालांकि, बाद में अगर पॉलिसी को कैदी के लिए ज्यादा फायदेमंद बनाया जाता है तो उसका लाभ भी ध्यान में रखा जा सकता है।

हाईकोर्ट ने अपने पुराने Laxman Singh बनाम State of Rajasthan मामले का भी जिक्र किया। इस मामले में भी कन्विक्शन के समय लागू नियमों के आधार पर पैरोल आवेदन पर विचार करने की बात कही गई थी।

सरकार का आदेश रद्द, मामला कमेटी के पास भेजा

हाईकोर्ट ने माना कि 2021 के नियमों के आधार पर आशीष का परमानेंट पैरोल आवेदन खारिज करना सही नहीं था। इसलिए कोर्ट ने 16 जुलाई 2026 के राज्य सरकार के आदेश को रद्द कर दिया।

हालांकि, कोर्ट ने आशीष को सीधे परमानेंट पैरोल पर रिहा करने का आदेश नहीं दिया। मामला संबंधित कमेटी को वापस भेज दिया गया है।

कमेटी को 1958 के नियमों के साथ इस बात को भी ध्यान में रखना होगा कि आशीष को पहले कई बार पैरोल मिल चुकी है। इसके बाद उसके आवेदन पर कानून के अनुसार दोबारा विचार करना होगा।

हाईकोर्ट ने कमेटी को ऑर्डर की प्रमाणित कॉपी मिलने के 4 सप्ताह के भीतर आशीष के मामले पर दोबारा विचार करने के निर्देश दिए हैं।

आशीष को अभी परमानेंट पैरोल नहीं मिली

हाईकोर्ट के इस आदेश का मतलब यह नहीं है कि आशीष को परमानेंट पैरोल मिल गई है। कोर्ट ने सिर्फ वह आदेश रद्द किया है, जिसके जरिए राज्य सरकार ने 2021 के नियमों के आधार पर उसका आवेदन खारिज किया था।

अब संबंधित कमेटी को 1958 के नियमों के आधार पर उसके आवेदन पर नए सिरे से विचार करना होगा। इस दौरान आशीष को पहले मिल चुकी पैरोल और मामले से जुड़े दूसरे तथ्यों को भी ध्यान में रखना होगा।

यानी हाईकोर्ट का मुख्य फैसला यह है कि 2019 में हुई कन्विक्शन वाले आशीष के मामले में परमानेंट पैरोल पर विचार करते समय बाद में लागू हुए 2021 के नियमों को आधार बनाकर आवेदन खारिज नहीं किया जा सकता। अब उसके आवेदन पर 1958 के नियमों के तहत दोबारा फैसला होगा।

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