नई दिल्ली: राजस्थान के POCSO से जुड़े एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला सुनाते हुए एक दोषी की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी है।
राजस्थान हाईकोर्ट का फैलसा पलटते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी धनराज को सभी आरोपों से बरी कर दिया।
जांच में कमियों के चलते कोर्ट ने उसकी उम्रकैद की सजा रद्द करते हुए उसे तत्काल रिहा करने का आदेश दिया। कोर्ट ने माना कि अभियोजन यह साबित नहीं कर पाया कि अपराध धनराज ने ही किया था।
फैसला सुनाते जस्टिस संदीप मेहता और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने कहा कि सिर्फ पुलिस की ‘टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड’ यानी TIP में हुई पहचान के आधार पर आरोपी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।
जब आरोपी पहले से गवाह को नहीं जानता था, तो ट्रायल के दौरान कोर्ट में उसकी पहचान कराया जाना जरूरी था।
इस मामले में पीड़ित ने TIP में धनराज की पहचान की थी, लेकिन कोर्ट में गवाही के दौरान उसकी पहचान नहीं कराई गई।
इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने जांच में कई कमियां पाईं। FIR में आरोपी की पहचान नहीं थी और मेडिकल समेत जांच के सबूत भी घटना की तारीख से मेल नहीं खा रहे थे जिस वजह से कोर्ट ने अभियोजन की कहानी को भरोसेमंद नहीं माना।
इसी के चलते सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और राजस्थान हाईकोर्ट के फैसले रद्द कर दिए और धनराज को बरी करते हुए उसे तुरंत जेल से रिहा करने का आदेश दिया, बशर्ते किसी दूसरे मामले में उसकी हिरासत जरूरी न हो।
5 साल की बच्ची से दुष्कर्म का था आरोप
मामला अजमेर के केकड़ी थाना क्षेत्र का है। 5 दिसंबर 2016 को करीब 5 साल की बच्ची से दुष्कर्म का मामला सामने आया था।
बच्ची के पिता ने 7 दिसंबर को पुलिस में रिपोर्ट दर्ज कराई।
शुरुआत में FIR अज्ञात व्यक्ति के खिलाफ दर्ज हुई थी। जांच के बाद पुलिस ने धनराज को आरोपी बनाया और 5 फरवरी 2017 को गिरफ्तार कर लिया।
इसके बाद पुलिस ने उसकी टेस्ट आइडेंटिफिकेशन परेड (TIP) कराई, जिसमें बच्ची ने धनराज की पहचान की।
जांच पूरी होने के बाद पुलिस ने धनराज के खिलाफ IPC और POCSO Act की कई धाराओं में चार्जशीट दाखिल की।
ट्रायल कोर्ट ने सुनाई थी उम्रकैद
मामले की सुनवाई POCSO की विशेष अदालत में हुई। जहां ट्रायल कोर्ट ने 5 सितंबर 2019 को धनराज को दोषी ठहराया और उसे उम्रकैद की सजा सुनाई।
ट्रायल कोर्ट ने उसे IPC की धारा 376 और 376(2)(i)(j) के तहत उम्रकैद की सजा दी। इसके अलावा धारा 363 और 323 IPC में भी उसे सजा सुनाई गई।
जिसके बाद धनराज ने ट्रायल कोर्ट के इस फैसले को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी।
लेकिन हाईकोर्ट ने भी 20 अगस्त 2025 को उसकी अपील खारिज कर दी। इसके बाद धनराज ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया।
जांच के तरीके पर सुप्रीम कोर्ट ने सवाल उठाए
सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले में जांच के तरीके पर भी सवाल उठाए।
सुप्रीम कोर्ट ने रिकॉर्ड में देखा कि FIR में आरोपी का नाम नहीं था और न ही उसके हुलिए या पहचान से जुड़ी कोई खास जानकारी दी गई थी।
धनराज और उसके परिवार ने पुलिस से शिकायत की थी कि उसे स्थानीय MLA से दुश्मनी के चलते झूठे मामले में फंसाया जा रहा है।
और जांच अधिकारी ने भी माना थी कि उसे ऐसी शिकायतें मिली थीं, लेकिन उसने उनकी जांच नहीं की।
जांच के दौरान बच्ची और उसके पिता को जयपुर ले जाकर आरोपी का स्केच तैयार कराया गया था। लेकिन यह स्केच न तो चार्जशीट में शामिल किया गया और न ही ट्रायल कोर्ट में पेश किया गया।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह स्केच अहम सबूत हो सकता था। इससे यह देखा जा सकता था कि बच्ची ने शुरुआत में जिस व्यक्ति का हुलिया बताया था, वह धनराज से मेल खाता था या नहीं।
TIP में पहचान हुई, लेकिन कोर्ट में नहीं कराई गई
इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने आरोपी की पहचान को लेकर अहम सवाल उठाया।
बच्ची ने ट्रायल कोर्ट में कहा था कि वह धनराज को पहचान सकती है। उस समय धनराज कोर्ट में मौजूद भी था।
इसके बावजूद कोर्ट में बच्ची से धनराज की पहचान नहीं कराई गई। यानी उससे यह नहीं पूछा गया कि क्या सामने मौजूद व्यक्ति वही है, जिसे उसने घटना के दौरान देखा था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि TIP में हुई पहचान सिर्फ जांच में मदद करने वाला सबूत है। आरोपी की पहचान साबित करने के लिए इसे अकेले मुख्य सबूत नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि अगर गवाह आरोपी को पहले से नहीं जानता था, तो ट्रायल के दौरान कोर्ट में उसकी पहचान कराना जरूरी था। लेकिन इस मामले में यह प्रक्रिया नहीं अपनाई गई।
मेडिकल रिपोर्ट और सबूतों में भी दिखी गड़बड़ी
सुप्रीम कोर्ट ने मेडिकल रिपोर्ट को भी अहम माना। डॉक्टर ने 7 दिसंबर 2016 को बच्ची की जांच की थी और उसकी चोटों को 5 से 7 दिन पुराना बताया था।
वहीं, अभियोजन के मुताबिक घटना 5 दिसंबर को हुई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चोटों का समय और घटना की तारीख आपस में मेल नहीं खा रही थी। इससे मामला कमजोर हुआ।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी देखा कि बच्ची से मिले जैविक सबूतों की जांच करके यह साबित नहीं किया गया कि वे धनराज से जुड़े थे। DNA या किसी दूसरे मेडिकल टेस्ट की रिपोर्ट भी कोर्ट के सामने नहीं रखी गई।
अभियोजन अपराध साबित नहीं कर पाया
सुप्रीम कोर्ट ने मामले में कई ऐसी कमियां पाईं, जिनकी वजह से अभियोजन का केस कमजोर पाया गया।
आरोपी की पहचान को लेकर भी जरूरी सबूत नहीं मिले और कोर्ट में उसकी पहचान नहीं कराई गई।
वहीं मेडिकल रिपोर्ट भी घटना की बताई गई तारीख से मेल नहीं खाती थी। इसके अलावा धनराज को घटना से जोड़ने वाला कोई मेडिकल सबूत भी सामने नहीं आया।
इन सब बातों को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के उस फैसले को गलत माना, जिसमें धनराज को दोषी ठहराया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इतने साल बाद दोबारा ट्रायल कराकर इन कमियों को दूर करना सही नहीं होगा। धनराज 5 फरवरी 2017 से जेल में था और फैसले के समय उसे जेल में 9 साल से ज्यादा हो चुके थे।
उम्रकैद का फैसला रद्द, धनराज बरी
सुप्रीम कोर्ट ने आखिरकार ट्रायल कोर्ट के 5 सितंबर 2019 और राजस्थान हाईकोर्ट के 20 अगस्त 2025 के फैसले को रद्द कर दिया।
सुप्रीम कोर्ट ने धनराज को सभी आरोपों से बरी कर दिया। कोर्ट ने उसे तुरंत जेल से रिहा करने का भी आदेश दिया, बशर्ते किसी दूसरे मामले में उसकी हिरासत जरूरी न हो।
कुल मिलाकर सुप्रीम कोर्ट ने घटना पर नहीं, बल्कि आरोपी की पहचान साबित होने पर सवाल उठाया।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि अभियोजन यह भरोसे के साथ साबित नहीं कर पाया कि अपराध करने वाला व्यक्ति धनराज ही था। TIP की पहचान, कोर्ट में पहचान न होने और दूसरी जांच संबंधी कमियों के कारण सुप्रीम कोर्ट ने उम्रकैद का फैसला पलट दिया।