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BREAKING NEWS: हाईकोर्ट की सख्ती के बाद प्रमुख विधि सचिव कोर्ट में पेश, लोक अभियोजकों को एक महीने में कंप्यूटर-प्रिंटर उपलब्ध कराने के आदेश

Rajasthan High Court Dismisses Plea in Alleged Unlawful Religious Conversion Case
कस्टडी सर्टिफिकेट समय पर उपलब्ध नहीं होने और हाईकोर्ट के आदेश की पालना में रिपोर्ट पेश नहीं करने का मामला; लोक अभियोजक कार्यालयों में रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती के भी निर्देश

जोधपुर/जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने सजा निलंबन के मामलों में समय पर कस्टडी सर्टिफिकेट उपलब्ध नहीं होने और पूर्व आदेश की पालना में रिपोर्ट पेश नहीं किए जाने के मामले में सख्त रुख अपनाया है।

हाईकोर्ट के आदेश पर शुक्रवार को राज्य के प्रमुख विधि सचिव व्यक्तिगत रूप से कोर्ट में पेश हुए।

सुनवाई के दौरान कस्टडी सर्टिफिकेट उपलब्ध कराने में विभागों के बीच समन्वय की कमी और लोक अभियोजक कार्यालयों में आवश्यक तकनीकी संसाधनों के अभाव का मुद्दा सामने आया।

जस्टिस अशोक कुमार जैन की एकलपीठ ने लोक अभियोजकों के कार्यालयों में कंप्यूटर और प्रिंटर सहित आवश्यक तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराने के लिए राज्य सरकार को एक महीने का समय दिया है।

इसके साथ ही लोक अभियोजक कार्यालयों में स्टाफ के रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती करने के निर्देश भी दिए गए हैं।

विभागों के बीच समन्वय की कमी से नहीं मिला कस्टडी सर्टिफिकेट

मामले की सुनवाई के दौरान प्रमुख विधि सचिव ने अदालत को बताया कि सजा निलंबन से संबंधित प्रकरणों में कस्टडी सर्टिफिकेट प्रस्तुत करने की जिम्मेदारी निर्धारित होने के बावजूद संबंधित विभागों के बीच समुचित संवाद नहीं होने के कारण प्रमाणपत्र समय पर उपलब्ध नहीं हो पाया।

कस्टडी सर्टिफिकेट उपलब्ध कराने के मामले में गृह विभाग और वित्त विभाग की जिम्मेदारी का मुद्दा भी अदालत के समक्ष आया।

वहीं, ई-प्रिजन पोर्टल पर बंदियों से संबंधित जानकारी उपलब्ध होने के बावजूद लोक अभियोजकों को आवश्यक सॉफ्टवेयर सहायता नहीं मिलने का मामला भी उठाया गया।

कोर्ट के सामने यह तथ्य आया कि राज्य के लोक अभियोजको के कार्यालय में स्टाफ की बहुत ज्यादा कमी हैं और कई अभियोजक को सभी कार्य खुद से ही करने पड़ रहे है जिसके चलते कई बर देरी हो जाती हैं.

अदालत को बताया गया कि कई पीपी कार्यालयों में ना तो कम्प्यूटर है और ना ही प्रिंटर सहित दूसरी व्यवस्थाए हैं ऐसे में वे कई बार आदेश या सर्टिफिकेट नही दे पाते.

प्रमुख विधि सचिव ने मांगा समय, हाईकोर्ट ने दी एक महीने की मोहलत

हाईकोर्ट के समक्ष व्यक्तिगत रूप से पेश हुए प्रमुख विधि सचिव राघवेन्द्र काछवाल ने लोक अभियोजक कार्यालयों में आवश्यक तकनीकी संसाधन उपलब्ध कराने के लिए कुछ समय मांगा।

इस पर अदालत ने राज्य सरकार को एक महीने का समय प्रदान किया।

हाईकोर्ट ने लोक अभियोजकों के लिए कंप्यूटर और प्रिंटर की व्यवस्था सुनिश्चित करने के साथ ही कार्यालयों में स्टाफ के रिक्त पदों पर शीघ्र भर्ती करने के निर्देश दिए, ताकि न्यायालय में लंबित प्रकरणों की सुनवाई के दौरान आवश्यक दस्तावेज समय पर उपलब्ध कराए जा सकें।

रिपोर्ट पेश नहीं करने पर हाईकोर्ट ने किया था तलब

दरअसल, नवाब और अयूब उर्फ गोबा की ओर से सजा निलंबन के लिए दायर आपराधिक अपील की सुनवाई के दौरान कस्टडी सर्टिफिकेट उपलब्ध नहीं होने का मामला सामने आया था।

हाईकोर्ट ने 14 सितंबर 2026 को पारित आदेश में डीजीपी (जेल) और राज्य के प्रमुख सचिव, विधि एवं विधिक कार्य विभाग से रिपोर्ट मांगी थी।

बाद की सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता और लोक अभियोजक ने अदालत को बताया था कि डीजीपी (जेल) की ओर से स्पष्टीकरण दाखिल कर दिया गया है। हालांकि, प्रमुख विधि सचिव की ओर से रिपोर्ट पेश नहीं की गई थी।

इस पर हाईकोर्ट ने नाराजगी जताते हुए प्रमुख विधि सचिव को 25 सितंबर को दोपहर दो बजे व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होकर स्पष्टीकरण देने का आदेश दिया था।

ई-प्रिजन पोर्टल पर जानकारी होने के बावजूद प्रमाणपत्र क्यों नहीं मिला?

हाईकोर्ट ने प्रमुख विधि सचिव से दो महत्वपूर्ण बिंदुओं पर स्पष्टीकरण मांगा था।

पहला, 14 सितंबर के आदेश की पालना में रिपोर्ट पेश क्यों नहीं की गई।

दूसरा, ई-प्रिजन पोर्टल पर आरोपियों से संबंधित विवरण उपलब्ध होने के बावजूद कस्टडी सर्टिफिकेट प्राप्त करने के लिए आवश्यक सॉफ्टवेयर सहायता क्यों उपलब्ध नहीं कराई गई।

अदालत के समक्ष यह मुद्दा भी आया कि आवश्यक तकनीकी सुविधाओं और विभागीय समन्वय के अभाव में सजा निलंबन जैसे मामलों में जरूरी दस्तावेज समय पर प्रस्तुत नहीं हो पा रहे हैं।

मामले में अपीलकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता सुमेहा कल्ला ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक चौधरी और लोक अभियोजक नरेंद्र गहलोत उपस्थित रहे।

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