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सिविल केस पर स्टे से अंतरिम रोक की अर्जी नहीं रुकेगी, राजस्थान हाईकोर्ट ने कार्यवाही रोकने की याचिका खारिज की, ट्रायल कोर्ट के फैसले में दखल से इनकार

Rajasthan HC Clarifies: Stay on Civil Suit Does Not Automatically Halt Hearing of Pending Interim Stay Plea

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने जोधपुर के एक जमीन विवाद से जुड़े मामले में दीवानी केस की कार्यवाही और अंतरिम रोक की अर्जी को लेकर अहम फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी सिविल केस की आगे की कार्यवाही पर स्टे लगने का मतलब यह नहीं है कि उसी केस में लंबित अंतरिम रोक की अर्जी की सुनवाई भी अपने आप रुक जाएगी। अगर स्टे ऑर्डर में अंतरिम रोक की अर्जी पर कार्यवाही रोकने का कोई खास निर्देश नहीं है, तो ट्रायल कोर्ट उस अर्जी पर सुनवाई कर सकता है।

इसी आधार पर जस्टिस संजीत पुरोहित ने बद्रीलाल की उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने ट्रायल कोर्ट के उस ऑर्डर को चुनौती दी थी, जिसके जरिए अंतरिम रोक की अर्जी पर कार्यवाही रोकने की उनकी मांग खारिज की गई थी।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के इस ऑर्डर में दखल देने से इनकार कर दिया। साथ ही स्टे एप्लीकेशन समेत दूसरी लंबित अर्जियां भी खारिज कर दी गईं।

मामले में याचिकाकर्ता बद्रीलाल की ओर से अधिवक्ता सी.पी. सोनी पेश हुए, जबकि प्रतिवादी पक्ष की ओर से अधिवक्ता जय किशन भैया ने पैरवी की।

जमीन के बंटवारे को लेकर शुरू हुआ था विवाद

मामला बद्रीलाल की ओर से दायर सिविल केस से जुड़ा है। उन्होंने जमीन के बंटवारे और स्थायी रोक की मांग को लेकर ट्रायल कोर्ट में केस दायर किया था। इसके साथ ही जमीन को लेकर स्थिति बनाए रखने के लिए अंतरिम रोक की अर्जी भी लगाई गई थी।

यह अंतरिम रोक की अर्जी वर्ष 2023 से लंबित थी। इसी दौरान केस में दस्तावेजों और हस्ताक्षरों को लेकर भी विवाद सामने आया।

बद्रीलाल ने प्रतिवादी धोकराम के वकालतनामा, लिखित जवाब और केस के दौरान दाखिल दूसरी अर्जियों पर मौजूद हस्ताक्षरों की FSL से जांच कराने की मांग की थी।

ट्रायल कोर्ट ने उनकी यह मांग खारिज कर दी थी। इसके खिलाफ बद्रीलाल ने हाईकोर्ट में अलग रिट याचिका दायर की।

हालांकि, मौजूदा मामले में हाईकोर्ट के सामने हस्ताक्षरों की जांच का सवाल नहीं था। यहां विवाद इस बात को लेकर था कि मुख्य केस पर स्टे लगने के बाद अंतरिम रोक की अर्जी पर सुनवाई जारी रह सकती है या नहीं।

अंतरिम रोक की अर्जी पर 30 दिन में फैसला करने को कहा

अंतरिम रोक की अर्जी लंबे समय से लंबित होने के कारण प्रतिवादी पक्ष ने हाईकोर्ट का रुख किया। उसने मांग की कि ट्रायल कोर्ट को इस अर्जी पर जल्द फैसला करने का निर्देश दिया जाए।

हाईकोर्ट ने 12 अगस्त 2026 को ट्रायल कोर्ट को अर्जी पर कानून के मुताबिक जल्द फैसला करने और संभव हो तो 30 दिन के भीतर इसे तय करने का निर्देश दिया।

हाईकोर्ट ने यह भी साफ किया था कि उसने अंतरिम रोक की अर्जी के सही या गलत होने पर कोई राय नहीं दी है। ट्रायल कोर्ट को मामले पर कानून के मुताबिक फैसला करना था।

मुख्य केस पर स्टे लगा तो बद्रीलाल ने क्या कहा?

इसके बाद बद्रीलाल की एक दूसरी रिट याचिका पर हाईकोर्ट ने 28 अगस्त 2026 को मुख्य सिविल केस की आगे की कार्यवाही पर स्टे लगा दिया।

इसके बाद बद्रीलाल ने ट्रायल कोर्ट में आवेदन दिया। उनका कहना था कि जब मुख्य केस की कार्यवाही पर स्टे लग चुका है, तो उसी केस में लंबित अंतरिम रोक की अर्जी पर भी सुनवाई रोक दी जानी चाहिए।

ट्रायल कोर्ट ने उनकी मांग खारिज कर दी। कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट के स्टे ऑर्डर में अंतरिम रोक की अर्जी पर कार्यवाही रोकने का कोई खास निर्देश नहीं है।

इसी ऑर्डर को चुनौती देते हुए बद्रीलाल ने मौजूदा रिट याचिका हाईकोर्ट में दायर की थी।

हाईकोर्ट ने समझाया मुख्य केस और अंतरिम रोक में फर्क

हाईकोर्ट ने कहा कि मुख्य सिविल केस और अंतरिम रोक की अर्जी आपस में जुड़ी जरूर हैं, लेकिन दोनों का काम अलग है।

मुख्य केस में आखिर में यह तय होता है कि किस पक्ष का क्या अधिकार है। वहीं अंतरिम रोक की अर्जी का मकसद केस चलने के दौरान विवादित जमीन या संपत्ति और पक्षकारों के अधिकारों को सुरक्षित रखना होता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि अंतरिम रोक की अर्जी पर फैसला करने से मुख्य केस का ट्रायल आगे नहीं बढ़ता। इसलिए मुख्य केस पर स्टे होने का मतलब यह नहीं है कि अंतरिम रोक की अर्जी भी अपने आप रुक जाएगी।

मुख्य केस पर स्टे के बावजूद अंतरिम रोक की अर्जी क्यों नहीं रुकी?

हाईकोर्ट ने कहा कि यह देखना जरूरी है कि स्टे ऑर्डर में वास्तव में क्या लिखा गया है। इस मामले में 28 अगस्त के ऑर्डर में अंतरिम रोक की अर्जी पर कार्यवाही रोकने का कोई स्पष्ट निर्देश नहीं था।

हाईकोर्ट ने कहा कि अगर किसी अंतरिम अर्जी पर सुनवाई से मुख्य केस का ट्रायल आगे नहीं बढ़ रहा है और वह हाईकोर्ट के स्टे ऑर्डर से टकराती भी नहीं है, तो सिर्फ मुख्य केस पर स्टे लगने के आधार पर उस अर्जी की सुनवाई रोकना जरूरी नहीं है।

हाईकोर्ट ने यह भी माना कि 12 अगस्त को अंतरिम रोक की अर्जी पर जल्द फैसला करने का दिया गया निर्देश बाद में मुख्य केस पर लगाए गए स्टे से खत्म नहीं हुआ था। उस निर्देश को रोकने या वापस लेने का कोई आदेश भी नहीं हुआ था।

हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट का ऑर्डर बरकरार रखा

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने बद्रीलाल की अंतरिम रोक की अर्जी पर कार्यवाही रोकने की मांग खारिज करके कोई कानूनी गलती नहीं की।

जस्टिस संजीत पुरोहित ने कहा कि इस मामले में ट्रायल कोर्ट के ऑर्डर में दखल देने का कोई आधार नहीं बनता। इसके बाद हाईकोर्ट ने बद्रीलाल की रिट याचिका खारिज कर दी। साथ ही स्टे एप्लीकेशन और दूसरी लंबित अर्जियां भी खारिज कर दी गईं।

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