676 आवेदन आए, केवल 73 संस्थानों को एनओसी; बार-बार समय लेने के बावजूद फैसला नहीं होने पर हाईकोर्ट सख्त
जोधपुर। राजस्थान में नर्सिंग पाठ्यक्रमों के लिए अनापत्ति प्रमाण-पत्र (एनओसी) जारी करने में लगातार हो रही प्रशासनिक देरी पर राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य सरकार के रवैये पर कड़ा रुख अपनाया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने लंबित एनओसी आवेदनों पर लंबे समय तक सरकार द्वारा फैसला नहीं करने और इसके चलते संस्थानों के शैक्षणिक सत्र 2026-27 की काउंसलिंग में अवसर से वंचित होने को गंभीरता से लिया है।
डॉ. जस्टिस नूपुर भाटी की एकलपीठ ने राज्य सरकार को आदेश दिया है कि आदेश की तारीख तक जिन याचिकाकर्ता संस्थानों/कॉलेजों के एनओसी आवेदन पेंडिंग हैं या फैसला नहीं लिया गया है, उनमें से प्रत्येक को 10 लाख रुपये की लागत का भुगतान किया जाए।
राज्य सरकार को 603 कॉलेजो को यह राशि सुनवाई की अगली तारीख से पहले देनी होगी.
इस फैसले के बाद राजस्थान सरकार को करीब 603 नर्सिंग कॉलेजों को 10-10 लाख रुपये का भुगतान करना होगा यानी करीब 60 करोड़ का भुगतान करना होगा।
यह आदेश मामला धमाना शेखा सेवा ट्रस्ट व अन्य की ओर से दायर याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए दिया है।
676 आवेदन, सिर्फ 73 संस्थानों को एनओसी
याचिकाकर्ताओं की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता C.S. Kotwani, Chinmoy Kotwani, Tushar Thanvi ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की 15 अक्टूबर 2024 की दिशा-निर्देशों के तहत एनओसी के लिए कुल 676 आवेदन प्राप्त हुए थे।
इनमें से केवल 73 संस्थानों को एनओसी जारी की गई थी, जबकि बड़ी संख्या में आवेदन पेंडिंग हैं।
हाईकोर्ट ने इस बात पर भी सवाल उठाया कि कुछ आवेदनों को अंतिम रूप दे दिया गया, जबकि बाकी आवेदनों को उच्चस्तरीय समिति के निर्णय की प्रतीक्षा में क्यों रखा गया।
तारीख पर तारीख, फिर भी नहीं हुआ फैसला
हाईकोर्ट ने आदेश में लंबित आवेदनों की पूरी समय-रेखा पर गौर किया।
25 फरवरी, 8 मई, 13 मई, 22 मई, 29 जून, 15 जुलाई, 21 अगस्त और 17 सितंबर 2026 को राज्य की ओर से समय मांगा गया या यह बताया गया कि एनओसी के संबंध में अंतिम निर्णय लिया जाएगा।
इसके बावजूद 22 सितंबर 2026 तक लंबित आवेदनों पर अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।
17 सितंबर को चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की प्रधान सचिव ने वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के माध्यम से न्यायालय को बताया था कि एनओसी देने अथवा नहीं देने के संबंध में उच्चतम स्तर पर एक महीने के भीतर निर्णय लिया जाएगा और उसके बाद लंबित आवेदनों पर निर्णय किया जाएगा।
NOC का फैसला नहीं हुआ और खत्म हो गई काउंसलिंग
मामले में देरी का सबसे गंभीर असर नर्सिंग संस्थानों की प्रवेश प्रक्रिया पर पड़ा।
हाईकोर्ट ने माना कि बीएससी नर्सिंग की काउंसलिंग 24 अगस्त 2026 और एमएससी नर्सिंग की काउंसलिंग 26 अगस्त 2026 को समाप्त हो चुकी थी।
एनओसी आवेदनों पर समय रहते निर्णय नहीं होने के कारण संबंधित याचिकाकर्ता संस्थान शैक्षणिक सत्र 2026-27 की काउंसलिंग में भाग लेने के अवसर से वंचित हो गए।
कोर्ट ने यह भी दर्ज किया कि इन संस्थानों ने संबंधित पाठ्यक्रमों को शुरू करने के लिए आधारभूत ढांचे और अन्य व्यवस्थाओं पर पर्याप्त धनराशि खर्च की थी।
खास बात यह रही कि संस्थानों ने काउंसलिंग शुरू होने से पहले ही हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
2024 की गाइडलाइन में 90 दिन की समयसीमा
हाईकोर्ट ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की वर्ष 2024 की दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया।
आदेश के अनुसार इन दिशा-निर्देशों में एनओसी आवेदनों की प्रक्रिया को निर्धारित समयसीमा में पूरा करने का प्रावधान है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि वर्ष 2024 की दिशा-निर्देश लागू होने के बावजूद लंबित आवेदनों को उच्चतम स्तर पर निर्णय के लिए भेजने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर विचार की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इससे आवेदनों पर अनिश्चितकाल तक निर्णय लंबित नहीं रखा जा सकता, विशेषकर तब जब संस्थानों ने सरकारी नीति के आधार पर आवेदन कर आधारभूत ढांचे में पर्याप्त निवेश किया हो।
2024 की गाइडलाइन में 90 दिन की समयसीमा
हाईकोर्ट ने चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की वर्ष 2024 की दिशा-निर्देशों का भी उल्लेख किया।
आदेश के अनुसार इन दिशा-निर्देशों में एनओसी आवेदनों की प्रक्रिया को निर्धारित समयसीमा में पूरा करने का प्रावधान है।
कोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार यह स्पष्ट नहीं कर सकी कि वर्ष 2024 की दिशा-निर्देश लागू होने के बावजूद लंबित आवेदनों को उच्चतम स्तर पर निर्णय के लिए भेजने की आवश्यकता क्यों पड़ी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि प्रशासनिक प्रक्रिया में अलग-अलग स्तरों पर विचार की आवश्यकता हो सकती है, लेकिन इससे आवेदनों पर अनिश्चितकाल तक निर्णय लंबित नहीं रखा जा सकता, विशेषकर तब जब संस्थानों ने सरकारी नीति के आधार पर आवेदन कर आधारभूत ढांचे में पर्याप्त निवेश किया हो।
फॉर्च्यून फाउंडेशन मामले के 45 दिन वाले फैसले का हवाला
हाईकोर्ट ने फॉर्च्यून फाउंडेशन बनाम राजस्थान राज्य मामले में 11 फरवरी 2026 को दिए गए खंडपीठ के फैसले का भी हवाला दिया.
इस मामले में भविष्य के शैक्षणिक सत्रों के लिए आदेश दिया गया था कि बीएससी नर्सिंग में केंद्रीयकृत काउंसलिंग में भाग लेने के लिए एनओसी मांगने वाले वास्तविक संस्थानों के आवेदन काउंसलिंग के प्रथम चरण की शुरुआत से कम से कम 45 दिन पहले तय किए जाएं।
हालांकि, कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया था कि 45 दिन की समयसीमा का अर्थ एनओसी देना अनिवार्य नहीं है। एनओसी देने या अस्वीकार करने का निर्णय सक्षम प्राधिकारी को संबंधित कानून, नियम और पात्रता शर्तों के अनुसार लेना होगा।
हाईकोर्ट ने साफ किया- एनओसी देना कोर्ट का आदेश नहीं
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान मामले में मुद्दा यह नहीं है कि किसी विशेष संस्थान को एनओसी दी जाए या नहीं।
एनओसी देने अथवा अस्वीकार करने का अधिकार संबंधित सक्षम वैधानिक प्राधिकारी के पास ही रहेगा।
उसे प्रत्येक आवेदन पर स्वतंत्र रूप से लागू कानून, नियम, दिशा-निर्देश और पात्रता शर्तों के आधार पर निर्णय लेना होगा।
कोर्ट की चिंता मुख्य रूप से इस बात को लेकर थी कि लंबे समय तक निर्णय नहीं लेने के कारण संस्थानों को प्रवेश और काउंसलिंग प्रक्रिया में प्रभावी अवसर से वंचित होना पड़ा।
हर लंबित NOC आवेदन पर 10 लाख की लागत
लंबे समय तक चली प्रक्रिया, बार-बार दिए गए अवसरों और राज्य की ओर से लगातार मांगे गए समय के बावजूद अंतिम निर्णय नहीं होने को देखते हुए हाईकोर्ट ने प्रत्येक लंबित और अनिर्णीत एनओसी आवेदन वाले याचिकाकर्ता संस्थान को 10 लाख रुपये की लागत देने का आदेश दिया।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह लागत संबंधित संस्थानों को हुई प्रशासनिक देरी और उससे उत्पन्न नुकसान के मद्देनजर लगाई गई है।
हालांकि, हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण स्पष्टीकरण भी दिया है कि 10 लाख रुपये की लागत लगाए जाने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित संस्थान को एनओसी देने का आदेश दे दिया गया है। एनओसी पर अंतिम फैसला सक्षम प्राधिकारी को कानून के अनुसार ही करना होगा।
नवंबर के पहले सप्ताह में फिर होगी सुनवाई
प्रधान सचिव, चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग की ओर से न्यायालय को बताया गया कि उच्चतम स्तर पर लंबित विषय पर एक महीने के भीतर अंतिम निर्णय किया जाएगा।
इस पर हाईकोर्ट ने सभी संबद्ध मामलों को नवंबर 2026 के पहले सप्ताह में सूचीबद्ध करने का आदेश दिया है। अगली सुनवाई पर राज्य सरकार को अनुपालन रिपोर्ट भी प्रस्तुत करनी होगी।
हाईकोर्ट का संदेश स्पष्ट
राजस्थान हाईकोर्ट के इस आदेश से यह स्पष्ट है कि एनओसी देना या अस्वीकार करना प्रशासनिक प्राधिकारी का अधिकार है, लेकिन लंबित आवेदनों पर अनिश्चितकाल तक निर्णय टालना स्वीकार्य नहीं है।
खासकर तब, जब संस्थान समय पर आवेदन कर चुके हों, काउंसलिंग की तारीखें निर्धारित हों और देरी के कारण उन्हें प्रवेश प्रक्रिया में भाग लेने का अवसर ही नहीं मिल पाए।