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बीमारी को जानबूझकर अनुपस्थिति नहीं माना जा सकता-TB से पीड़ित पुलिसकर्मी की ड्यूटी से अनुपस्थिति पर सेवा समाप्ति रद्द, हाईकोर्ट ने विधवा को 45 दिन में सभी सेवानिवृत्ति लाभ देने के दिए आदेश

Department Failed to Prove Willful Absence; Non-Supply of Inquiry Report Violated Principles of Natural Justice

कोर्ट ने कहा- जांच रिपोर्ट की प्रति दिए बिना अंतिम निर्णय लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे एक पुलिसकर्मी की ड्यूटी से अनुपस्थिति के मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए उसकी मृत्यु के कई सालों बाद पत्नी की याचिका पर सेवा समाप्ति का आदेश रद्द कर दिया है।

रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए सुनाए फैसले में राजस्थान हाईकोर्ट ने कहा कि विभाग यह साबित नहीं कर सका कि कर्मचारी की अनुपस्थिति जानबूझकर और स्वेच्छा से थी। साथ ही, विभागीय जांच की रिपोर्ट कर्मचारी को उपलब्ध नहीं कराना भी प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का उल्लंघन था।

मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस विनीत कुमार माथुर की खंडपीठ ने पुलिसक​र्मी की पत्नी हीरा मणि की ओर से दायर अपील पर यह फैसला सुनाया हैं.

1979 में कांस्टेबल पद पर हुई थी नियुक्ति

अपीलकर्ता हीरा मणि के पति की वर्ष 1979 में पुलिस विभाग में कांस्टेबल के पद पर नियुक्ति हुई थी।

बाद में वे तपेदिक (टीबी) से गंभीर रूप से पीड़ित हो गए। लंबे समय तक बीमारी और बिगड़ती स्वास्थ्य स्थिति के कारण वे नियमित रूप से ड्यूटी नहीं कर पा रहे थे। इसी आधार पर उनके खिलाफ विभागीय जांच शुरू की गई।

विभाग ने उन पर छह अलग-अलग मौकों पर कुल 57 दिन ड्यूटी से अनुपस्थित रहने के आरोप लगाए थे।

कर्मचारी ने आरोपों का जवाब देते हुए अपनी बीमारी से संबंधित दस्तावेज भी पेश किए थे।

गवाहों ने बीमारी के कारण अनुपस्थिति की पुष्टि की

विभागीय जांच के दौरान कर्मचारी व्यक्तिगत रूप से उपस्थित नहीं हो सका। उ

वही मृतक कर्मचारी ने अपनी ओर से खोराज राम को प्रतिनिधि नियुक्त किया।

बचाव पक्ष की ओर से कांस्टेबल नवल सिंह और कांस्टेबल उदय राज को गवाह के रूप में पेश किया गया।

दोनों गवाहों ने बताया कि कर्मचारी टीबी से पीड़ित थे और उनकी हालत ऐसी थी कि वे जांच अधिकारी के समक्ष उपस्थित नहीं हो सकते थे।

यह भी बताया गया कि परिवार में उनकी देखभाल करने वाला कोई अन्य सदस्य नहीं था और उनका उपचार चल रहा था।

इसके बावजूद जांच जांच अधिकारी ने 26 अक्टूबर 1996 को उनकी सेवा समाप्त कर दी।

जांच रिपोर्ट की प्रति नहीं देना भी बना अहम आधार

हाईकोर्ट ने पाया कि कर्मचारी का स्पष्ट कहना था कि विभागीय जांच पूरी होने के बाद जांच रिपोर्ट की प्रति उन्हें उपलब्ध नहीं कराई गई।

कोर्ट ने कहा कि राजस्थान सिविल सेवा वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील नियम, 1958 के नियम 16(10) के तहत जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराना आवश्यक था, ताकि कर्मचारी उसके निष्कर्षों पर अपना प्रतिवेदन दे सके।

खंडपीठ ने सुप्रीम कोर्ट के यूनियन ऑफ इंडिया बनाम मोहम्मद रमजान खान और एचपी स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड लिमिटेड बनाम महेश दहिया के फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जांच रिपोर्ट उपलब्ध कराए बिना अंतिम दंडात्मक निर्णय लेना प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के विपरीत है।

बीमारी को जानबूझकर अनुपस्थिति नहीं माना जा सकता

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के कृष्णकांत बी. परमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि केवल बिना अनुमति ड्यूटी से अनुपस्थित रहना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि कर्मचारी की अनुपस्थिति जानबूझकर थी।

यदि अनुपस्थिति बीमारी, दुर्घटना, अस्पताल में भर्ती होने या कर्मचारी के नियंत्रण से बाहर किसी अन्य मजबूर परिस्थिति के कारण हुई है, तो उसे स्वतः जानबूझकर की गई अनुपस्थिति नहीं माना जा सकता।

विभागीय कार्रवाई में यह साबित करना आवश्यक है कि अनुपस्थिति वास्तव में स्वेच्छापूर्वक और जानबूझकर थी।

कोर्ट ने छेल सिंह बनाम एम.जी.बी. ग्रामीण बैंक, पाली एवं अन्य के फैसले का भी हवाला दिया जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि अनधिकृत अनुपस्थिति को दंडनीय कदाचार मानने के लिए उसके जानबूझकर और स्वेच्छापूर्वक होने का आधार स्थापित होना चाहिए।

विभाग बीमारी के बावजूद जानबूझकर अनुपस्थिति साबित नहीं कर सका

मौजूदा मामले में हाईकोर्ट ने पाया कि विभाग कर्मचारी की अनुपस्थिति को जानबूझकर साबित नहीं कर सका।

इसके विपरीत, बचाव पक्ष के गवाहों के बयान से यह सामने आया कि कर्मचारी लंबे समय से टीबी से पीड़ित थे और इसी बीमारी के कारण कई अवसरों पर ड्यूटी पर उपस्थित नहीं हो सके।

कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य उनकी अनुपस्थिति को बीमारी से जोड़ने के लिए पर्याप्त थे।

हाईकोर्ट ने सेवा समाप्ति और एकलपीठ का आदेश किया रद्द

खंडपीठ ने स्पष्ट किया कि विभाग कर्मचारी की जानबूझकर अनुपस्थिति साबित करने में विफल रहा। इसके अलावा जांच रिपोर्ट की प्रति उपलब्ध नहीं कराने से प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन हुआ।

इन दोनों आधारों पर हाईकोर्ट ने 26 अक्टूबर 1996 का सेवा समाप्ति आदेश और 11 दिसंबर 2008 का एकलपीठ का आदेश रद्द कर दिया।

कर्मचारी की मृत्यु हो चुकी है, इसलिए कोर्ट ने उनकी पत्नी हीरा मणि को सभी परिणामी सेवा एवं सेवानिवृत्ति लाभ देने का आदेश दिया है।

ये लाभ आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने की तारीख से 45 दिनों के भीतर देने होंगे.

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