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FSL रिपोर्ट से मुकदमे में नया विवाद नहीं जोड़ सकते, रिपोर्ट रिकॉर्ड पर लेने से हाईकोर्ट का इनकार: कहा- सबूत से नई दलील नहीं बना सकते

Rajasthan HC Rejects FSL Report, Says Evidence Cannot Introduce a New Plea

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने फॉरेंसिक साइंस लैबोरेटरी (FSL) और हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट को मुकदमे में बाद में पेश करने से जुड़े मामले में अहम फैसला सुनाया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि सबूत के जरिए ऐसी नई बात मुकदमे में नहीं लाई जा सकती, जिसका आधार पहले से लिखित दलील में मौजूद नहीं हो।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने उदयपुर की देऊ बाई की याचिका खारिज करते हुए ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को बरकरार रखा, जिसमें मूल FSL और हैंडराइटिंग एक्सपर्ट रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेने से इनकार किया गया था।

हाईकोर्ट ने कहा कि साक्ष्य किसी पक्ष की पहले से रखी गई दलील को साबित करने में मदद कर सकता है, लेकिन उसके जरिए ऐसी नई बुनियादी बात नहीं जोड़ी जा सकती, जिसका जिक्र लिखित बयान में पहले किया ही नहीं गया हो।

याचिकाकर्ता देऊ बाई का यह मामला उनकी दिवंगत मां देबूबाई के हस्ताक्षरों से जुड़े विवाद का है।

देऊ बाई का कहना था कि उनकी मां से जमीन के नामांतरण की कार्रवाई के बहाने एक सहमति पत्र पर हस्ताक्षर कराए गए थे।

बाद में उन्होंने इन हस्ताक्षरों को चुनौती देते हुए हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट पेश करने की कोशिश की।

रिपोर्ट में विवादित हस्ताक्षरों को उनकी मां के नमूना हस्ताक्षरों से अलग बताया गया था।

हालांकि, हाईकोर्ट ने माना कि देऊ बाई की पहले की लिखित दलील में यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा गया था कि सहमति पत्र पर मौजूद हस्ताक्षर उनकी मां के हैं ही नहीं।

ऐसे में बाद में रिपोर्ट के जरिए यह नई दलील नहीं लाई जा सकती कि दस्तावेज पर किए गए हस्ताक्षर उनकी मां के नहीं थे।

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2002 के बिक्री समझौते से शुरू हुआ विवाद

मामला उदयपुर की सिविल ओरिजिनल सूट संख्या 18/2015 से जुड़ा है। इसमें वादी पक्ष ने 17 फरवरी 2002 के कथित बिक्री समझौते के आधार पर जमीन से जुड़े अधिकारों को लेकर मुकदमा दायर किया था।

मुकदमे में विशेष पालन और स्थायी रोक की मांग की गई थी।

देऊ बाई ने इस मामले में बचाव करते हुए अपनी दिवंगत मां देबूबाई से जुड़े 7 जुलाई 2008 के एक सहमति पत्र पर सवाल उठाए थे।

देऊ बाई का कहना था कि उनकी मां को जमीन के नामांतरण से जुड़ी कार्रवाई के बहाने कोर्ट ले जाया गया था। इसके बाद बहाने से उनसे सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए गए।

इसी दलील को मजबूत करने के लिए देऊ बाई ने निजी हैंडराइटिंग एक्सपर्ट से राय ली थी।

4 मई 2017 की रिपोर्ट में कहा गया था कि सहमति पत्र पर मौजूद हस्ताक्षर उनकी मां के नमूना हस्ताक्षरों से मेल नहीं खाते थे।

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ट्रायल कोर्ट ने आवेदन खारिज किया

देऊ बाई ने इस रिपोर्ट की फोटो कॉपी पहले ही ट्रायल कोर्ट में पेश की थी।

ट्रायल कोर्ट ने 2 सितंबर 2022 को इसे रिकॉर्ड में लेने से इनकार कर दिया। कोर्ट ने कहा था कि रिपोर्ट की मूल कॉपी पेश नहीं की गई है।

इसके बाद देऊ बाई ने रिपोर्ट की मूल कॉपी रिकॉर्ड में लेने की अनुमति मांगी।

लेकिन अतिरिक्त जिला न्यायाधीश, कोर्ट नंबर दो, उदयपुर ने 23 मार्च 2026 को यह आवेदन भी खारिज कर दिया।

इसके बाद देऊ बाई ने इस आदेश के खिलाफ संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हाईकोर्ट में याचिका दायर की।

लिखित दलील में हस्ताक्षर पर नहीं थे सवाल

हाईकोर्ट ने मामले में सबसे ज्यादा जोर इस बात पर दिया कि देऊ बाई ने अपने लिखित बयान में वास्तव में क्या कहा था।

हाईकोर्ट ने पाया कि उन्होंने अपने लिखित बयान में यह साफ तौर पर नहीं कहा था कि सहमति पत्र पर किए गए हस्ताक्षर उनकी मां के नहीं हैं।

पहले देऊ बाई की दलील यह थी कि उनकी मां को जमीन के नामांतरण की कार्रवाई के बहाने कोर्ट ले जाया गया और वहां उनसे सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करा लिए गए।

हाईकोर्ट ने कहा कि इन दोनों बातों में फर्क है। किसी व्यक्ति से धोखे या गलत तरीके से हस्ताक्षर करवाए जाने का आरोप अलग है और यह कहना अलग है कि दस्तावेज पर हस्ताक्षर उस व्यक्ति के हैं ही नहीं।

हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की रिपोर्ट यह बताने के लिए होती है कि किसी दस्तावेज पर किए गए हस्ताक्षर किसी व्यक्ति के हैं या नहीं।

लेकिन देऊ बाई ने अपनी पहले की दलील में हस्ताक्षर उनकी मां के होने से ही इनकार नहीं किया था।

ऐसे में बाद में हैंडराइटिंग रिपोर्ट के जरिए हस्ताक्षर को लेकर नया सवाल खड़ा नहीं किया जा सकता।

सबूत से नहीं जोड़ी जा सकती नई बात

हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी मुकदमे में लिखित दलील ही मामले की बुनियाद होती है।

बाद में पेश किया गया साक्ष्य उसी दलील को साबित करने या मजबूत करने के लिए होता है।

लेकिन साक्ष्य के जरिए ऐसी नई मूल बात नहीं जोड़ी जा सकती, जिसका जिक्र पहले लिखित दलील में किया ही नहीं गया हो।

हाकोर्ट ने माना कि इस मामले में हैंडराइटिंग रिपोर्ट के जरिए अब हस्ताक्षर को लेकर नया सवाल उठाया जा रहा था, जबकि देऊ बाई ने अपने लिखित बयान में ऐसा कोई साफ दावा नहीं किया था।

ऐसे में बाद में पेश की गई रिपोर्ट के जरिए मुकदमे की मूल दलील को बदला नहीं जा सकता।

इसलिए हाईकोर्ट ने रिपोर्ट को रिकॉर्ड पर लेने की अनुमति देने से इनकार कर दिया।

FSL रिपोर्ट अंतिम सबूत नहीं

हाईकोर्ट ने FSL रिपोर्ट में दी गई हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय को लेकर भी अहम बात कही।

हाईकोर्ट ने कहा कि एक्सपर्ट हस्ताक्षरों की बनावट, अक्षरों और स्ट्रोक, आकार, अनुपात, दूरी, झुकाव और दबाव जैसी चीजों की तुलना कर अपनी राय दे सकता है।

लेकिन सिर्फ किसी रिपोर्ट पर FSL लिखा होने से वह अंतिम या पक्का वैज्ञानिक सबूत नहीं बन जाती।

हाईकोर्ट ने कहा कि हैंडराइटिंग एक्सपर्ट की राय कोर्ट के लिए मददगार हो सकती है, लेकिन अंतिम फैसला एक्सपर्ट नहीं करता।

रिपोर्ट की अहमियत दूसरे दस्तावेजों, मौखिक सबूत और मामले की पूरी परिस्थितियों को देखकर तय की जाती है।

हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अगर एक्सपर्ट दो हस्ताक्षरों को अलग बताता है, तो इससे अकेले यह साबित नहीं हो जाता कि विवादित हस्ताक्षर फर्जी हैं।

हाईकोर्ट ने याचिका खारिज की

हाईकोर्ट ने माना कि ट्रायल कोर्ट ने मूल रिपोर्ट को रिकॉर्ड में लेने से इनकार कर कोई ऐसी कानूनी गलती नहीं की, जिसमें हाईकोर्ट को दखल देना पड़े।

हाईकोर्ट ने कहा कि देऊ बाई यह साबित नहीं कर सकीं कि रिपोर्ट को रिकॉर्ड में नहीं लेने से उन्हें ऐसा नुकसान हुआ, जिसे ठीक करने के लिए हाईकोर्ट का दखल जरूरी हो।

जस्टिस फरजंद अली ने फैसला सुनाते हुए 23 मार्च 2026 के ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखा और देऊ बाई की याचिका खारिज कर दी।

हाईकोर्ट ने साफ किया कि उसका फैसला सिर्फ मूल FSL और हैंडराइटिंग एक्सपर्ट रिपोर्ट को रिकॉर्ड में लेने के सवाल तक सीमित है। मुकदमे के मूल विवाद पर कोर्ट ने कोई राय नहीं दी है।

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