जूनियर लीगल असिस्टेंट भर्ती विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट का महत्वपूर्ण फैसला, राज्य सरकार और राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की अपीलें खारिज
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की भर्ती जूनियर लीगल असिस्टेंट भर्ती 2023 से जुड़े एक महत्वपूर्ण विवाद में विस्तृत रिपोर्टेबल फैसला देते हुए राज्य सरकार और हाउसिंग बोर्ड द्वारा दायर विशेष अपील को खारिज कर दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि भर्ती प्रक्रिया में मेरिट, आरक्षण नियमों और रिक्त पदों की पूर्ति के सिद्धांतों का सही पालन किया जाना आवश्यक है तथा योग्य अभ्यर्थी को केवल तकनीकी कारणों से अवसर से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने साफ किया कि
भर्ती में कोई उम्मीदवार आरक्षित श्रेणी से ओपन कैटेगरी में आ जाता हैं, तो उसकी जगह पर आरक्षित श्रेणी का रिक्त पद उसी श्रेणी के अगले रैंक वाले उम्मीदवार से भरी जाएगी.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस संगीता शर्मा की खंडपीठ ने एकलपीठ के फैसले को बरकरार रखते हुए राज्य सरकार और राजस्थान हाउसिंग बोर्ड की अपीलों को खारिज कर दिया हैं.
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने प्रतिवादी जसलोक यावव के पक्ष में फैसला देते हुए ओबीसी श्रेणी में नियुक्त अंतिम चयनित उम्मीदवार के बाद अगले मेरिट उम्मीदवार होने के कारण उस श्रेणी में उसके दावे को सही माना था.
ये हैं मामला
राजस्थान हाउसिंग बोर्ड द्वारा 19 जुलाई 2023 “लीगल असिस्टेंट (जूनियर लीगल ऑफिसर)” पदों की भर्ती के लिए विज्ञापन जारी किया गया था. जिसमें कुल 9 पदों के लिए आवेदन आमंत्रित किए गए थे। दस्तावेज सत्यापन के लिए 26 अभ्यर्थियों को बुलाया गया था।
भर्ती प्रक्रिया के दौरान एक उम्मीदवार का चयन ओपन कैटेगरी में हो गया, जबकि कुछ पद आरक्षित श्रेणियों में रिक्त रह गए।
प्रतिवाद जसलोक यादव ने दावा किया कि वह ओबीसी श्रेणी में मेरिट के आधार पर अगले स्थान पर था, इसलिए उसकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट की एकलपीठ ने जसलोक यादव की दलीलों को स्वीकार करते हुए उसकी उम्मीदवारी पर विचार करने का आदेश दिया.
राज्य सरकार और हाउसिंग बोर्ड ने एकलपीठ के आदेश को चुनौती देते हुए खंडपीठ में विशेष अपील दायर की।
राज्य सरकार और हाउसिंग बोर्ड की दलीलें
राज्य सरकार और हाउसिंग बोर्ड की ओर से दलील दी गई कि सिंगल बेंच ने उम्मीदवार को विचार के लिए निर्देश देकर त्रुटि की है क्योंकि वह उन उम्मीदवारों की “तीन गुना सूची” में शामिल नहीं था जिन्हें चयन प्रक्रिया में बुलाया जाना था।
सरकार की ओर से यह भी दलील दी गयी कि सामान्य वर्ग के एक चयनित उम्मीदवार के जॉइन नहीं करने के कारण उस पद को केवल सामान्य वर्ग के उम्मीदवार से ही भरा जा सकता था और भर्ती प्रक्रिया समाप्त हो जाने के कारण रिक्त पदों को अगली भर्ती में भरा जाना चाहिए।
साथ ही यह भी कहा गया कि ओबीसी तथा दिव्यांग श्रेणी के एक उम्मीदवार को बुलाया गया था, लेकिन उसके उपस्थित न होने के कारण पद रिक्त रह गया, इसलिए वर्तमान भर्ती प्रक्रिया में आगे किसी अन्य उम्मीदवार को शामिल करना उचित नहीं होगा।
OBC अभ्यर्थी की दलीलें
अभ्यर्थी की ओर से अधिवक्ता Kunal Kant Rawat, Aradhana Swami और Dhriti Sharma ने दलील देते हुए कहा कि ओबीसी श्रेणी में मेरिट के आधार पर योग्य उम्मीदवार है और चयनित उम्मीदवारों की सूची में एक अभ्यर्थी को ओपन कैटेगरी में समायोजित किए जाने के कारण ओबीसी श्रेणी में पद रिक्त हुआ है।.
अधिवक्ता ने कहा कि नियमों के अनुसार अगली मेरिट वाले योग्य उम्मीदवार को अवसर दिया जाना चाहिए और केवल तकनीकी कारणों से उसे चयन प्रक्रिया से बाहर नहीं रखा जा सकता।
याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि आरक्षण के सिद्धांतों के अनुसार यदि आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार ओपन कैटेगरी में चयनित हो जाता है तो उसकी श्रेणी का पद उसी श्रेणी के अगले योग्य उम्मीदवार से भरा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट का फैसला
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के Saurav Yadav बनाम उत्तर प्रदेश राज्य (2021) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि आरक्षण व्यवस्था का उद्देश्य प्रतिनिधित्व सुनिश्चित करना है, न कि मेरिट को सीमित करना।
हाईकोर्ट ने कहा कि सबसे पहले मेरिट के आधार पर ओपन कैटेगरी के पद भरे जाते हैं। उसके बाद आरक्षित श्रेणियों की सूची से संबंधित उम्मीदवारों पर विचार किया जाता है।
कोर्ट ने कहा कि यदि आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार ओपन कैटेगरी में चयनित हो जाता है तो आरक्षित श्रेणी का पद उसी श्रेणी के अगले मेरिट उम्मीदवार से भरा जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने यह भी माना कि इस भर्ती में ओबीसी श्रेणी के दो पद रिक्त थे और याचिकाकर्ता उस श्रेणी में मेरिट के अनुसार अगले स्थान पर था, इसलिए उसकी उम्मीदवारी पर विचार किया जाना उचित है।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने कहा कि एकलपीठ द्वारा दिया गया फैसला न तो कानून के विपरीत है और न ही भर्ती नियमों के विरुद्ध। इसलिए राज्य और हाउसिंग बोर्ड द्वारा दायर विशेष अपील में कोई दम नहीं पाया गया और इसे खारिज कर दिया गया।
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