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5 साल बाद शुरू हुआ अजमेर के भिनाय का पेट्रोल पंप, हाईकोर्ट की खंडपीठ ने एकलपीठ के आदेश पर लगाई रोक, कहा-अंतिम आदेश विपरित होने पर खुद के खर्च पर बंद करना होगा आउटलेट

Rajasthan High Court Allows Petrol Pump to Operate, Stays ₹2.5 Lakh Cost Imposed by Single Bench

जयपुर। अजमेर जिले के भिनाय क्षेत्र में 5 साल से विवादित एचपीसीएल पेट्रोल पंप विवाद में राजस्थान हाईकोर्ट ने बड़ा अंतरिम आदेश पारित किया है।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश जस्टिस संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस आशुतोष कुमार की खंडपीठ ने 5 साल से बंद पेट्रोल पंक को अस्थायी तौर पर संचालित करने की अनुमति देते हुए एकलपीठ द्वारा लगाई ₹2.50 लाख की कोस्ट पर भी रोक लगा दी है.

हालांकि अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि इस अनुमति से प्रतिवादियों के पक्ष में कोई अधिकार या इक्विटी उत्पन्न नहीं होगी और यदि अंतिम सुनवाई में आदेश विपरीत आता है तो पेट्रोल पंप को अपने खर्च पर बंद करना होगा।

यह मामला पिछले लगभग पांच वर्षों से न्यायालय में लंबित है और इसी दौरान पेट्रोल पंप परियोजना लगातार विवादों में घिरी रही। डिवीजन बेंच ने मामले में नोटिस जारी करते हुए अंतिम सुनवाई के लिए 16 जुलाई 2026 की तारीख तय की है।

क्या है पूरा विवाद

मामला अजमेर जिले के भिनाय स्थित खासरा नंबर 2548 और 2550 पर स्थापित किए जा रहे हिंदुस्तान पेट्रोलियम कॉर्पोरेशन लिमिटेड (HPCL) के पेट्रोल पंप से जुड़ा है।

जिला कलेक्टर, अजमेर द्वारा 11 अगस्त 2021 को पेट्रोल पंप के लिए एनओसी जारी की गई थी, जिसके बाद एचपीसीएल ने अभिषेक जोशी के पक्ष में रिटेल आउटलेट डीलरशिप आवंटित की थी।

इस एनओसी और डीलरशिप को चुनौती देते हुए दीपक आचार्य ने राजस्थान हाईकोर्ट में रिट याचिका दायर की थी। याचिकाकर्ता ने दावा किया था कि प्रस्तावित स्थल के आसपास श्मशान, स्कूल, हाईटेंशन लाइन और अन्य तकनीकी बाधाएं मौजूद हैं, इसलिए पेट्रोल पंप के लिए जारी एनओसी नियमों के विपरीत है।

याचिका में कहा गया था कि स्थल के पास 11 हजार केवी की हाईटेंशन लाइन गुजर रही है, 33 हजार केवी का ग्रिड स्टेशन मौजूद है और करीब 40 मीटर दूरी पर स्कूल स्थित है। साथ ही प्राकृतिक जल प्रवाह बाधित होने की भी आपत्ति उठाई गई थी।

प्रतिवादियों ने बताया व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा का मामला

एचपीसीएल, जिला प्रशासन और डीलरशिप धारक की ओर से अदालत में कहा गया कि याचिकाकर्ता स्वयं इंडियन ऑयल कॉर्पोरेशन लिमिटेड (IOCL) का पेट्रोल पंप संचालित करता है और उसने यह महत्वपूर्ण तथ्य अदालत से छिपाया।

प्रतिवादियों ने आरोप लगाया कि याचिका केवल व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा रोकने और क्षेत्र में एकाधिकार बनाए रखने के उद्देश्य से दायर की गई थी।

जवाब में यह भी बताया गया कि संबंधित पेट्रोल पंप के लिए पुलिस विभाग, पीडब्ल्यूडी, फायर विभाग, पंचायत समिति और जलदाय विभाग सहित विभिन्न एजेंसियों से आवश्यक अनुमति प्राप्त करने के बाद ही जिला कलेक्टर ने एनओसी जारी की थी।

बाद में पेट्रोलियम एंड एक्सप्लोसिव सेफ्टी ऑर्गेनाइजेशन (PESO) ने भी लाइसेंस जारी किया था।

सिंगल बेंच ने लगाई थी भारी कॉस्ट

राजस्थान हाईकोर्ट की सिंगल बेंच ने 8 मई 2026 को याचिका खारिज करते हुए याचिकाकर्ता पर ₹2.50 लाख की उदाहरणीय लागत लगाई थी।

जस्टिस समीर जैन ने अपने फैसले में कहा था कि याचिकाकर्ता ने तथ्य छिपाए और न्यायालय की प्रक्रिया का उपयोग व्यवसायिक प्रतिस्पर्धा रोकने के लिए किया।

अदालत ने कहा था कि याचिकाकर्ता स्वयं प्रतिद्वंद्वी पेट्रोल पंप संचालक है और उसने यह जानकारी जानबूझकर छिपाई।

सिंगल बेंच ने सुप्रीम कोर्ट के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा था कि कोई भी व्यक्ति अदालत की असाधारण रिट अधिकारिता का उपयोग “स्वच्छ हाथों” के साथ ही कर सकता है।

अदालत ने यह भी कहा था कि केवल व्यापारिक प्रतिस्पर्धा रोकने के लिए न्यायिक प्रक्रिया का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

पांच वर्षों तक रुका रहा पेट्रोल पंप

सिंगल बेंच ने अपने फैसले में यह भी उल्लेख किया था कि 6 अक्टूबर 2021 को पारित अंतरिम स्थगन आदेश लगभग पांच वर्षों तक प्रभावी रहा, जिसके कारण पेट्रोल पंप परियोजना रुकी रही और संबंधित पक्षों को भारी आर्थिक नुकसान हुआ। अदालत ने कहा था कि पूरी तरह तैयार परियोजना केवल न्यायिक प्रक्रिया के दुरुपयोग के कारण शुरू नहीं हो सकी।

इसी आधार पर अदालत ने ₹2.50 लाख की लागत लगाते हुए ₹1 लाख एचपीसीएल, ₹1 लाख डीलरशिप धारक अभिषेक जोशी और ₹50 हजार जिला कलेक्टर, अजमेर के पक्ष में जमा कराने के निर्देश दिए थे।

एकलपीठ के खिलाफ याचिका

मामले में दीपक आचार्य ने अधिवक्ता सुनिल समदड़िया और अरिहंत असमदड़िया के जरिए एकलपीठ के आदेश को चुनौती दी.

मामले में दीपक आचार्य ने अधिवक्ता सुनिल समदड़िया और अरिहंत असमदड़िया के जरिए एकलपीठ के आदेश को चुनौती दी.

अपीलकर्ता दीपक आचार्य की ओर से मुख्य रूप से यह पक्ष रखा गया कि संबंधित पेट्रोल पंप को NOC नियमों और पर्यावरणीय मानकों के विपरीत जारी किया गया है।

अपीलकर्ता का कहना है कि पेट्रोल पंप स्थापना के लिए राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) द्वारा निर्धारित सामान्य शर्तों और सुरक्षा मानकों का पालन नहीं किया गया, जबकि एकलपीठ ने अपने आदेश में इन पहलुओं की विधिवत जांच नहीं की।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि जब रिट याचिका लंबित थी, उस दौरान अंतरिम स्थगन आदेश प्रभावी था, इसके बावजूद बाद में पेट्रोल पंप को चालू कर दिया गया।

अपीलकर्ता ने अदालत के समक्ष यह चिंता व्यक्त की कि यदि इस प्रकार संचालन की अनुमति दी जाती है तो भविष्य में पर्यावरण, सार्वजनिक सुरक्षा और स्थानीय निवासियों के हितों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

अपीलकर्ता ने यह भी कहा कि एकलपीठ द्वारा 8 मई 2026 को याचिकाकर्ता पर लगाया गया ₹2.50 लाख का लागत (कॉस्ट) आदेश अनुचित है, क्योंकि याचिका जनहित और वैधानिक नियमों के अनुपालन से जुड़ी थी।

डिवीजन बेंच ने क्या कहा

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश की खंडपीठ ने माना कि एकलपीठ ने NOC की वैधता को NGT की गाइडलाइंस और पेट्रोल पंप स्थापना संबंधी सामान्य शर्तों के संदर्भ में विस्तार से नहीं परखा।

अदालत ने यह भी नोट किया कि रिट याचिका लंबित रहने के दौरान अंतरिम स्थगन आदेश प्रभावी रहा था।

इसी कारण अदालत ने मामले में नोटिस जारी करते हुए यह स्पष्ट किया कि फिलहाल पेट्रोल पंप संचालन जारी रह सकता है, लेकिन इससे प्रतिवादियों के पक्ष में कोई स्थायी अधिकार या इक्विटी उत्पन्न नहीं होगी।

अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि अंतिम आदेश विपरीत आता है तो एचपीसीएल और डीलरशिप धारक को अपने खर्च पर पेट्रोल पंप बंद करना होगा।

साथ ही डिवीजन बेंच ने सिंगल बेंच द्वारा लगाए गए ₹2.50 लाख के कॉस्ट आदेश पर भी अंतरिम रोक लगा दी। मामले की अंतिम सुनवाई अब 16 जुलाई 2026 को होगी।

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