NI एक्ट की धारा 143A विवेकाधीन, धारा 397(3) सीआरपीसी के तहत वैधानिक प्रतिबंध को प्रक्रिया की चतुराई से नहीं तोड़ा जा सकता – जोधपुर पीठ का रिपोर्टेबल फैसला
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जोधपुर मुख्यपीठ ने चेक अनादरण से जुड़े एक मामले में रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए तीन कानूनी बिंदुओं को स्पष्ट करते हुए महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 397(3) के तहत दूसरी रिवीजन (Second Revision) पर लगाया गया वैधानिक प्रतिबंध किसी भी प्रकार की प्रक्रिया संबंधी चतुराई से दरकिनार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि कोई भी पक्ष रिवीजन में असफल होने के बाद, अलग नाम से याचिका दायर कर उसी मुद्दे को पुनर्जीवित नहीं कर सकता।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि एनआई एक्ट की धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवज़ा देना अनिवार्य नहीं, बल्कि अदालत का विवेकाधीन अधिकार है।
हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों को बिना ठोस आधार के नहीं बदला जा सकता।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह रिपोर्टेबल जजमेंट जोधपुर निवासी जय किशन की ओर से दायर याचिका को खारिज करते हुए दिया है।
हाईकोर्ट ने अपने इस फैसले में तीन महत्वपूर्ण सिद्धांतों को पुनः स्थापित किया है—
Finality of Litigation: मुकदमेबाजी का अंत होना चाहिए; एक ही मुद्दे को बार-बार नहीं उठाया जा सकता।
Substance over Form: अदालतें नाम से नहीं, बल्कि याचिका के वास्तविक उद्देश्य से निर्णय करती हैं।
Discretion under Section 143A NI Act: अंतरिम मुआवज़ा देना न्यायालय का विवेकाधीन अधिकार है, बाध्यकारी नहीं।
क्या है मामला?
याचिकाकर्ता-शिकायतकर्ता जय किशन ने Negotiable Instruments Act के तहत चेक अनादरण (Cheque Bounce) का मामला दायर किया था।
याचिकाकर्ता ने जोधपुर के मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट संख्या 3 के समक्ष एनआई एक्ट की धारा 143A के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर चेक राशि के 20 प्रतिशत तक अंतरिम मुआवज़ा (Interim Compensation) दिलाने की मांग की।
1 फरवरी 2023 को मजिस्ट्रेट ने तथ्यों और दोनों पक्षों की दलीलों का परीक्षण करने के बाद याचिकाकर्ता की यह मांग खारिज कर दी।
इसके बाद याचिकाकर्ता ने अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संख्या 2, जोधपुर के समक्ष क्रिमिनल रिवीजन दायर की।
सत्र न्यायाधीश ने भी 24 नवंबर 2023 को ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखते हुए किशन की याचिका को खारिज कर दिया।
इसी आदेश को याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में याचिका दायर कर चुनौती दी।
याचिकाकर्ता की दलीलें
याचिकाकर्ता का कहना था कि उसने Negotiable Instruments Act के तहत चेक अनादरण का मामला दायर किया था। उनका मुख्य उद्देश्य था कि मुकदमे की लंबी अवधि के दौरान उन्हें आर्थिक राहत मिल सके।
धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवज़े की मांग
याचिकाकर्ता ने मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, जोधपुर के समक्ष एनआई एक्ट की धारा 143A के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत किया और चेक राशि के 20% तक अंतरिम मुआवज़ा देने की प्रार्थना की।
याचिकाकर्ता ने कहा कि धारा 143A को 2018 के संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया ताकि शिकायतकर्ता को प्रारंभिक चरण में राहत मिल सके।
याचिकाकर्ता ने कहा कि आरोपी द्वारा चेक जारी किया जाना और उसका अनादर होना prima facie स्थापित है।
मुकदमे की प्रक्रिया लंबी होती है, ऐसे में शिकायतकर्ता को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ता है।
जब ट्रायल कोर्ट ने 01.02.2023 को अंतरिम मुआवज़ा देने से इनकार किया, तो याचिकाकर्ता ने इसे विवेक का गलत प्रयोग (Improper Exercise of Discretion) बताया।
याचिकाकर्ता ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने धारा 143A की मंशा (Legislative Intent) को पर्याप्त महत्व नहीं दिया। आदेश में पर्याप्त न्यायिक संतुलन का अभाव है और आरोपी की देनदारी प्रथम दृष्टया स्पष्ट होने के बावजूद राहत से वंचित किया गया।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश द्वारा 24.11.2023 को ट्रायल कोर्ट के आदेश को बरकरार रखने के बाद, याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया।
याचिकाकर्ता का मुख्य तर्क यह था कि—
दोनों निचली अदालतों ने तथ्य और कानून की सही व्याख्या नहीं की और अंतरिम मुआवज़ा देने से इनकार न्याय के हित में नहीं है।
हाईकोर्ट अपने अंतर्निहित अधिकार (Inherent Jurisdiction) का प्रयोग कर हस्तक्षेप कर सकता है।
दूसरी रिवीजन नहीं, विशेष अधिकार का प्रयोग
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि वर्तमान याचिका को दूसरी रिवीजन नहीं माना जाना चाहिए, बल्कि इसे न्यायिक हस्तक्षेप हेतु विशेष अधिकार क्षेत्र के तहत देखा जाना चाहिए।
याचिकाकर्ता का तर्क था कि हाईकोर्ट के पास पर्यवेक्षणीय और अंतर्निहित शक्तियां हैं।
यदि निचली अदालतों ने विवेक का अनुचित प्रयोग किया है, तो हाईकोर्ट हस्तक्षेप कर सकता है।
राज्य सरकार/प्रतिवादी का जवाब
इस मामले में प्रतिवादी पक्ष की ओर से राज्य सरकार और आरोपी ने याचिका का विरोध किया।
विरोध में सबसे प्रमुख तर्क यह दिया गया कि याचिकाकर्ता पहले ही रिवीजन का उपाय अपना चुका है।
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 397(3) के अनुसार, एक ही पक्ष दूसरी रिवीजन नहीं कर सकता।
वर्तमान याचिका वस्तुतः दूसरी रिवीजन है, भले ही इसे अलग नाम दिया गया हो। प्रतिवादी ने कहा कि प्रक्रिया का नाम बदल देने से उसकी वास्तविक प्रकृति नहीं बदलती।
सरकार ने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने तथ्यों का विश्लेषण कर कारणयुक्त आदेश पारित किया और रिवीजन कोर्ट ने स्वतंत्र परीक्षण के बाद उसी निष्कर्ष को सही ठहराया।
दोनों अदालतों के समवर्ती निष्कर्षों में कोई स्पष्ट अवैधता, मनमानी या अधिकार क्षेत्र से परे कार्यवाही नहीं है।
धारा 143A का विवेकाधीन स्वरूप
सरकार और प्रतिवादी ने यह भी दलील दी कि धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवज़ा देना अनिवार्य नहीं है। यह अदालत की विवेकाधीन शक्ति है और प्रत्येक मामले में तथ्यों के आधार पर निर्णय लिया जाता है।
सरकार ने कहा कि यदि अदालत को लगता है कि अंतरिम मुआवज़ा देना उचित नहीं है, तो वह इनकार कर सकती है।
अंतर्निहित अधिकार का दुरुपयोग नहीं
प्रतिवादी पक्ष ने याचिका के विरोध में कहा कि हाईकोर्ट की अंतर्निहित शक्तियां असाधारण परिस्थितियों के लिए हैं।
जब विधि में स्पष्ट प्रतिबंध है (दूसरी रिवीजन पर), तो अंतर्निहित अधिकारों का प्रयोग कर उस प्रतिबंध को दरकिनार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट में प्रश्न
राजस्थान हाईकोर्ट के समक्ष दायर हुई याचिका पर मुख्य प्रश्न सामने आया कि क्या याचिकाकर्ता, रिवीजन में असफल होने के बाद, अलग नाम से याचिका दायर कर उसी आदेश को पुनः चुनौती दे सकता है?
हाईकोर्ट ने पाया कि वर्तमान याचिका भले ही अलग शीर्षक (nomenclature) के साथ प्रस्तुत की गई हो, लेकिन उसका सार वही है— ट्रायल कोर्ट के उस आदेश को चुनौती देना जिसे पहले ही रिवीजन में परखा जा चुका है।
हाईकोर्ट ने कहा कि अदालत को प्रक्रिया के नाम या रूप से नहीं, बल्कि याचिका के वास्तविक उद्देश्य से देखना चाहिए। यदि कोई याचिका वस्तुतः दूसरी रिवीजन है, तो उसे केवल नाम बदलकर स्वीकार नहीं किया जा सकता।
अदालत ने स्पष्ट किया कि “प्रक्रियात्मक पोशाक बदल देने से कार्यवाही का न्यायिक चरित्र नहीं बदलता।”
दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 397(3) स्पष्ट रूप से कहती है कि एक ही पक्ष द्वारा दूसरी रिवीजन स्वीकार नहीं की जाएगी। इसका उद्देश्य न्यायिक प्रक्रिया में अंतिमता (Finality), अनुशासन और त्वरित न्याय सुनिश्चित करना है।
अदालत ने कहा कि यदि इस प्रतिबंध को अनदेखा किया जाए तो मुकदमों की अनावश्यक पुनरावृत्ति होगी और न्यायिक प्रक्रिया बाधित होगी।
हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके पास अंतर्निहित और पर्यवेक्षणीय अधिकार (Inherent & Supervisory Jurisdiction) अवश्य हैं, परंतु इनका प्रयोग केवल असाधारण परिस्थितियों में ही किया जा सकता है— जैसे स्पष्ट अवैधता, अधिकार क्षेत्र से परे कार्यवाही या न्याय का स्पष्ट दुरुपयोग।
इस मामले में याचिकाकर्ता कोई ऐसी असाधारण परिस्थिति सिद्ध नहीं कर सके।
हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवज़ा देना अनिवार्य नहीं है। यह एक विवेकाधीन (Discretionary) शक्ति है, जिसका प्रयोग प्रत्येक मामले के तथ्यों और परिस्थितियों के आधार पर किया जाता है।
ट्रायल कोर्ट ने अपने आदेश में तथ्यों का संतुलित विश्लेषण किया था और कारण सहित निर्णय दिया था। रिवीजन कोर्ट ने भी स्वतंत्र रूप से परीक्षण कर उसी निष्कर्ष को सही ठहराया।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब दो निचली अदालतों ने स्वतंत्र रूप से विचार कर समान निष्कर्ष दिए हैं और उनमें कोई स्पष्ट त्रुटि, मनमानी या विधिक त्रुटि नहीं है, तो हाईकोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए।
अंतिम निर्णय
दोनों पक्षों की दलीलों के बाद हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की याचिका को दूसरी रिवीजन याचिका मानते हुए खारिज कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह याचिका धारा 397(3) सीआरपीसी के तहत प्रतिबंधित है और निचली अदालतों के आदेशों में कोई स्पष्ट अवैधता या न्याय का हनन नहीं है तथा धारा 143A के तहत अंतरिम मुआवज़ा देना अनिवार्य नहीं है।
