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RERA के अधिकार क्षेत्र पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला: RERA का अधिकार क्षेत्र बनने पर कमर्शियल कोर्ट वाद खारिज नहीं कर सकता, वादपत्र लौटाना होगा

Rajasthan High Court Seeks Reply from Subodh Law College Over Student Complaint and SGRC Functioning

पूरी रकम चुकाने के बाद भी नहीं मिला फ्लैट, हाईकोर्ट ने खरीदार को RERA जाने की दी स्वतंत्रता; कोर्ट फीस लौटाने का भी आदेश

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश में रियल एस्टेट विवादों में अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से जुड़े मामलों के लिए एक महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट संदेश दिया है कि केवल मंच (Forum) गलत होने के आधार पर किसी व्यक्ति के मूल अधिकार या दावे को समाप्त नहीं किया जा सकता।

यदि विवाद RERA के अधिकार क्षेत्र में आता है, तो न्यायालय को वादपत्र वापस कर संबंधित प्राधिकरण के समक्ष जाने का अवसर देना चाहिए, न कि पूरे वाद को खारिज करना चाहिए।

राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी वाद पर RERA (Real Estate Regulatory Authority) का अधिकार क्षेत्र बनता है, तो सिविल या कमर्शियल कोर्ट को वाद (Suit) खारिज करने के बजाय Order VII Rule 10 CPC के तहत वादपत्र (Plaint) वापस करना चाहिए, ताकि संबंधित पक्ष सक्षम प्राधिकारी के समक्ष अपना दावा प्रस्तुत कर सके।

जस्टिस अरुण मोंगा एवं जस्टिस संदीप तनेजा की खंडपीठ ने Churchika Gupta बनाम F.S. Housing Pvt. Ltd. मामले की सुनवाई करते हुए यह महत्वपूर्ण फैसला दिया है।

हाईकोर्ट ने कमर्शियल कोर्ट के उस आदेश को संशोधित कर दिया, जिसमें वादपत्र को Order VII Rule 11 CPC के तहत खारिज कर दिया गया था।

पूरा मामला क्या था?

अपीलकर्ता चर्चिका गुप्ता ने जयपुर स्थित “The Crest” आवासीय परियोजना में एक 4 BHK फ्लैट बुक किया था।

फ्लैट की कुल कीमत ₹1,45,26,800 थी, जिसका पूरा भुगतान बैंकिंग माध्यम से किया गया तथा TDS भी आयकर विभाग में जमा कराया गया।

हालांकि, बिल्डर ने बिक्री अनुबंध (Agreement for Sale) का मसौदा दिया, लेकिन उसे कभी निष्पादित (Execute) नहीं किया गया।

याचिकाकर्ता का आरोप था कि पूरी राशि प्राप्त करने के बावजूद बिल्डर ने न तो फ्लैट का कब्जा दिया और न ही विक्रय विलेख (Sale Deed) निष्पादित किया।

तीसरे पक्ष को फ्लैट हस्तांतरित किए जाने की आशंका के चलते उन्होंने कमर्शियल कोर्ट में Specific Performance और Permanent Injunction का वाद दायर किया था।

वर्ष 2025 में कमर्शियल कोर्ट ने फ्लैट की स्थिति यथावत (Status Quo) बनाए रखने का आदेश दिया था।

विवाद का मुख्य कानूनी प्रश्न

वाद लंबित रहने के दौरान बिल्डर ने Order VII Rule 11 CPC के तहत आवेदन दायर कर कहा कि यह विवाद Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016 के अंतर्गत आता है और इसका निस्तारण RERA द्वारा किया जाना चाहिए।

इसके बाद स्वयं खरीदार ने Order VII Rule 10 CPC के तहत आवेदन देकर अनुरोध किया कि वादपत्र उसे वापस किया जाए, ताकि वह RERA के समक्ष उचित कार्यवाही कर सके।

लेकिन कमर्शियल कोर्ट ने खरीदार का आवेदन खारिज करते हुए पूरा वाद ही निरस्त कर दिया। इसी आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई थी।

हाईकोर्ट ने क्या कहा?

खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि Order VII Rule 11 CPC और Order VII Rule 10 CPC के उद्देश्य पूरी तरह अलग हैं।

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि—

यदि वादपत्र में कोई कारण-ए-दावा (Cause of Action) ही नहीं बनता या कानूनन वाद प्रतिबंधित है, तभी Order VII Rule 11 CPC के तहत वादपत्र खारिज किया जा सकता है।

लेकिन यदि विवाद वास्तविक है और केवल गलत मंच (Forum) पर दायर हुआ है, तो उचित प्रक्रिया वादपत्र वापस करना (Return of Plaint) है, न कि उसे खारिज करना।

कमर्शियल कोर्ट की त्रुटि बताई

हाईकोर्ट ने कहा कि कमर्शियल कोर्ट ने दोनों प्रावधानों के बीच के मूलभूत अंतर को नजरअंदाज कर दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि वाद सीधे खारिज कर दिया जाता है, तो इससे भविष्य में खरीदार के वैध दावे पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।

दूसरी ओर, वादपत्र वापस करने से पक्षकार सक्षम मंच पर अपना दावा पूरी तरह प्रस्तुत कर सकता है और उसके अधिकार सुरक्षित रहते हैं।

हाईकोर्ट का अंतिम आदेश

राजस्थान हाईकोर्ट ने कमर्शियल कोर्ट द्वारा वाद खारिज करने के आदेश को संशोधित करते हुए खरीदार को वादपत्र वापस करने का आदेश दिया है।

हाईकोर्ट ने इसके साथ ही जमा की गई Court Fee भी कानून के अनुसार वापस करने का आदेश दिया।

इसके साथ ही खरीदार को RERA, जयपुर के समक्ष उचित कार्यवाही करने के लिए अपना दावा प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी है।

इसके साथ ही बिल्डर का Order VII Rule 11 CPC का आवेदन खारिज करते हुए खरीदार का Order VII Rule 10 CPC का आवेदन स्वीकार कर लिया।

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