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बाल गृह से बाहर आने वाले युवाओं को मिलेगा 1% रिजर्वेशन, राजस्थान हाईकोर्ट ने केंद्र-राज्य सरकार को 12 हफ्ते में पॉलिसी बनाने को कहा; जुवेनाइल असेसमेंट के लिए एक्सपर्ट पैनल के भी निर्देश

Nomination Rejection in Municipal Polls Cannot Be Directly Challenged in HC, Rajasthan HC Says

जयपुर। बाल गृह से 18 साल की उम्र में बाहर निकलने वाले युवाओं यानी केयर लीवर्स को सरकारी नौकरी और सरकारी शिक्षण संस्थानों में एडमिशन में 1% रिजर्वेशन मिलेगा।

राजस्थान हाईकोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम में बच्चों के असेसमेंट और 18 साल की उम्र के बाद बाल गृह छोड़ने वाले युवाओं की स्थिति को देखते हुए केंद्र और राज्य सरकार को कई अहम निर्देश दिए हैं।

हाईकोर्ट ने 1% रिजर्वेशन के लिए केंद्र और राज्य सरकार को 12 हफ्ते में पॉलिसी बनाने और उसे नोटिफाई करने का निर्देश दिया है।

जब तक यह पॉलिसी लागू नहीं होती, केयर लीवर्स को सरकारी भर्ती में 5 साल की उम्र में छूट के साथ आवेदन और परीक्षा की फीस में भी छूट दी जाएगी।

साथ ही कोर्ट ने 18 साल के बाद इन युवाओं को अकेला छोड़ने के बजाय उनकी पढ़ाई, रहने, स्किल ट्रेनिंग और आर्थिक मदद की व्यवस्था करने के भी निर्देश दिए हैं।

जस्टिस अनूप कुमार ढंड ने ये निर्देश एक जुवेनाइल से जुड़े मामले की सुनवाई के दौरान दिए।

इस दौरान कोर्ट को 16 से 18 साल के बच्चों के प्रीलिमिनरी असेसमेंट में भी कई कमियां मिलीं। कई मामलों में बच्चों की मानसिक क्षमता और समझ की सही जांच किए बिना ही असेसमेंट रिपोर्ट तैयार कर दी गई।

इसे देखते हुए कोर्ट ने हर जिले में एक्सपर्ट पैनल बनाने और NIMHANS की गाइडलाइंस के हिसाब से प्रीलिमिनरी असेसमेंट करने का निर्देश दिया है।

सरकार को इन निर्देशों पर 8 हफ्ते में कंप्लायंस रिपोर्ट दाखिल करनी होगी। मामले की अगली सुनवाई 22 नवंबर 2026 को होगी।

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16 से 18 साल के बच्चों के असेसमेंट के लिए बनेगा एक्सपर्ट पैनल

हाईकोर्ट ने राजस्थान सरकार को हर जिले में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, साइकेट्रिस्ट और चाइल्ड साइकोलॉजी एक्सपर्ट का पैनल बनाने का निर्देश दिया है।

हाईकोर्ट ने कहा कि गंभीर अपराध के आरोप वाले 16 से 18 साल के बच्चे का प्रीलिमिनरी असेसमेंट बेहद अहम है। इसमें यह देखा जाता है कि बच्चा अपने किए गए काम और उसके नतीजों को समझने की स्थिति में था या नहीं। साथ ही बच्चे की मानसिक और शारीरिक क्षमता और उसके हालात को भी देखा जाना जरूरी है।

लेकिन कोर्ट के सामने ऐसे मामले भी आए, जहां असेसमेंट सिर्फ एक पेज की रिपोर्ट में निपटा दिया गया। बच्चे की साइकोलॉजिकल जांच नहीं हुई और माता-पिता या टीचर से भी बात तक नहीं की गई।

इसलिए कोर्ट ने हर जिले में क्लिनिकल साइकोलॉजिस्ट, साइकेट्रिस्ट और चाइल्ड साइकोलॉजी एक्सपर्ट का पैनल बनाने का निर्देश दिया। पैनल के एक्सपर्ट बच्चे से कम से कम 3 बार बातचीत करेंगे। इसके बाद उसकी मानसिक उम्र समेत परिपक्वता की जांच की जाएगी।

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18 साल के बाद बाल गृह छोड़ने वाले बच्चों के लिए बनेगी नीति

हाईकोर्ट ने 18 साल की उम्र में बाल गृह छोड़ने वाले युवाओं की जिंदगी और उनके सामने आने वाली चुनौतियों पर भी ध्यान दिया।

हाईकोर्ट ने कहा कि बाल गृह में रहने वाला बच्चा 18 साल का होते ही अचानक अकेला नहीं छोड़ा जा सकता। कई बच्चों के पास रहने की जगह, पढ़ाई, नौकरी और जरूरी पहचान के दस्तावेज तक नहीं होते। जिसके चलते उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है।

इसी के चलते कोर्ट ने सरकार को बच्चों के लिए आफ्टरकेयर और पुनर्वास नीति बनाने का भी निर्देश दिया है।

इसमें बाल गृह छोड़ने वाले युवाओं के लिए रहने की जगह, पढ़ाई, स्किल ट्रेनिंग, काउंसलिंग और आर्थिक मदद की व्यवस्था करनी होगी।

12 हफ्ते में 1% रिजर्वेशन की पॉलिसी बनाने का निर्देश

हाईकोर्ट ने 18 साल की उम्र में बाल गृह छोड़ने वाले युवाओं के लिए 1% हॉरिजॉन्टल रिजर्वेशन की पॉलिसी बनाने का निर्देश दिया गया है। केंद्र और राज्य सरकार को 12 हफ्ते में यह पॉलिसी बनाकर नोटिफाई करनी होगी।

यह रिजर्वेशन सरकारी शिक्षण संस्थानों में एडमिशन और सरकारी नौकरियों समेत सभी सरकारी सर्विस कैटेगरी में दिया जाएगा।

जब तक पॉलिसी नहीं बनती, तब तक सरकारी को भर्ती में 5 साल की उम्र में छूट के साथ आवेदन और परीक्षा फीस में भी छूट देने के निर्देश दिए हैं।

17.5 साल की उम्र से ही तैयार करने होंगे दस्तावेज

कोर्ट ने कहा कि बाल गृह में रहने वाले बच्चे के 17.5 साल के होने पर उसके जरूरी दस्तावेज तैयार कराने की प्रक्रिया शुरू होनी चाहिए। इसमें आधार, PAN, वोटर ID, बैंक अकाउंट और डोमिसाइल जैसे दस्तावेज शामिल हैं।

18 साल की उम्र में बाल गृह छोड़ते समय बच्चे को आफ्टरकेयर आइडेंटिटी कार्ड भी दिया जाना चाहिए। इसके साथ ही केयर लीवर्स की पढ़ाई जारी रखने के लिए मदद की जाए।

उन्हें ग्रेजुएशन तक पढ़ाई, हायर स्टडीज और प्रोफेशनल कोर्स के लिए स्कॉलरशिप और स्किल ट्रेनिंग की सुविधा देने के भी कोर्ट ने निर्देश दिए गए।

किस जुवेनाइल केस की सुनवाई में आए ये बड़े निर्देश?

दरअसल, मामला दीपक कुमार बनाम स्टेट ऑफ राजस्थान का था। दीपक ने दावा किया था कि जिस घटना को लेकर उसके खिलाफ केस चल रहा है, उस समय वह 18 साल से कम उम्र का था।

उसने 10वीं की मार्कशीट में दर्ज 1 जुलाई 2006 की जन्मतिथि को आधार बनाया। लेकिन उसके पुराने स्कूल रिकॉर्ड में जन्मतिथि 14 नवंबर 2003 दर्ज मिली। Class-I में दाखिले का यह रिकॉर्ड 3 जुलाई 2007 का था।

हाईकोर्ट ने माना कि घटना के समय दीपक की उम्र 18 साल से ज्यादा थी। इसलिए उसे जुवेनाइल मानने की मांग स्वीकार नहीं की जा सकती।

हाईकोर्ट ने उसकी याचिका खारिज कर दी और ट्रायल कोर्ट के उस फैसले को सही माना, जिसमें दीपक को जुवेनाइल मानने से इनकार किया गया था।

अब सरकार को बनानी होगी पूरी व्यवस्था

इसी सुनवाई के दौरान कोर्ट का ध्यान प्रीलिमिनरी असेसमेंट और 18 साल के बाद बाल गृह छोड़ने वाले युवाओं की स्थिति पर गया।

हाईकोर्ट ने कहा कि जुवेनाइल जस्टिस सिस्टम में सिर्फ बच्चे की उम्र और केस की सुनवाई तक बात सीमित नहीं रहनी चाहिए। उसकी मानसिक स्थिति और 18 साल के बाद उसके भविष्य के लिए भी जरूरी व्यवस्था होनी चाहिए।

इसी के बाद हाईकोर्ट ने राज्य स्तर पर जुवेनाइल जस्टिस काउंसिल बनाने का निर्देश दिया। साथ ही हर डिविजन में निगरानी की व्यवस्था और केयर लीवर्स के लिए अलग सेक्रेटेरिएट बनाने को कहा।

हाईकोर्ट ने सरकार से इन सभी निर्देशों पर 8 हफ्ते में कंप्लायंस रिपोर्ट मांगी है। यानी सरकार को हाईकोर्ट के दिए निर्देशों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई, इसकी लिखित जानकारी कोर्ट को देनी होगी।

कोर्ट ने मामले को ‘पार्ट हर्ड’ रखा है, यानी इसकी सुनवाई आगे भी जारी रहेगी। अगली सुनवाई 22 नवंबर 2026 को होगी।

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