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राज्य में जलस्रोतों पर अब अतिक्रमण नहीं होगा बर्दाश्त, राजस्थान हाईकोर्ट का आदेश-रामगढ़, कूकस और नेवटा बांध सहित पूरे कैचमेंट क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने के आदेश

Rajasthan High Court Orders Immediate Removal of Encroachments from Water Bodies, Ramgarh, Kukas and Nevta Catchment Areas

जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रदेश में जलस्रोतों, प्राकृतिक नालों और कैचमेंट क्षेत्रों पर बढ़ते अतिक्रमण को गंभीर पर्यावरणीय संकट मानते हुए राज्य सरकार को कड़े निर्देश जारी किए हैं।

कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश संजीव प्रकाश शर्मा और जस्टिस मनीष शर्मा की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि राजस्थान जैसे शुष्क प्रदेश में वर्षा जल का प्राकृतिक प्रवाह किसी भी कीमत पर बाधित नहीं होना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि जल निकासी के रास्तों पर बने अवैध निर्माण और अतिक्रमण तुरंत नहीं हटाए गए तो इसका सीधा असर भूजल स्तर, जल संरक्षण और भविष्य की जल उपलब्धता पर पड़ेगा।

याचिकाकर्ता गोविंदराम की ओर से दायर जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए हाईकोर्ट ने यह महत्वपूर्ण आदेश दिया है।

खटवाड़ा गांव से उठा मुद्दा, पूरे प्रदेश के लिए आदेश

जयपुर जिले की सांगानेर तहसील के ग्राम खटवाड़ा स्थित खसरा नंबर 220 की गैर-मुमकिन नाला भूमि पर हुए अतिक्रमण को लेकर याचिकाकर्ता गोविंदराम ने याचिका दायर की है।

अधिवक्ता सिद्धार्थ जैन मूथा ने याचिकाकर्ता की ओर से पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि प्राकृतिक जलमार्ग पर पक्की चारदीवारी, मलबा और अन्य अवरोध खड़े कर दिए गए हैं, जिससे वर्षा का पानी अपने प्राकृतिक मार्ग से बहकर नेवटा बांध तक नहीं पहुंच पा रहा है।

सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष यह भी रखा गया कि स्थानीय ग्रामीणों ने फरवरी माह में प्रशासन को शिकायतें दी थीं।

राजस्व अधिकारियों द्वारा निरीक्षण में भी जलमार्ग अवरुद्ध होने की पुष्टि हुई, लेकिन इसके बावजूद प्रभावी कार्रवाई नहीं की गई।

रामगढ़, कूकस और नेवटा जैसे जलस्रोतों पर खतरा

हाईकोर्ट ने कहा कि यह मामला केवल एक गांव तक सीमित नहीं है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में उल्लेख किया कि उसने पहले भी रामगढ़ झील और कूकस बांध के कैचमेंट क्षेत्र में अनियंत्रित निर्माण और अतिक्रमण के कारण जल प्रवाह बाधित होने पर न्यायिक संज्ञान लिया था।

अब खटवाड़ा गांव से नेवटा बांध तक जाने वाले प्राकृतिक जलमार्ग के अवरुद्ध होने का मामला भी सामने आया है।

खंडपीठ ने कहा कि राजस्थान में झीलें, नाले और बांध केवल सतही जल के स्रोत नहीं हैं, बल्कि यही भूजल पुनर्भरण (Groundwater Recharge) का सबसे बड़ा आधार हैं।

यदि इनके प्राकृतिक रास्ते बंद होंगे तो आने वाले वर्षों में जल संकट और गंभीर हो जाएगा।

पक्की चारदीवारियां बन रही हैं सबसे बड़ी बाधा

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने आदेश में एक महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि आजकल कृषि भूमि खरीदने के बाद लोग उसके सीमांकन के लिए पक्की चारदीवारियां बना रहे हैं।

कोर्ट ने कहा कि सीमांकन करना गलत नहीं है, लेकिन यदि इन दीवारों के कारण वर्षा जल का प्राकृतिक प्रवाह रुक जाता है तो यह सार्वजनिक हित और पर्यावरण दोनों के लिए गंभीर खतरा है।

कोर्ट ने कहा कि यदि किसी कारणवश चारदीवारी बनानी भी पड़े तो उसके निचले हिस्से में पर्याप्त खुला मार्ग छोड़ा जाना चाहिए, ताकि बारिश का पानी बिना बाधा अपने प्राकृतिक मार्ग से आगे बढ़ सके।

प्राकृतिक नालों को भरना या उन पर निर्माण करना किसी भी स्थिति में स्वीकार्य नहीं है।

पूरे कैचमेंट क्षेत्र से अतिक्रमण हटाने के आदेश

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि जहां-जहां प्राकृतिक नालों, जल निकासी मार्गों और कैचमेंट क्षेत्रों पर अतिक्रमण या अवरोध पाए जाएं, उन्हें तत्काल हटाया जाए।

सबसे महत्वपूर्ण बात यह रही कि अदालत ने अपने आदेश को केवल खटवाड़ा गांव तक सीमित नहीं रखा, बल्कि स्पष्ट किया कि यह आदेश रामगढ़ और कूकस के संपूर्ण कैचमेंट क्षेत्र पर भी समान रूप से लागू होगा।

इसका अर्थ है कि अब प्रशासन को इन क्षेत्रों में व्यापक स्तर पर सर्वे कर अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई करनी होगी।

सिविल और राजस्व अदालतों पर भी लगाई रोक

हाईकोर्ट ने इस मामले में आदेश देते हुए कहा कि रामगढ़ और कूकस के कैचमेंट क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई को रोकने वाले मुकदमों पर सिविल कोर्ट और राजस्व न्यायालय सुनवाई नहीं करेंगे।

हाईकोर्ट ने कहा कि यदि किसी प्रकार की रोक आवश्यक होगी तो वह केवल हाईकोर्ट की अनुमति से ही संभव होगी।

हाईकोर्ट ने कहा कि मानसून को देखते हुए अतिक्रमण हटाने की कार्रवाई तत्काल की जानी चाहिए और इसे किसी भी स्तर पर बाधित नहीं होने दिया जाएगा।

भू-स्वामियों को भी दिया अवसर

हाईकोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि जिन भूमि स्वामियों ने जलमार्ग अवरुद्ध कर रखा है, यदि वे स्वयं वर्षा जल के प्रवाह के लिए पर्याप्त रास्ता उपलब्ध करा देते हैं, तो उनकी शेष संपत्ति को अनावश्यक रूप से प्रभावित नहीं किया जाएगा।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को आदेश दिया कि समाचार-पत्रों में सार्वजनिक सूचना प्रकाशित की जाए और संबंधित तहसीलदार प्रत्येक प्रभावित भूमि स्वामी को व्यक्तिगत नोटिस जारी करें, ताकि वे स्वेच्छा से जल निकासी का मार्ग खोल सकें।

प्रशासन की निष्क्रियता पर भी टिप्पणी

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट के समक्ष यह भी तथ्य रखा गया कि संबंधित अधिकारियों के पास पहले से शिकायतें और निरीक्षण रिपोर्ट उपलब्ध थीं, जिनमें जलमार्ग अवरुद्ध होने की पुष्टि की गई थी। इसके बावजूद समय पर कार्रवाई नहीं हुई।

मीडिया रिपोर्टों के अनुसार अदालत ने यह भी संकेत दिया कि यदि हाईकोर्ट के आदेशों के बावजूद अधिकारी कार्रवाई नहीं करते हैं, तो संबंधित तहसीलदार और पटवारी के विरुद्ध विभागीय कार्रवाई की जा सकती है।

हाईकोर्ट ने प्रशासन को स्पष्ट संदेश दिया कि जलस्रोतों पर अतिक्रमण हटाने में किसी भी प्रकार की लापरवाही स्वीकार नहीं की जाएगी।

5 अगस्त तक मांगी अनुपालन रिपोर्ट

खंडपीठ ने राज्य सरकार और संबंधित अधिकारियों को आदेश दिया है कि आदेशों के अनुपालन के बाद विस्तृत अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) 5 अगस्त 2026 तक कोर्ट में पेश की जाए।

अगली सुनवाई इसी तिथि को होगी, जिसमें अदालत यह समीक्षा करेगी कि उसके निर्देशों का कितना पालन किया गया

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