जयपुर, 28 नवंबर 2025
ओबीसी सूची संशोधन (OBC List Revision) को लेकर कोर्ट के आदेशों की पालना नहीं करने को लेकर राज्य सरकार के खिलाफ दायर अवमानना याचिका में सरकार को बड़ी राहत मिली है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने राज्य में ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) सूची के पुनरीक्षण में देरी को लेकर दायर दो सिविल अवमानना याचिकाओं को खारिज कर दिया।
JUSTICE VINIT KUMAR MATHUR और JUSTICE RAVI CHIRANIA की खंडपीठ ने ने सरकार को राहत देते हुए कहा कि राज्य सरकार द्वारा दिए गए तर्कों के आधार पर यह निष्कर्ष निकलता है कि अदालत के 2015 के आदेश का जानबूझकर उल्लंघन (Willful Disobedience) नहीं हुआ है।
हाईकोर्ट ने कहा कि राज्य सरकार द्वारा अपनाई गई प्रक्रिया वर्तमान संवैधानिक प्रावधानों के अनुरूप है और इसे अदालत के आदेश की ‘हठपूर्वक अवहेलना’ नहीं माना जा सकता।
ये है मामला
10 अगस्त 2015 को सन 1993 के राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम (NCBC Act 1993) और सुप्रीम कोर्ट के ऐतिहासिक निर्णय इंद्रा साहनी बनाम भारत संघ (1993) के आधार पर राजस्थान हाईकोर्ट ने ओबीसी सूची की दस वर्ष में एक बार पुनरीक्षण (Revision) का आदेश दिया था।
इसी आदेश की पालना में हाईकोर्ट में यशवर्धन सिंह शेखावत व अन्य ने अवमानना याचिका दायर कर आरोप लगाया था कि वर्ष 2015 में हाईकोर्ट ने ओबीसी वर्ग की सूची में अतिशामिल (Over Inclusion) और अल्पशामिल (Under Inclusion) समूहों की विस्तृत समीक्षा और संशोधन करने का आदेश दिया था।
10 साल बाद भी
याचिका में कहा गया कि 10 साल बाद भी सरकार द्वारा आदेश का पालन नहीं किया गया।
याचिका में कहा गया कि सरकारी विभागों ने आदेश का पालन न करके अदालत की अवमानना की है, क्योंकि ओबीसी सूची की समयबद्ध समीक्षा सामाजिक न्याय के लिए आवश्यक है।
हाईकोर्ट में सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि 2015 के स्पष्ट निर्देशों के बावजूद राज्य सरकार ने ओबीसी सूची का पुनरीक्षण नहीं किया, जबकि आयोग के गठन से संबंधित निर्देशों का पालन तो कर दिया गया है।
सरकार का जवाब
मामले में राज्य सरकार की ओर से एडवोकेट जनरल राजेंद्र प्रसाद ने जवाब पेश कर बताया कि 102वें एवं 105वें संविधान संशोधन लागू होने के बाद प्रदेश में राजस्थान राज्य पिछड़ा वर्ग आयोग अधिनियम, 2017 और राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (निरस्तीकरण) अधिनियम, 2018 प्रभावी हो चुके हैं।
महाधिवक्ता ने कहा कि इनके तहत ओबीसी सूची के पुनरीक्षण के लिए कोई निश्चित समयसीमा निर्धारित नहीं है; हालांकि राज्य सरकार इस पुनरीक्षण के लिए कानूनी प्रक्रिया के अनुसार कदम उठा रही है।
सरकार ने कहा कि राज्य में आयोग काम कर रहा है, आयोग को नए कानूनों के तहत अधिकार दिए गए हैं और सरकार ‘कानून के अनुसार’ प्रक्रिया चला रही है।
इसलिए अदालत की अवमानना का कोई प्रश्न नहीं उठता।
हाईकोर्ट का आदेश
दोनों पक्षों की बहस सुनने के बाद हाईकोर्ट ने कहा कि 2015 के आदेश के बाद राज्य में संवैधानिक संशोधनों और नए कानूनों से कानूनी स्थिति बदल चुकी है।
राज्य द्वारा स्थायी पिछड़ा वर्ग आयोग का गठन कर दिया गया है, जो (Over Inclusion) और (Under Inclusion) से संबंधित सलाह दे रहा है।
इस बदली स्थिति में राज्य सरकार को पुराने आदेश के अनुसार सूची संशोधन के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि राज्य सरकार द्वारा कोई जबरदस्ती हठपूर्वक अवमानना नहीं की गई है।
हाईकोर्ट ने सरकार के खिलाफ दायर दोनों अवमानना याचिकाओं को खारिज करते हुए नोटिस भी वापस लेने के आदेश दिए।
चुनौती देने के लिए स्वतंत्र
साथ ही हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि अवमानना याचिका खारिज होने से याचिकाकर्ता का भविष्य का अधिकार समाप्त नहीं होगा कि वह 2017 और 2018 के अधिनियमों की वैधता को विधिक प्रावधानों के अनुसार चुनौती दे सकता है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने साफ किया कि बदले हुए संवैधानिक ढांचे में राज्य सरकार की प्रक्रिया को अवमानना नहीं माना जा सकता, लेकिन यदि किसी को नए कानूनों की संवैधानिकता पर सवाल है, तो वह उचित कानूनी प्रक्रिया के तहत इसे चुनौती देने के लिए स्वतंत्र है।