जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने नाबालिग बच्चे के पासपोर्ट से जुड़े एक महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल फैसले में स्पष्ट किया है कि तलाक के बाद यदि बच्चे की विशेष और पूर्ण अभिरक्षा मां को प्राप्त है तथा परिस्थितियां यह दर्शाती हैं कि पिता ने बच्चे के प्रति अपने अधिकार एवं जिम्मेदारियां छोड़ दी हैं, तो पासपोर्ट रिन्यूअल के लिए पिता का नाम दर्ज कराने की शर्त नहीं लगाई जा सकती।
राजस्थान हाईकोर्ट ने पासपोर्ट अधिकारियों द्वारा अपनाए गए रवैये को “हाइपर-टेक्निकल और पेडेंटिक” यानी जरूरत से ज्यादा तकनीकी और कठोर दृष्टिकोण मानते हुए पासपोर्ट ऑफिस के आदेश को रद्द कर दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल पासपोर्ट मैनुअल के किसी एक प्रावधान को यांत्रिक रूप से लागू करने के बजाय तलाक की डिक्री, बच्चे की वास्तविक अभिरक्षा, पहले जारी पासपोर्ट, मां द्वारा प्रस्तुत घोषणाओं और माता-पिता के बीच संबंधों की वास्तविक स्थिति—इन सभी तथ्यों को ध्यान में रखना होगा।
जस्टिस मनीष शर्मा की एकलपीठ ने यह आदेश याचिकाकर्ता मां गजल मिश्रा की ओर से अपने बेटे एकांग मिश्रा की ओर से दायर याचिका पर दिया है।
हाईकोर्ट ने इसके साथ ही जयपुर क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी द्वारा 13 मई 2024 को जारी आदेश को रद्द कर दिया।
कोर्ट ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि नाबालिग का पासपोर्ट पिता का नाम शामिल किए बिना नवीनीकृत किया जाए और प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने के एक महीने के भीतर आवश्यक औपचारिकताएं पूरी की जाएं।
क्या था पूरा मामला?
यह मामला 14 वर्षीय एकांग मिश्रा से संबंधित है, जिसने अपनी प्राकृतिक संरक्षक मां गजल मिश्रा के माध्यम से राजस्थान हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
याचिका में जयपुर के क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी द्वारा 13 मई 2024 को जारी उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसमें पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए बच्चे के पिता का नाम बताते हुए एक शपथपत्र अथवा उपक्रम प्रस्तुत करने की शर्त रखी गई थी।
अधिवक्ता यशवंतंसिंह, प्रखर जैन और राहुल वर्मा ने पैरवी करते हुए अदालत को बताया कि बच्चे के माता-पिता का विवाह 6 जून 2010 को हुआ था और बच्चे का जन्म 24 दिसंबर 2011 को हुआ।
बाद में माता-पिता के बीच मतभेद के चलते हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 13-बी के तहत आपसी सहमति से तलाक हुआ।
14 अक्टूबर 2017 के तलाक संबंधी निर्णय एवं डिक्री के माध्यम से बच्चे की विशेष अभिरक्षा मां को सौंप दी गई।
इसके बाद मां ने प्राकृतिक संरक्षक के रूप में बच्चे के लिए एकल अभिभावक की श्रेणी में पासपोर्ट के लिए आवेदन किया।
वर्ष 2019 में पासपोर्ट जारी हुआ, जिसकी वैधता 8 मई 2019 से 7 मई 2024 तक थी। खास बात यह थी कि उस पासपोर्ट में केवल मां का नाम दर्ज था और पिता का नाम शामिल नहीं किया गया था।
नवीनीकरण के समय अचानक पिता का नाम मांगा गया
पासपोर्ट की अवधि समाप्त होने से पहले मां ने 5 अप्रैल 2024 को नवीनीकरण के लिए आवेदन किया।
10 अप्रैल 2024 को जयपुर स्थित पासपोर्ट सेवा केंद्र में आवेदन जमा किया गया। इसके बाद मामला क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय भेजा गया।
लेकिन 13 मई 2024 को क्षेत्रीय पासपोर्ट कार्यालय ने आदेश जारी कर कहा कि पासपोर्ट के नवीनीकरण के लिए बच्चे के पिता का नाम बताते हुए एक उपक्रम प्रस्तुत किया जाए। इस मांग को लेकर मां ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की।
याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में दलील दी कि वर्ष 2019 में जब बच्चे का पासपोर्ट जारी किया गया था, तब भी पिता का नाम दर्ज करने पर जोर नहीं दिया गया था।
ऐसे में नवीनीकरण के समय अचानक पिता का नाम अनिवार्य करना उचित नहीं है।
याचिकाकर्ता की ओर से पासपोर्ट अधिनियम, 1967 की धारा 6(2), पासपोर्ट मैनुअल और पासपोर्ट नियमों के सरलीकरण संबंधी प्रावधानों का भी हवाला दिया गया।
केंद्र सरकार ने क्या दलील दी?
मामले में केंद्र सरकार की ओर से पासपोर्ट कार्यालय के आदेश का बचाव किया गया।
अधिकारियों की ओर से कहा गया कि पासपोर्ट मैनुअल, 2020 के अध्याय 4 की धाराओं 4.1 और 4.3 तथा विदेश मंत्रालय के 28 फरवरी 2023 के स्पष्टीकरण को देखते हुए विवाह से जन्मे नाबालिग बच्चे के मामले में दोनों जैविक माता-पिता के नाम उपलब्ध कराना आवश्यक है।
सरकार का तर्क था कि माता-पिता के बाद में तलाक लेने से यह आवश्यकता स्वतः समाप्त नहीं हो जाती।
अधिकारियों ने यह भी कहा कि पिता का नाम हटाने की स्थिति मुख्य रूप से उन मामलों में लागू होती है जहां पिता अज्ञात हो, बच्चे के जन्म के बाद उसका बच्चे से कोई संपर्क न रहा हो या उसने मां और बच्चे के साथ अपना संबंध समाप्त कर लिया हो।
चूंकि इस मामले में पिता की पहचान स्पष्ट थी, इसलिए पासपोर्ट कार्यालय ने पिता का नाम मांगना नियमों के अनुरूप बताया।
हाईकोर्ट ने पासपोर्ट मैनुअल के प्रावधानों को कैसे देखा?
जस्टिस मनीष शर्मा ने पासपोर्ट मैनुअल, 2020 के संबंधित प्रावधानों का विस्तार से परीक्षण किया। कोर्ट ने विशेष रूप से अध्याय 4 की धारा 4.1, 4.3 और 4.5 पर गौर किया।
धारा 4.1 के अनुसार पासपोर्ट आवेदन में पिता, माता या कानूनी संरक्षक में से केवल एक अभिभावक का नाम दिया जा सकता है और दूसरे अभिभावक का नाम आवेदक के अनुरोध पर पासपोर्ट में मुद्रित नहीं किया जा सकता।
वहीं तलाकशुदा माता-पिता से जुड़े प्रावधान में यह भी कहा गया है कि जिस अभिभावक को न्यायालय ने बच्चे की अभिरक्षा दी है, उसी अभिभावक से पासपोर्ट आवेदन स्वीकार किया जा सकता है।
यदि दूसरे अभिभावक को बच्चे से मिलने या अन्य अधिकार दिए गए हों तो परिस्थितियों के अनुसार उसकी सहमति की आवश्यकता हो सकती है।
लेकिन यदि दूसरा अभिभावक बिना उचित कारण सहमति देने से इनकार करता है या अनावश्यक रूप से देरी करता है, तो कुछ परिस्थितियों में अभिरक्षा वाले अभिभावक के शपथपत्र के आधार पर पासपोर्ट जारी किया जा सकता है।
मां ने सभी आवश्यक दस्तावेज पहले ही दिए थे
हाईकोर्ट ने पाया कि इस मामले में बच्चे की मां को विशेष अभिरक्षा पहले ही न्यायालय की डिक्री के जरिए मिल चुकी थी।
इसके अलावा पासपोर्ट नवीनीकरण के आवेदन के साथ मां ने आवश्यक एनेक्सर ‘सी’ के तहत घोषणा भी प्रस्तुत की थी।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इन परिस्थितियों में बच्चे का पासपोर्ट नवीनीकरण करने के लिए पिता से अलग से उपक्रम मांगना आवश्यक नहीं था।
अदालत ने विदेश मंत्रालय की 25 जुलाई 2018 की अधिसूचना से जुड़े “पासपोर्ट नियमों के सरलीकरण” प्रावधान का भी उल्लेख किया।
इसमें कहा गया है कि एकल अभिभावक अपने बच्चे के पासपोर्ट के लिए आवेदन कर सकता है और आवेदक के अनुरोध पर दूसरे अभिभावक का नाम पासपोर्ट में मुद्रित नहीं किया जा सकता।
पासपोर्ट सेवा की वेबसाइट पर भी यही व्यवस्था
हाईकोर्ट ने पासपोर्ट सेवा की वेबसाइट पर उपलब्ध अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्नों का भी उल्लेख किया।
अदालत के अनुसार इन निर्देशों में भी यह व्यवस्था है कि एकल अभिभावक बच्चे के पासपोर्ट के लिए आवेदन कर सकता है और कुछ परिस्थितियों में दूसरे अभिभावक का नाम पासपोर्ट में शामिल करना आवश्यक नहीं है।
विशेष रूप से ऐसे तलाकशुदा अभिभावक के मामले में, जिसे बच्चे की पूर्ण अभिरक्षा मिली हो और दूसरे अभिभावक को मिलने का कोई अधिकार न हो, दूसरे अभिभावक की सहमति सामान्यतः आवश्यक नहीं होती।
ऐसे मामलों में न्यायालय के आदेश की प्रमाणित प्रति और निर्धारित घोषणा प्रस्तुत की जा सकती है।
28 फरवरी 2023 का स्पष्टीकरण भी मां के रास्ते में नहीं आया
पासपोर्ट अधिकारियों ने अपने निर्णय के समर्थन में विदेश मंत्रालय के 28 फरवरी 2023 के स्पष्टीकरण पर खास जोर दिया था।
लेकिन हाईकोर्ट ने कहा कि उक्त स्पष्टीकरण स्वयं कुछ ऐसी परिस्थितियों को मान्यता देता है जिनमें पिता का नाम पासपोर्ट में शामिल नहीं किया जा सकता।
स्पष्टीकरण में ऐसे मामलों का उल्लेख है जहां जैविक पिता का बच्चे या मां से कोई संपर्क नहीं रहा हो, पिता अज्ञात हो अथवा जैविक पिता ने बच्चे की मां के साथ गर्भधारण या बच्चे के जन्म के बाद संबंध समाप्त कर दिए हों।
अदालत ने माना कि वर्तमान मामले में भी माता-पिता का वैवाहिक संबंध आपसी सहमति से समाप्त हो चुका था और बच्चे की अभिरक्षा स्थायी रूप से मां को सौंप दी गई थी।
रिकॉर्ड से यह भी सामने आया कि बच्चे ने अपने पिता के बजाय मां का उपनाम अपनाया था। इन परिस्थितियों को देखते हुए कोर्ट ने माना कि यह मामला पिता का नाम पासपोर्ट में दर्ज किए बिना पासपोर्ट जारी करने के लिए उपयुक्त है।
दिल्ली हाईकोर्ट के फैसलों का हवाला
राजस्थान हाईकोर्ट ने इस निष्कर्ष तक पहुंचने में दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व फैसलों पर भी भरोसा किया।
अदालत ने विशेष रूप से स्मिता मान बनाम क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी और शालू निगम बनाम क्षेत्रीय पासपोर्ट अधिकारी जैसे मामलों का हवाला दिया।
हाईकोर्ट ने नोट किया कि तलाक और बच्चे की अभिरक्षा से जुड़े मामलों में एक समान कठोर नियम लागू नहीं किया जा सकता।
परिस्थितियों में काफी अंतर हो सकता है—कहीं संयुक्त अभिरक्षा हो सकती है, कहीं केवल एक अभिभावक की अभिरक्षा, कहीं मिलने का अधिकार हो सकता है और कहीं दूसरा अभिभावक बच्चे से पूरी तरह अलग हो चुका हो।
इसलिए प्रत्येक मामले के तथ्य और संबंधित न्यायालय के आदेश को ध्यान में रखना आवश्यक है।
“हाइपर-टेक्निकल और पेडेंटिक” रवैया
राजस्थान हाईकोर्ट ने अंततः पासपोर्ट अधिकारियों के रवैये को हाइपर-टेक्निकल और पेडेंटिक माना।
अदालत ने कहा कि यह निर्विवाद है कि बच्चे के माता-पिता का वैवाहिक संबंध समाप्त हो चुका था, बच्चे की विशेष अभिरक्षा मां को दी गई थी और इससे पहले वर्ष 2019 में बच्चे का पासपोर्ट पिता का नाम दर्ज किए बिना जारी किया जा चुका था।
ऐसे में नवीनीकरण के समय केवल 28 फरवरी 2023 के स्पष्टीकरण को यांत्रिक तरीके से लागू करते हुए पिता का नाम शामिल कराने की शर्त लगाना उचित नहीं था।
एक महीने में पासपोर्ट जारी करने का आदेश
कोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए 13 मई 2024 के पासपोर्ट कार्यालय के आदेश को कानूनी रूप से अस्थिर मानते हुए रद्द कर दिया।
राजस्थान हाईकोर्ट ने स्पष्ट आदेश दिया कि बच्चे के पासपोर्ट नवीनीकरण की प्रक्रिया में पिता के नाम से संबंधित कोई उपक्रम मांगकर उसे बाधित न किया जाए।
आवश्यक औपचारिकताएं पूरी होने के बाद पिता का नाम दर्ज किए बिना पासपोर्ट जारी किया जाए। यह प्रक्रिया प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से एक महीने के भीतर पूरी करनी होगी।