जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने 10 लाख की रिश्वत मांगने के मामले में आरोपी RAS अधिकारी और पूर्व एसडीएम पिंकी मीणा को बड़ी राहत देते हुए जनवरी 2021 से जारी उनके निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी है।
हाईकोर्ट ने लंबे समय तक चले निलंबन पर नाराजगी जताते हुए स्पष्ट कहा कि “निलंबन कोई दंड नहीं, बल्कि केवल अस्थायी और निवारक उपाय होता है।”
जस्टिस सुदेश बंसल की एकलपीठ ने यह अंतरिम आदेश पिंकी मीणा की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।
अदालत ने यह भी माना कि समान आरोपों वाले तत्कालीन दौसा एसडीएम पुष्कर कुमार मित्तल को पहले ही राहत दी जा चुकी है, ऐसे में समानता के सिद्धांत के तहत पिंकी मीणा को भी राहत मिलनी चाहिए।
जनवरी 2021 से निलंबित थीं पिंकी मीणा
पिंकी मीणा को 15 जनवरी 2021 को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) द्वारा दर्ज एफआईआर के बाद निलंबित किया गया था।
इसी मामले में तत्कालीन दौसा एसडीएम पुष्कर कुमार मित्तल को भी निलंबित किया गया था।
दोनों अधिकारियों के खिलाफ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम और भारतीय दंड संहिता की विभिन्न धाराओं के तहत मामला दर्ज हुआ था।
क्या कहा याचिका में
मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता विपुल सिंघवी ने अदालत को बताया कि पिंकी मीणा पिछले साढ़े चार वर्षों से लगातार निलंबित हैं, जबकि विभागीय चार्जशीट भी काफी देरी से 30 दिसंबर 2025 को जारी की गई।
याचिका में यह भी कहा गया कि आपराधिक मामले में चार्जशीट और अभियोजन स्वीकृति पहले ही दी जा चुकी है, लेकिन ट्रायल में अब तक कोई विशेष प्रगति नहीं हुई है। ऐसे में अनिश्चितकाल तक निलंबन जारी रखना न्यायसंगत नहीं कहा जा सकता।
समीक्षा समिति के फैसले पर सवाल
राज्य सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि 16 दिसंबर 2025 को हुई समीक्षा समिति की बैठक में पिंकी मीणा का निलंबन समाप्त करने की सिफारिश नहीं की गई थी।
हालांकि हाईकोर्ट ने इस पर गंभीर टिप्पणी करते हुए कहा कि समीक्षा समिति ने अपने निर्णय के समर्थन में कोई ठोस कारण दर्ज नहीं किए।
अदालत ने माना कि केवल औपचारिक रूप से निलंबन बढ़ाते रहना उचित नहीं है, विशेषकर तब जब मामले में सुनवाई लंबित हो और जांच में कोई नई परिस्थिति सामने न आई हो।
“निलंबन दंडात्मक स्वरूप ग्रहण कर चुका”
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के चर्चित फैसले अजय कुमार चौधरी बनाम भारत सरकार का हवाला देते हुए कहा कि बिना पर्याप्त कारण लंबे समय तक किसी कर्मचारी को निलंबित रखना उचित नहीं माना जा सकता।
अदालत ने कहा कि निलंबन का उद्देश्य केवल निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना होता है, लेकिन पिंकी मीणा के मामले में यह अब दंडात्मक स्वरूप ग्रहण कर चुका है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि जब समान परिस्थितियों वाले अधिकारी पुष्कर कुमार मित्तल को पहले ही राहत दी जा चुकी है, तो पिंकी मीणा के मामले में अलग दृष्टिकोण अपनाने का कोई औचित्य नहीं बनता।
समानता के सिद्धांत को बनाया आधार
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि पिंकी मीणा और पुष्कर कुमार मित्तल दोनों को 15 जनवरी 2021 को एक ही मामले में निलंबित किया गया था।
ऐसे में यदि एक अधिकारी को राहत दी जा चुकी है, तो दूसरे अधिकारी को समान परिस्थितियों में राहत से वंचित नहीं रखा जा सकता।
अदालत ने समानता के संवैधानिक सिद्धांत को अहम आधार मानते हुए पिंकी मीणा के निलंबन आदेश पर अंतरिम रोक लगा दी।
साथ ही निर्देश दिए कि इस याचिका को अंतिम सुनवाई के लिए पुष्कर कुमार मित्तल की लंबित याचिका के साथ सूचीबद्ध किया जाए।
प्रशासनिक हलकों में चर्चा
हाईकोर्ट के इस आदेश के बाद प्रशासनिक और नौकरशाही हलकों में इस फैसले को महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
लंबे समय तक निलंबन की प्रक्रिया और समीक्षा समितियों की कार्यप्रणाली को लेकर भी इस आदेश के बाद नई बहस शुरू हो सकती है।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि यह फैसला भविष्य में उन मामलों के लिए भी मिसाल बन सकता है, जहां सरकारी अधिकारियों को बिना ठोस प्रगति के वर्षों तक निलंबित रखा जाता है।