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22 साल बाद नर्सिंग आफिसर को मिला न्याय, अस्थायी/संविदा सेवा अवधि को भी नियमित सेवा मानते हुए समस्त सेवा परिलाभ देने के आदेश

Rajasthan High Court Grants Relief to Nursing Officer Neetu Choudhary After 22 Years, Orders Service Continuity Benefits

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक ​महिला नर्सिंग ऑफिसर नीतू चौधरी को बड़ी राहत देते हुए एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है।

राजस्थान हाईकोर्ट ने याचिकाकर्ता की प्रारंभिक अस्थायी/संविदा सेवा अवधि को भी नियमित सेवा मानते हुए समस्त सेवा परिलाभ देने का आदेश दिया हैंं.

इस फैसले के बाद याचिकाकर्ता नीतू चौधरी को 26 जनवरी 2000 से सेवा निरंतरता, वरिष्ठता, पदोन्नति, वेतनवृद्धि और अन्य सभी लाभ मिल सकेंगे।

राजस्थान हाईकोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश जस्टिस कुलदीप माथुर की एकलपीठ ने यह अहम आदेश पारित किया।

करीब 22 वर्षों से न्याय की लड़ाई लड़ रहीं नीतू चौधरी के पक्ष में आए इस निर्णय को संविदा और अस्थायी कर्मचारियों के लिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है।

2004 में दायर की थी याचिका

याचिकाकर्ता नीतू चौधरी की ओर से अधिवक्ता यशपाल खिलेरी ने वर्ष 2004 में रिट याचिका दायर की थी।

याचिका में बताया गया कि चिकित्सा एवं स्वास्थ्य विभाग द्वारा रोजगार कार्यालय एवं विज्ञप्ति के माध्यम से आवेदन आमंत्रित किए गए थे।

चयन समिति ने नियमित चयन प्रक्रिया, मेरिट और रोस्टर प्रणाली का पालन करते हुए 25 जनवरी 2000 को नर्स ग्रेड-द्वितीय के स्वीकृत रिक्त पदों पर चयन किया था। इसके बाद याचिकाकर्ता लगातार चिकित्सा विभाग में सेवाएं दे रही हैं।

हालांकि बाद में विभाग द्वारा संविदा आधार पर नियुक्तियां शुरू कर दी गईं।

इसी बीच राज्य सरकार ने 26 अक्टूबर 2004 को रिटायर्ड कार्मिकों की नियुक्तियों से संबंधित आदेश जारी किए और 11 नवंबर 2004 को विज्ञप्ति प्रकाशित की, जिसे याचिकाकर्ता ने चुनौती दी।

साथ ही सेवा नियमितिकरण और ‘समान कार्य, समान वेतन’ की मांग भी उठाई गई।

याचिकाकर्ता ने ही की पैरवी

मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता नीतू चौधरी स्वयं हाईकोर्ट में उपस्थित हुईं।

शनिवार को कार्यदिवस बनाए जाने के विरोध में अधिवक्ताओं के स्वैच्छिक बहिष्कार के चलते उन्होंने खुद अपनी पैरवी करते हुए अदालत से गुहार लगाई कि उनकी प्रारंभिक नियुक्ति तिथि 26 जनवरी 2000 से सेवा गणना करते हुए सभी सेवा लाभ दिए जाएं।

याचिकाकर्ता ने अदालत को बताया कि चिकित्सा अधीनस्थ सेवा नियम, 1965 में अस्थायी नियुक्ति का प्रावधान है तथा राजस्थान सेवा नियम, 1951 एवं पेंशन नियम, 1996 में अस्थायी सेवा को अर्हक सेवा माना गया है।

उन्होंने सुप्रीम कोर्ट के धर्म सिंह और जग्गो प्रकरणों का हवाला देते हुए कहा कि लंबे समय तक बिना व्यवधान सेवा देने वाले कर्मचारियों को नियमित सेवा लाभ मिलना चाहिए।

सरकार का जवाब

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से यह तर्क दिया गया कि डॉ. परितोष उज्ज्वल मामले में चयन समिति गठित की गई थी, जबकि वर्तमान मामले में प्रक्रिया अलग थी।

लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।

हाईकोर्ट ने कहा कि नीतू चौधरी के मामले में भी पूरी चयन प्रक्रिया विधिसम्मत तरीके से अपनाई गई थी और उन्हें भी समान लाभ मिलना चाहिए।

हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि याचिकाकर्ता की प्रारंभिक अस्थायी/एडहॉक/अर्जेंट नियुक्ति की अवधि को सेवा निरंतरता के साथ जोड़ा जाए तथा समस्त सेवा परिलाभ दिए जाएं।

हाईकोर्ट ने राज्य सरकार और चिकित्सा विभाग को निर्देश दिया कि दस्तावेजों का सत्यापन कर आठ सप्ताह के भीतर उचित आदेश जारी किए जाएं।

इस फैसले के बाद नीतू चौधरी को वर्ष 2000 से वरिष्ठता, पदोन्नति, नियमित वेतनमान, वेतनवृद्धि और अन्य सभी भत्तों का लाभ मिलने का रास्ता साफ हो गया है।

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