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रेस-जुडिकाटा पर हाईकोर्ट सख्त: बिना साक्ष्य के किसी विवाद को खत्म करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ अन्याय, ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द

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जयपुर। न्यायिक प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को मजबूत करते हुए रेस-जुडिकाटा को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने एक अहम फैसला सुनाया है।

जस्टिस बिपिन गुप्ता की एकलपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा पारित आदेश को रद्द करते हुए कहा कि बिना साक्ष्य के किसी विवाद को खत्म करना न्यायिक प्रक्रिया के साथ अन्याय होगा।

रेस-जुडिकाटा (Res Judicata) जैसे गंभीर मुद्दों को केवल प्रारंभिक स्तर पर तय करना न्याय के मूल सिद्धांतों के खिलाफ है, खासकर तब जब मामला तथ्यों और साक्ष्यों पर निर्भर करता हो।

यह आदेश एकलपीठ ने लीलाधर की ओर से दायर याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया है।

क्या है पूरा विवाद?

यह मामला जयपुर के पुरानी बस्ती क्षेत्र में स्थित एक संपत्ति से जुड़ा है, जहां याचिकाकर्ता लीलाधर ने आरोप लगाया कि प्रतिवादी पक्ष ने साझा दीवार (कॉमन वॉल) पर अवैध निर्माण कर दिया और उसके पास तहखाना (सेलर) बनाने की योजना बनाई।

याचिकाकर्ता ने अदालत से स्थायी और अनिवार्य निषेधाज्ञा (Permanent & Mandatory Injunction) की मांग करते हुए कहा कि यह निर्माण उनके अधिकारों का उल्लंघन है।

वहीं, प्रतिवादी पक्ष ने इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हुए कहा कि यह विवाद पहले ही 1977 में एक सिविल मुकदमे में तय हो चुका है, इसलिए अब इस पर दोबारा सुनवाई नहीं हो सकती।

ट्रायल कोर्ट ने क्या किया?

ट्रायल कोर्ट ने Order 14 Rule 2 CPC के तहत ‘रेस-जुडिकाटा’ को एक प्रारंभिक मुद्दा मानते हुए यह फैसला दिया कि यह विवाद पहले ही 1977 के एक पुराने फैसले में तय हो चुका है, इसलिए इस पर दोबारा सुनवाई की जरूरत नहीं है।

जिसके चलते, मामले के एक महत्वपूर्ण हिस्से को बिना विस्तृत सुनवाई के ही समाप्त कर दिया गया। इसी आदेश को राजस्थान हाईकोर्ट में चुनौती दी गई।

याचिकाकर्ता का पूरा पक्ष

याचिकाकर्ता लीलाधर की ओर से अधिवक्ताओं ने कहा कि वर्तमान विवाद और वर्ष 1977 के पुराने मुकदमे के बीच कोई समानता नहीं है। उन्होंने कहा कि पूर्व का मामला प्री-एम्प्शन (Pre-emption) से संबंधित था, जबकि वर्तमान मामला एकदम अलग प्रकृति का है, जिसमें स्थायी एवं अनिवार्य निषेधाज्ञा (Permanent & Mandatory Injunction) की मांग की गई है। इसलिए दोनों मामलों को एक समान मानकर रेस-जुडिकाटा लागू करना पूरी तरह गलत है।

याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि 1977 के फैसले में जिस “कॉमन वॉल” (साझा दीवार) का मुद्दा आज विवाद का केंद्र है, उस पर न तो कोई स्पष्ट मुद्दा तय किया गया था और न ही उस पर अंतिम निर्णय दिया गया था। उस फैसले में केवल एक सामान्य टिप्पणी की गई थी कि दीवार के संबंध में पूर्वजों के अधिकार “टेनेंसी इन कॉमन” जैसे थे, लेकिन यह कोई निर्णायक निष्कर्ष नहीं था।

याचिकाकर्ता ने आगे कहा कि रेस-जुडिकाटा का सिद्धांत तभी लागू होता है जब पक्षकार समान हों, विवाद का विषय समान हो और उस पर पहले अंतिम निर्णय हो चुका हो, जबकि इस मामले में ये तीनों आवश्यक तत्व स्पष्ट रूप से अनुपस्थित हैं।

अधिवक्ता ने दलील दी कि रेस-जुडिकाटा एक मिश्रित प्रश्न (Mixed Question) है, जिसमें कानून और तथ्य दोनों शामिल होते हैं। इसलिए इसे बिना साक्ष्य के केवल प्रारंभिक मुद्दे के रूप में तय करना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले Sathyanath vs Sarojamani (2022) का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे मामलों में साक्ष्य की जांच अनिवार्य होती है और इन्हें प्रारंभिक स्तर पर नहीं निपटाया जा सकता।

इसके अलावा, यह भी दलील दी गई कि ट्रायल कोर्ट ने यह नजरअंदाज कर दिया कि वर्तमान विवाद में याचिकाकर्ता ने स्पष्ट रूप से कॉमन वॉल के अधिकार और उससे जुड़े निर्माण को चुनौती दी है, जो कि पहले कभी निर्णीत नहीं हुआ।

विरोधी पक्ष की दलीलें

प्रतिवादी पक्ष ने याचिकाकर्ता के सभी तर्कों का कड़ा विरोध करते हुए अदालत में यह दावा किया कि याचिकाकर्ता तथ्यों को तोड़-मरोड़ कर पेश कर रहा है और यह मामला पहले ही पूरी तरह से तय हो चुका है।

प्रतिवादी के अधिवक्ता ने कहा कि वर्ष 1977 में हुए सिविल मुकदमे “Harinarayan vs Kaluram” में इस विवादित दीवार के संबंध में स्पष्ट निर्णय दिया गया था, जिसमें अदालत ने कहा था कि यह दीवार साझा (कॉमन) नहीं है।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि वर्तमान पक्षकार उसी संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं, इसलिए पूर्व का निर्णय उन पर पूरी तरह से लागू होता है।

कानून के अनुसार, उत्तराधिकारी अपने पूर्वजों के अधिकारों और दायित्वों से बंधे होते हैं, इसलिए वे पुराने फैसले को चुनौती नहीं दे सकते।

अधिवक्ता ने कहा कि रेस-जुडिकाटा एक वैधानिक सिद्धांत है, जिसका उद्देश्य एक ही विवाद को बार-बार उठाने से रोकना है। यदि इस सिद्धांत को नजरअंदाज किया गया, तो न्यायालयों में अनावश्यक मुकदमों की भरमार हो जाएगी।

उन्होंने यह भी कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से Order 14 Rule 2 CPC का प्रयोग करते हुए इस मुद्दे को प्रारंभिक स्तर पर तय किया, क्योंकि यह एक कानूनी प्रश्न था और यदि इसे प्रारंभ में ही तय कर दिया जाए, तो पूरा ट्रायल अनावश्यक हो सकता है।

प्रतिवादी के वकील ने सुप्रीम कोर्ट और अन्य न्यायालयों के कई फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि जहां किसी मामले में स्पष्ट रूप से कानूनी बाधा (Legal Bar) हो, वहां अदालत को पहले उसी मुद्दे को तय करना चाहिए।

उन्होंने यह भी तर्क दिया कि यदि हर बार पुराने मामलों को नए सिरे से खोला जाएगा, तो न्यायिक प्रणाली पर अत्यधिक दबाव पड़ेगा और मामलों का निपटारा वर्षों तक लंबित रहेगा।

न्याय जल्दबाजी में नहीं होता

हाईकोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद साफ कहा कि रेस-जुडिकाटा एक मिश्रित प्रश्न (Mixed Question) है—यह कानून और तथ्य दोनों पर आधारित होता है। ऐसे मामलों में साक्ष्य और दस्तावेजों की जांच आवश्यक है और केवल कागजी आधार पर इसे प्रारंभिक मुद्दा बनाना न्याय के सिद्धांतों के खिलाफ है।

कोर्ट ने कहा कि:
“जब तक यह स्पष्ट न हो जाए कि पुराने और नए मामले के तथ्य, पक्षकार और मुद्दे पूरी तरह समान हैं, तब तक रेस-जुडिकाटा लागू नहीं किया जा सकता।”

अंतिम आदेश

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि ट्रायल कोर्ट का 15 नवंबर 2017 का आदेश रद्द किया जाता है, सभी मुद्दों पर पुनः सुनवाई की जाए और दोनों पक्षों को साक्ष्य प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाए।

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