Order 7 Rule 11 CPC : हाईकोर्ट ने कहा कि फर्जी दस्तावेजों और कब्जे के विवाद का फैसला होगा ट्रायल में, सिर्फ डिक्लेरेशन नहीं मांगने से फर्जी शुरुआती स्तर पर खारिज नही होंगा मुकद
जोधपुर। राजस्थान सहित देशभर में संपत्ति विवादों में फर्जी दस्तावेज, फर्जी पट्टे और बनावटी लीज डीड के मामलों में लगातार वृद्धि देखी जा रही है।
कई मामलों में मृत व्यक्तियों की संपत्तियों पर कब्जा करने के लिए कथित रूप से जाली दस्तावेज तैयार किए जाते हैं।
ऐसे मामलों में पीड़ित पक्ष अक्सर निषेधाज्ञा की राहत लेकर तत्काल कब्जा संरक्षण चाहता है।
ऐसे संपत्ति विवादों के मामलों में राजस्थान हाईकोर्ट ने प्रारंभिक स्तर पर वाद पत्र खारिज करने की सीमाओं को स्पष्ट करने को लेकर बेहद महत्वपूर्ण फैसला दिया है।
राजस्थान हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद मामले में बड़ा कानूनी सिद्धांत स्पष्ट करते हुए कहा है कि
यदि कोई व्यक्ति स्वयं को संपत्ति का मालिक और कब्जाधारी बताते हुए केवल स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) और अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) की मांग करता है, तो मात्र इस आधार पर उसका वाद खारिज नहीं किया जा सकता कि उसने स्वामित्व घोषणा (Declaration) की राहत नहीं मांगी।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह भी कहा कि जब विवादित तथ्य और दस्तावेजों की सत्यता का प्रश्न हो, तब ऐसे मामलों का अंतिम निर्णय ट्रायल और साक्ष्यों के आधार पर ही किया जा सकता है।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने यह आदेश याचिकाकर्ता संदीप सिंह की ओर से दायर रिवीजन पिटीशन पर सुनवाई करते हुए दिया।
रिवीजन के जरिए नावा सिटी के वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश द्वारा पारित उस आदेश को चुनौती दी गई थी, जिसके तहत आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के अंतर्गत वाद पत्र खारिज करने की मांग को अस्वीकार कर दिया गया था।
संपत्ति विवाद से जुड़े मामले में नज़ीर
राजस्थान हाईकोर्ट ने रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए दिए इस फैसले में यह संदेश दिया है कि केवल तकनीकी आधारों पर वादों को समाप्त करने के बजाय मामलों की वास्तविक सुनवाई और साक्ष्यों के आधार पर निर्णय होना चाहिए।
विशेष रूप से उन मामलों में जहां कब्जे में हस्तक्षेप, कथित फर्जी दस्तावेज और उत्तराधिकार से जुड़े विवाद हों, वहां अदालतें प्रारंभिक चरण में अत्यधिक कठोर दृष्टिकोण अपनाने से बचेंगी।
यह आदेश भविष्य में ऐसे अनेक मामलों के लिए महत्वपूर्ण नज़ीर साबित हो सकता है।
ये है मामला
मामले में प्रतिवादी बाबिता यादव, ईशिता यादव और अन्य ने सिविल कोर्ट में वाद दायर कर आरोप लगाया था कि विवादित संपत्ति मूल रूप से स्वर्गीय प्रदीप सिंह की थी और उनके निधन के बाद यह संपत्ति उनके कानूनी वारिसों—पत्नी एवं बच्चों—को प्राप्त हुई।
वादियों का कहना था कि वे संपत्ति पर वैध कब्जे में हैं, लेकिन प्रतिवादी पक्ष कथित रूप से फर्जी और मनगढ़ंत लीज डीड के आधार पर उन्हें बेदखल करने तथा कब्जे में हस्तक्षेप करने की कोशिश कर रहा है।
इसी आधार पर उन्होंने स्थायी और अनिवार्य निषेधाज्ञा की मांग की थी।
इस आवेदन के खिलाफ याचिकाकर्ता ने आदेश 7 नियम 11 सीपीसी का हवाला देते हुए प्रारंभिक स्तर पर ही वाद पत्र खारिज करने का अनुरोध किया।
जिसे ट्रायल कोर्ट ने मानने से इनकार कर दिया, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में रिवीजन पिटीशन दायर की।
क्या था याचिकाकर्ता का पक्ष
याचिकाकर्ता संदीप सिंह की ओर से अदालत में दलील दी गई कि मूल वाद कानूनन विचारणीय ही नहीं है।
अधिवक्ता ने तर्क रखा कि जब संपत्ति के स्वामित्व को लेकर गंभीर विवाद मौजूद है और दोनों पक्ष अलग-अलग दस्तावेजों के आधार पर दावा कर रहे हैं, तब केवल निषेधाज्ञा का वाद पर्याप्त नहीं माना जा सकता।
याचिकाकर्ता का कहना था कि वादियों को पहले अपने अधिकारों की घोषणा (Declaratory Relief) मांगनी चाहिए थी।
अदालत के समक्ष यह भी कहा गया कि वादियों ने स्वयं अपने वाद पत्र में प्रतिस्पर्धी दस्तावेजों और विरोधी दावों का उल्लेख किया है।
ऐसे में केवल इंजंक्शन की मांग करके वे न्यायालय से राहत नहीं ले सकते।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि विवादित भूमि खारी भूमि (Saline Land) आवंटन से संबंधित विशेष वैधानिक ढांचे के अधीन आती है, इसलिए इस मामले में सिविल न्यायालय का अधिकार क्षेत्र ही बाधित है।
याचिकाकर्ता ने आदेश 7 नियम 11 सीपीसी का हवाला देते हुए कहा कि जब वाद अपने स्वरूप में ही कानूनन टिकाऊ नहीं हो, तब प्रारंभिक स्तर पर ही वाद पत्र खारिज कर दिया जाना चाहिए।
उनका कहना था कि ट्रायल कोर्ट ने इस कानूनी पहलू की अनदेखी करते हुए गलत आदेश पारित किया है।
प्रतिवादी का पूरा पक्ष
प्रतिवादी बाबिता यादव, ईशिता यादव एवं अन्य ने मूल सिविल वाद दायर करते हुए दावा किया कि विवादित संपत्ति मूल रूप से स्वर्गीय प्रदीप सिंह की थी।
उनके निधन के बाद संपत्ति उनके कानूनी वारिसों—पत्नी और बच्चों—को उत्तराधिकार के रूप में प्राप्त हुई।
वादियों ने अदालत में स्पष्ट रूप से कहा कि वे संपत्ति के वैध मालिक और कब्जाधारी हैं। वे शांतिपूर्ण तरीके से संपत्ति पर कब्जे में रह रहे हैं और प्रतिवादी पक्ष कथित रूप से फर्जी और मनगढ़ंत लीज डीड के आधार पर उनके कब्जे में हस्तक्षेप कर रहा है। उन्हें बेदखल करने और संपत्ति पर कब्जा करने का प्रयास किया जा रहा है।
वादियों का कहना था कि प्रतिवादी जिन दस्तावेजों के आधार पर दावा कर रहे हैं, वे forged and fabricated lease deed हैं। इसी कारण उन्होंने अदालत से सुरक्षा की मांग करते हुए स्थायी निषेधाज्ञा (Permanent Injunction) और अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) की मांग की है।
प्रतिवादी पक्ष का यह भी अप्रत्यक्ष तर्क था कि आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत वाद पत्र तभी खारिज किया जा सकता है जब वाद स्पष्ट रूप से कानून द्वारा प्रतिबंधित हो। जबकि उनके वाद पत्र में स्पष्ट कारण-ए-कार्रवाई (Cause of Action) दर्शाया गया है।
हाईकोर्ट ने क्या कहा
जस्टिस फरजंद अली ने मामले की सुनवाई के दौरान स्पष्ट किया कि आदेश 7 नियम 11 सीपीसी के तहत किसी वाद पत्र को खारिज करने पर विचार करते समय अदालत केवल वाद पत्र में किए गए कथनों को ही देख सकती है।
प्रतिवादी द्वारा उठाए गए बचाव या विवादित तथ्यों की गहराई में इस चरण पर नहीं जाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि वाद पत्र को समग्र रूप से और सार्थक तरीके से पढ़ा जाना आवश्यक है।
हाईकोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि वाद पत्र के अवलोकन से स्पष्ट है कि वादियों ने संपत्ति पर अपना स्वामित्व और कब्जा होने का दावा किया है।
उन्होंने यह भी कहा है कि प्रतिवादी कथित फर्जी लीज डीड के आधार पर उनके कब्जे में हस्तक्षेप कर रहे हैं। ऐसे में प्रथम दृष्टया यह नहीं कहा जा सकता कि केवल घोषणात्मक राहत नहीं मांगने के कारण वाद कानूनन बाधित हो जाता है।
हाईकोर्ट ने कहा कि यह पूरी तरह संभव है कि ट्रायल के दौरान वादी अपने दावे साबित न कर पाएं और अंततः उनका वाद खारिज हो जाए, लेकिन ऐसी संभावना मात्र के आधार पर वाद पत्र को प्रारंभिक चरण में खारिज नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने माना कि इस मामले में कई विवादित तथ्य हैं, जिनका निर्धारण केवल साक्ष्य और गवाहों के आधार पर ट्रायल के दौरान ही किया जा सकता है।
‘डिस्प्यूटेड क्वेश्चन ऑफ फैक्ट’ का हवाला
हाईकोर्ट ने विशेष रूप से कहा कि याचिकाकर्ता द्वारा उठाए गए अधिकांश प्रश्न “विवादित तथ्य” (Disputed Questions of Fact) की श्रेणी में आते हैं।
ऐसे प्रश्नों का निर्णय आदेश 7 नियम 11 सीपीसी की सीमित कार्यवाही में नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि जब तक यह साबित नहीं हो जाता कि वाद स्पष्ट रूप से कानून द्वारा निषिद्ध है या वाद पत्र से ही राहत असंभव दिखाई देती है, तब तक वाद पत्र खारिज नहीं किया जा सकता।
इस स्तर पर अदालत को केवल यह देखना होता है कि वाद पत्र में ऐसा कोई आधार मौजूद है या नहीं जिससे सुनवाई की जा सके।
ट्रायल कोर्ट के आदेश को सही ठहराया
हाईकोर्ट ने पाया कि नावा सिटी के वरिष्ठ सिविल न्यायाधीश द्वारा पारित आदेश में कोई अधिकार क्षेत्र संबंधी त्रुटि या गंभीर अनियमितता नहीं है।
अदालत ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने सही तरीके से कानून की व्याख्या की है और वाद पत्र खारिज करने से इनकार करने में कोई गलती नहीं की।
इन्हीं टिप्पणियों के साथ हाईकोर्ट ने संदीप सिंह की सिविल रिवीजन पिटीशन को प्रारंभिक स्तर पर ही खारिज कर दिया।
क्यों महत्वपूर्ण है यह फैसला
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह फैसला संपत्ति विवादों में इंजंक्शन सूट और डिक्लेरेटरी सूट के बीच अंतर को स्पष्ट करता है।
अक्सर प्रतिवादी पक्ष यह तर्क उठाता है कि यदि स्वामित्व विवादित है तो केवल निषेधाज्ञा का वाद स्वीकार नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने इस आदेश में साफ किया है कि प्रत्येक मामले के तथ्यों के आधार पर यह तय होगा कि घोषणात्मक राहत आवश्यक है या नहीं।
यदि वादी स्वयं को कब्जाधारी और मालिक बताते हुए केवल कब्जे की सुरक्षा चाहता है तथा प्रतिवादी के हस्तक्षेप को रोकना चाहता है, तो प्रारंभिक स्तर पर केवल इस आधार पर वाद को खारिज नहीं किया जा सकता कि घोषणा संबंधी राहत नहीं मांगी गई।
आदेश 7 नियम 11 सीपीसी क्या है
सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) का आदेश 7 नियम 11 अदालत को यह अधिकार देता है कि यदि कोई वाद कानूनन टिकाऊ नहीं हो, आवश्यक कोर्ट फीस जमा नहीं की गई हो, या वाद पत्र से ही स्पष्ट हो कि मामला सुनवाई योग्य नहीं है, तो अदालत प्रारंभिक स्तर पर ही वाद पत्र खारिज कर सकती है।
हालांकि अदालतों ने समय-समय पर यह स्पष्ट किया है कि इस प्रावधान का उपयोग अत्यंत सीमित परिस्थितियों में ही किया जाना चाहिए। अदालत को केवल वाद पत्र में लिखे तथ्यों को मानकर निर्णय लेना होता है। प्रतिवादी का बचाव या दस्तावेज इस स्तर पर निर्णायक नहीं होते।
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