कठोर NDPS कानून में भी जरूरी है ठोस आधार, केवल धारा 67 का बयान और ₹68,500 की नकदी पर्याप्त नहीं,केवल ‘सहयोग’ जैसे सामान्य शब्द से धारा 29 के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते- हाईकोर्ट
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने मादक पदार्थों की तस्करी से जुड़े एक मामले में महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया हैं कि केवल किसी आरोपी से संबंध, कथित सहयोग या सह-आरोपियों के बयान के आधार पर एनडीपीएस अधिनियम की धारा 29 के तहत आपराधिक षड्यंत्र या उकसावे का आरोप कायम नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में भी अभियोजन सामग्री में अपराध के आवश्यक तत्वों का प्रथमदृष्टया आधार और पर्याप्त तथ्यात्मक सामग्री होना जरूरी है।
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने भेरूलाल पुत्र शंकरलाल अहीर की ओर से दायर आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार करते हुए रिपोर्टेबल जजमेंट के जरिए यह फैसला दिया है.
इसके साथ ही हाईकोर्ट ने विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस प्रकरण संख्या-1, चित्तौड़गढ़ द्वारा 6 दिसंबर 2023 को पारित आरोप तय करने के आदेश को निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने भेरूलाल को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8/29 के अपराध से डिस्चार्ज कर दिया।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसके आदेश में की गई टिप्पणियां केवल भेरूलाल के मामले तक सीमित रहेंगी और अन्य आरोपियों के खिलाफ कार्यवाही पर इसका कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा।
क्या था पूरा मामला?
मामला 15 फरवरी 2023 का है। अभियोजन के अनुसार, केंद्रीय नारकोटिक्स ब्यूरो की टीम को मुखबिर से सूचना मिली थी।
इसके आधार पर टीम चित्तौड़गढ़ जिले के चक्तिया गांव पहुंची और आरोपी रमेश्वर, कालू तथा उनके अन्य भाइयों से कथित रूप से जुड़े परिसरों की तलाशी ली गई।
अभियोजन के अनुसार तलाशी के दौरान अफीम, डोडा-पोस्त तथा कुछ टैबलेट बरामद किए गए।
इसके बाद रमेश्वर और कालू को गिरफ्तार कर नीमच स्थित डिप्टी नारकोटिक्स कमिश्नर के कार्यालय ले जाया गया, जहां उनके बयान दर्ज किए गए।
इसके बाद भेरूलाल, जिसे अभियोजन ने रमेश्वर का दूर का बहनोई बताया, गिरफ्तार आरोपियों से मिलने वहां पहुंचा।
अभियोजन का कहना था कि रमेश्वर और कालू के बयानों के आधार पर भेरूलाल को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 के तहत समन जारी किया गया और उसका भी बयान दर्ज किया गया।
अभियोजन के अनुसार भेरूलाल ने कथित तौर पर आरोपियों के अवैध मादक पदार्थ कारोबार में सहयोग करने की बात स्वीकार की थी।
इसके बाद उसे एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8/18(बी), 15(सी), 22(सी) और 29 के तहत गिरफ्तार किया गया।
उसकी व्यक्तिगत तलाशी में ₹68,500 नकद और राजस्थान पुलिस में कांस्टेबल के रूप में सेवा से संबंधित पहचान पत्र मिलने की बात भी सामने आई।
अभियोजन का आरोप था कि भेरूलाल ने यह रकम नारकोटिक्स अधिकारियों को देने के उद्देश्य से लाई थी, ताकि रमेश्वर के बयान के संबंध में उसे कुछ राहत मिल सके।
बाद में जांच पूरी होने के बाद आरोप-पत्र पेश किया गया और ट्रायल कोर्ट ने 6 दिसंबर 2023 को भेरूलाल के खिलाफ एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8/29 के तहत आरोप तय कर दिया।
याचिकाकर्ता भेरूलाल की क्या थी दलील?
भेरूलाल की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने हाईकोर्ट के समक्ष मुख्य रूप से तर्क दिया कि उसे इस मामले में मादक पदार्थों की बरामदगी के स्थान से नहीं पकड़ा गया था और न ही उसके कब्जे से कोई मादक पदार्थ बरामद हुआ।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी कहा गया कि उसके खिलाफ मामला मूल रूप से सह-आरोपी रमेश्वर और कालू के कथित बयानों तथा बाद में उसके स्वयं के कथित बयान पर आधारित है।
उसके खिलाफ ऐसा कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष कृत्य रिकॉर्ड पर नहीं है, जिससे यह साबित हो सके कि उसने मादक पदार्थों की खरीद, बिक्री, परिवहन, भंडारण या तस्करी में सहायता की।
याचिकाकर्ता ने यह भी तर्क दिया कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 29 तभी लागू हो सकती है जब अभियोजन की ओर से उकसावे या आपराधिक षड्यंत्र में भागीदारी का कोई ठोस आधार प्रस्तुत किया जाए।
केवल किसी व्यक्ति के साथ संबंध या परिचय के आधार पर धारा 29 का आरोप नहीं लगाया जा सकता।
₹68,500 की बरामदगी के संबंध में भी याचिकाकर्ता का पक्ष था कि केवल नकदी मिलना अपने आप में एनडीपीएस अपराध में संलिप्तता का प्रमाण नहीं है।
अभियोजन का मामला क्या था?
अभियोजन ने रिकॉर्ड के आधार पर भेरूलाल को कथित मादक पदार्थ कारोबार से जोड़ने की कोशिश की।
उसके खिलाफ मुख्य आधार रमेश्वर और कालू के कथित बयान थे, जिनके आधार पर यह आरोप लगाया गया कि भेरूलाल ने उनके अवैध कारोबार में सहयोग किया।
इसके अलावा अभियोजन ने उसकी तलाशी से मिली ₹68,500 की नकदी को भी महत्वपूर्ण परिस्थिति बताया।
अभियोजन के अनुसार भेरूलाल ने कथित रूप से बताया था कि वह यह रकम नारकोटिक्स अधिकारियों को देकर रमेश्वर के बयान के संबंध में राहत दिलाने के उद्देश्य से लाया था।
इसी परिस्थिति को अभियोजन ने उसके आरोपियों से संबंध और कथित गतिविधियों से जोड़ने का प्रयास किया।
हालांकि हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड की जांच करते हुए पाया कि अभियोजन सामग्री में यह स्पष्ट नहीं किया गया था कि भेरूलाल ने वास्तव में मादक पदार्थों की खरीद की, उनका परिवहन किया, उन्हें छिपाया, खरीद के लिए धन उपलब्ध कराया, बिक्री की व्यवस्था की, ग्राहकों से संपर्क कराया, वाहन की व्यवस्था की या तस्करी के कारोबार को आगे बढ़ाने के लिए कोई अन्य विशिष्ट कार्य किया।
हाईकोर्ट ने ‘Cooperation’ शब्द पर उठाया सवाल
जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने अपने फैसले में विशेष रूप से इस बात पर ध्यान दिया कि अभियोजन रिकॉर्ड में भेरूलाल द्वारा आरोपियों के साथ ‘सहयोग’ करने की बात कही गई, लेकिन यह नहीं बताया गया कि वह सहयोग वास्तव में किस कार्य के रूप में किया गया था।
कोर्ट ने सवाल किया कि क्या उसने मादक पदार्थ खरीदा, उसका परिवहन किया, उसे छिपाया, उसकी खरीद के लिए धन दिया, बिक्री की व्यवस्था की, खरीदारों से संपर्क किया, परिसर उपलब्ध कराया या आपराधिक षड्यंत्र को आगे बढ़ाने के लिए कोई अन्य कार्य किया।
कोर्ट के अनुसार रिकॉर्ड में न तो कोई विशेष लेन-देन, तारीख, स्थान, मात्रा, वाहन, वित्तीय व्यवहार, संवाद या ऐसा अन्य प्रत्यक्ष कार्य बताया गया था, जिससे भेरूलाल की कथित भूमिका स्पष्ट होती हो। इसलिए ‘सहयोग’ का आरोप सामान्य ही नहीं बल्कि मूल रूप से अस्पष्ट था।
धारा 29 के लिए केवल संबंध पर्याप्त नहीं
हाईकोर्ट ने कहा कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 29 केवल इस आधार पर लागू नहीं की जा सकती कि किसी व्यक्ति का मुख्य आरोपी से संबंध, परिचय या संपर्क था।
अभियोजन को कम से कम प्रथमदृष्टया ऐसा तथ्यात्मक आधार दिखाना होगा जिससे यह अनुमान लगाया जा सके कि आरोपी ने किसी अपराध के लिए उकसाया या आपराधिक षड्यंत्र में भाग लिया।
केवल ‘सहयोग’ जैसे सामान्य शब्द से धारा 29 के आवश्यक तत्व पूरे नहीं होते।
धारा 67 के बयानों पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले का असर
फैसले में हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के महत्वपूर्ण Tofan Singh v. State of Tamil Nadu, (2021) 4 SCC 1 फैसले का हवाला देते हुए कहा कि सुप्रीम कोर्ट पहले ही स्पष्ट कर चुका है कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 67 के तहत दर्ज बयान को एनडीपीएस अपराध के मुकदमे में स्वीकारोक्तिपूर्ण बयान के रूप में इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
संविधान पीठ ने यह भी माना था कि एनडीपीएस अधिनियम की धारा 53 के तहत शक्तियां प्राप्त अधिकारी, संबंधित परिस्थितियों में साक्ष्य अधिनियम की धारा 25 के उद्देश्य से पुलिस अधिकारी माने जाते हैं और ऐसे अधिकारी के समक्ष दिया गया स्वीकारोक्तिपूर्ण बयान दोषसिद्धि का आधार नहीं बनाया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि इसका महत्व केवल अंतिम दोषसिद्धि के चरण तक सीमित नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को मुकदमे में फंसाने का मूल आधार ही सह-आरोपियों के धारा 67 के तहत दर्ज कथित बयान हैं, तो ऐसे बयान अपने आप में अपराध के गायब आवश्यक तत्वों की पूर्ति नहीं कर सकते।
जांच अधिकारी के बयान ने भी बदली तस्वीर
फैसले में हाईकोर्ट ने जांच अधिकारी के बयान को भी महत्वपूर्ण माना।
जांच अधिकारी ने स्वीकार किया था कि भेरूलाल उस स्थान पर मौजूद नहीं था, जहां कथित मादक पदार्थ बरामद हुए थे। उसके कब्जे से भी कोई मादक पदार्थ बरामद नहीं हुआ था।
इसके अलावा जांच अधिकारी ने यह भी स्वीकार किया कि रमेश्वर और कालू के बयानों के अलावा भेरूलाल को कथित मादक पदार्थ गतिविधि से जोड़ने वाला कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं था।
यह भी सामने आया कि प्रारंभिक सूचना में भेरूलाल का नाम नहीं था और धारा 57 के तहत दी गई सूचना में भी उसके खिलाफ संबंधित मूल अपराध में कोई विशिष्ट भूमिका नहीं बताई गई थी।
₹68,500 की बरामदगी भी नहीं बनी पर्याप्त आधार
कोर्ट ने ₹68,500 की नकदी को भी अलग से परखा। अदालत ने कहा कि नकदी का कब्जा अपने आप में ऐसा तथ्य नहीं है, जिससे एनडीपीएस अधिनियम की धारा 29 के तहत उकसावे या आपराधिक षड्यंत्र का निष्कर्ष निकाला जा सके।
कोर्ट ने पाया कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई स्वतंत्र साक्ष्य नहीं था जिससे यह साबित हो कि यह रकम मादक पदार्थों की तस्करी से प्राप्त हुई थी, मादक पदार्थ खरीदने या परिवहन के लिए थी, किसी साझा मादक पदार्थ कारोबार में लगाई जानी थी या एनडीपीएस अधिनियम के मूल अपराध से किसी अन्य तरीके से जुड़ी थी।
अदालत ने यह भी कहा कि आपराधिक षड्यंत्र का निष्कर्ष केवल एक ऐसी परिकल्पना के आधार पर नहीं निकाला जा सकता, जो स्वयं दूसरी परिकल्पना पर आधारित हो। किसी परिस्थिति को अपराध के वैधानिक तत्वों से जोड़ने वाली ठोस तथ्यात्मक कड़ी होना आवश्यक है और इस मामले में वह कड़ी रिकॉर्ड पर दिखाई नहीं देती।
आरोप तय करने के चरण में भी अदालत की भूमिका महत्वपूर्ण
हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि आरोप तय करने के चरण में अदालत को मुकदमे की तरह साक्ष्यों का अंतिम मूल्यांकन नहीं करना होता।
अभियोजन को इस स्तर पर अपना मामला संदेह से परे साबित करने की आवश्यकता भी नहीं होती।
लेकिन इसका यह अर्थ भी नहीं है कि केवल किसी आरोप या संभावना के आधार पर व्यक्ति को मुकदमे का सामना करने के लिए भेज दिया जाए।
अदालत सीमित उद्देश्य से रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री को परख सकती है और यह देख सकती है कि क्या प्रथमदृष्टया मामला या गंभीर संदेह पैदा करने वाली कानूनी रूप से स्वीकार्य सामग्री मौजूद है।
हाईकोर्ट ने क्यों रद्द किया आरोप?
जस्टिस फरजंद अली की एकलीपीठ ने पूरे मामले को सामूहिक रूप से देखते हुए पाया कि प्रारंभिक सूचना में भेरूलाल का नाम नहीं था, वह बरामदगी के स्थान पर मौजूद नहीं था, उसके कब्जे से कोई मादक पदार्थ नहीं मिला, उसके खिलाफ कोई विशिष्ट प्रत्यक्ष कार्य नहीं बताया गया, कथित ‘सहयोग’ की प्रकृति स्पष्ट नहीं थी और उसके खिलाफ मुख्य सामग्री धारा 67 के तहत दर्ज बयानों पर आधारित थी।
इसके अलावा ₹68,500 की नकदी को भी स्वतंत्र और कानूनी रूप से टिकाऊ आधार के अभाव में एनडीपीएस अपराध की साजिश या उकसावे से जोड़ना संभव नहीं था।
हाईकोर्ट का अंतिम आदेश
अदालत ने कहा कि उपलब्ध सामग्री को उसके उच्चतम स्तर पर स्वीकार करने के बावजूद यह मानने के लिए पर्याप्त आधार नहीं है कि भेरूलाल ने एनडीपीएस अधिनियम के मूल अपराध को उकसाया या उसके लिए आपराधिक षड्यंत्र का हिस्सा बना।
इसी आधार पर हाईकोर्ट ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका स्वीकार कर ली और 6 दिसंबर 2023 को विशेष न्यायाधीश, एनडीपीएस प्रकरण संख्या-1, चित्तौड़गढ़ द्वारा पारित आरोप तय करने का आदेश भेरूलाल के संबंध में निरस्त कर दिया।
भेरूलाल को एनडीपीएस अधिनियम की धारा 8/29 के अपराध से डिस्चार्ज कर दिया गया।
अदालत ने विशेष रूप से स्पष्ट किया कि इस फैसले में की गई टिप्पणियां केवल भेरूलाल तक सीमित हैं और अन्य आरोपियों के खिलाफ चल रही कार्यवाही उनके अपने तथ्यों और गुण-दोष के आधार पर ट्रायल कोर्ट द्वारा तय की जाएगी।