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पत्नी और बुजुर्ग माता-पिता से मिलने में परेशानी पर राजस्थान हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, भरतपुर से भीलवाड़ा जेल शिफ्ट होगा विचाराधीन कैदी

Rajasthan High Court Upholds Recovery of ₹2.20 Lakh Maintenance Arrears, Explains 12-Month Limitation Rule

हाईकोर्ट ने कहा-कैदी को पसंद की जेल में रहने का अधिकार नहीं, लेकिन मानवीय गरिमा और परिवार की परेशानी को भी नहीं किया जा सकता नजरअंदाज; दो सप्ताह में ट्रांसफर के आदेश

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने विचाराधीन कैदी की पारिवारिक परिस्थितियों और पत्नी व बुजुर्ग माता-पिता को उससे मिलने में हो रही परेशानी को ध्यान में रखते हुए अहम आदेश पारित किया है।

हाईकोर्ट ने विचाराधीन कैदी ईश्वर सिंह को भरतपुर सेंट्रल जेल से भीलवाड़ा जिला जेल में ट्रांसफर करने के आदेश0 दिए हैं।

हाईकोर्ट ने जेल अधिकारियों को आदेश की प्रमाणित प्रति प्राप्त होने के दो सप्ताह के भीतर ट्रांसफर की प्रक्रिया पूरी करने को कहा है।

जस्टिस फरजंद अली की एकलपीठ ने मामले में स्पष्ट किया कि किसी कैदी को अपनी पसंद की जेल में रहने का अधिकार नहीं है। जेल प्रशासन के लिए सुरक्षा, अनुशासन और व्यवस्था बनाए रखना महत्वपूर्ण है।

हालांकि, न्यायिक हिरासत में होने के बावजूद किसी व्यक्ति की मानवीय गरिमा और उसके परिवार को होने वाली वास्तविक परेशानी की अनदेखी नहीं की जा सकती।

याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता जयकिशन हानिया ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से डिप्टी गवर्नमेंट एडवोकेट नरेंद्र गहलोत ने पक्ष रखा।

पत्नी और बुजुर्ग माता-पिता से मिलने में हो रही थी परेशानी

ईश्वर सिंह उर्फ हरिओम सिंह चित्तौड़गढ़ जिले के गंगरार थाना क्षेत्र निवासी हैं। उसकी पत्नी और बुजुर्ग माता-पिता भी चित्तौड़गढ़ जिले में रहते हैं।

कैदी की ओर से हाईकोर्ट में बताया गया कि भरतपुर सेंट्रल जेल में रखे जाने के कारण परिवार के लिए उनसे मिलने जाना मुश्किल हो रहा है।

दोनों जगहों के बीच काफी दूरी होने से परिजन नियमित रूप से उनसे मुलाकात नहीं कर पा रहे हैं।

याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि परिवार से दूर रहने के कारण लंबित ट्रायल की तैयारी और अपने वकील से जरूरी सलाह लेने में परेशानी आती है।

चितौड़गढ जेल से भेजा गया था भरतपुर जेल

ईश्वर सिंह को पहले चित्तौड़गढ़ जिला जेल में रखा गया था, लेकिन बाद में उन्हें भरतपुर सेंट्रल जेल ट्रांसफर कर दिया गया। इसके बाद उन्होंने अपने गृह जिले के नजदीक जेल में शिफ्ट करने की मांग की।

इसके लिए चित्तौड़गढ़ के अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश संख्या-2 की कोर्ट में आवेदन किया, लेकिन 24 सितंबर 2026 को इसे खारिज कर दिया गया।

इसके बाद ईश्वर सिंह ने राजस्थान हाईकोर्ट में क्रिमिनल रिवीजन याचिका दायर कर निचली कोर्ट के इस आदेश को चुनौती दी।

सरकार ने जेल में मोबाइल मिलने और वीडियो बनाने के आरोपों का दिया हवाला

राज्य सरकार ने ईश्वर सिंह को दूसरी जेल में शिफ्ट करने की मांग का विरोध किया। सरकार की ओर से जेल अधीक्षक की रिपोर्ट का हवाला देते हुए बताया गया कि चित्तौड़गढ़ जेल में जांच के दौरान उनकी सेल से मोबाइल फोन, बैटरी, सिम कार्ड और चार्जिंग केबल बरामद हुए थे।

सरकार ने यह भी बताया कि दूसरे कैदियों के वीडियो बनाकर सोशल मीडिया पर प्रसारित करने के आरोप में चित्तौड़गढ़ के कोतवाली थाने में FIR नंबर 321/2026 दर्ज की गई थी।

राज्य सरकार ने यह भी कहा कि कैदी को पहले जेल नियमों के उल्लंघन के लिए दंडित किया जा चुका है। उसके आचरण को देखते हुए जेल प्रशासन ने अनुशासन और सुरक्षा को लेकर चिंता जताई थी। सरकार के अनुसार, इन्हीं कारणों से उसे चित्तौड़गढ़ से भरतपुर जेल भेजा गया था।

हाईकोर्ट ने कहा- कैदी को अपनी पसंद की जेल चुनने का अधिकार नहीं

जस्टिस फरजंद अली ने कहा कि किसी कैदी को अपनी पसंद की जेल में रखे जाने का असीमित अधिकार नहीं है।

उसे किस जेल में रखा जाएगा, यह मुख्य रूप से जेल प्रशासन के अधिकार क्षेत्र का विषय है। इस फैसले में जेल की सुरक्षा, अनुशासन और व्यवस्थित संचालन को प्राथमिकता दी जाती है।

हाईकोर्ट ने कहा कि जेल अधीक्षक की रिपोर्ट में प्रतिबंधित सामान मिलने और पहले अनुशासनात्मक कार्रवाई होने से जुड़ी बातों को हल्के में नहीं लिया जा सकता। सक्षम अधिकारी कैदी को कहां रखा जाए, यह तय करते समय इन तथ्यों पर विचार कर सकते हैं।

‘परिवार की परेशानी और मानवीय गरिमा को भी नजरअंदाज नहीं कर सकते’

हाईकोर्ट ने साथ ही कहा कि जेल प्रशासन के अधिकारों का इस्तेमाल करते समय संबंधित मामले की खास परिस्थितियों पर भी विचार किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि जेल में बंदी को कहां रखा जाए, यह तय करते समय उसकी सुरक्षा के साथ परिवार की परेशानी को भी देखना चाहिए। जेल में होने का मतलब यह नहीं है कि उसकी और उसके परिवार की मुश्किलों को नजरअंदाज कर दिया जाए।

हाईकोर्ट ने गौर किया कि भरतपुर और चित्तौड़गढ़ के बीच काफी दूरी है। ऐसे में ईश्वर सिंह की पत्नी और बुजुर्ग माता-पिता के लिए नियमित रूप से उनसे मिलने जाना मुश्किल हो रहा है। इस दूरी का असर मुकदमे के बचाव की तैयारी और वकील से जरूरी सलाह लेने पर भी पड़ सकता है।

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि परिवार की सुविधा जेल की सुरक्षा से ऊपर नहीं हो सकती। हालांकि, यदि परिस्थितियों के अनुसार कोई उपयुक्त वैकल्पिक जेल उपलब्ध हो, तो सुरक्षा की जरूरतों और परिवार को हो रही परेशानी के बीच संतुलन बनाकर विचार किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने भीलवाड़ा जेल को माना उपयुक्त विकल्प

सभी परिस्थितियों और दोनों पक्षों की दलीलों पर विचार करने के बाद हाईकोर्ट ने माना कि ईश्वर सिंह को भरतपुर सेंट्रल जेल में ही रखना जरूरी नहीं है, जबकि उन्हें किसी दूसरी उपयुक्त जेल में शिफ्ट किया जा सकता है।

हाईकोर्ट ने कहा कि चित्तौड़गढ़ और भरतपुर के बीच काफी दूरी होने से उनकी पत्नी और बुजुर्ग माता-पिता के लिए उनसे मिलने जाना मुश्किल हो रहा है। इस दूरी का असर मुकदमे की तैयारी और वकील से जरूरी सलाह लेने पर भी पड़ सकता है।

ऐसे में कोर्ट ने उन्हें भीलवाड़ा जिला जेल में शिफ्ट करने का आदेश दिया, ताकि परिवार को होने वाली परेशानी कम हो सके। साथ ही, जेल प्रशासन को सुरक्षा और अनुशासन बनाए रखने के लिए जरूरी इंतजाम करने की छूट भी दी।

ट्रांसफर के आदेश का लंबित ट्रायल पर असर नहीं होगा

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसने ईश्वर सिंह पर लगे आरोपों की सच्चाई या लंबित ट्रायल के गुण-दोष पर कोई राय नहीं दी है। जेल अनुशासन और सुरक्षा से जुड़ी चिंताओं को भी नजरअंदाज नहीं किया गया है।

ट्रांसफर लागू नियमों और जरूरी सुरक्षा व्यवस्था के तहत किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी साफ किया कि यह आदेश केवल बंदी को किस जेल में रखा जाए, इस सवाल तक सीमित है और इसका लंबित मुकदमे या अन्य आपराधिक कार्यवाही पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

यह फैसला मामले की खास परिस्थितियों को देखते हुए दिया गया है। केवल परिवार की सुविधा के आधार पर हर विचाराधीन कैदी को जेल बदलने का अधिकार नहीं मिल जाता।

2 सप्ताह में ट्रांसफर की कार्रवाई के निर्देश

हाईकोर्ट ने जेल अधिकारियों को आदेश की प्रमाणित कॉपी मिलने के 2 सप्ताह के भीतर ईश्वर सिंह को भरतपुर सेंट्रल जेल से भीलवाड़ा जिला जेल में ट्रांसफर करने के लिए जरूरी कदम उठाने को कहा है।

हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि इस दौरान लागू नियमों और सुरक्षा इंतजामों का पालन किया जाए। साथ ही, आदेश से जेल प्रशासन के कानून के मुताबिक अनुशासन और सुरक्षा से जुड़ी कार्रवाई करने के अधिकार प्रभावित नहीं होंगे।

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