जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने इनकम टैक्स के एक मामले में जेपी कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड को राहत देते हुए करीब 6.93 करोड़ रुपये की टैक्स एडिशन वाले असेसमेंट ऑर्डर को रद्द कर दिया है।
हाईकोर्ट ने कहा कि टैक्स विभाग को किसी कंपनी पर करोड़ों रुपये की अतिरिक्त टैक्स देनदारी तय करने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित मौका देना जरूरी होता है।
इस मामले में कोर्ट ने माना कि कंपनी को अपना जवाब देने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया गया। इसके अलावा, ई-फाइलिंग पोर्टल पर जवाब अपलोड करने में आई दिक्कत के बाद कंपनी ने ई-मेल और अन्य माध्यम से अपना जवाब और दस्तावेज भेजे, लेकिन विभाग ने उन पर विचार नहीं किया।
चीफ जस्टिस संजय के. अग्रवाल और जस्टिस बलजिंदर सिंह संधू की बेंच ने जेपी कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर फैसला दिया और 21 मार्च 2024 के असेसमेंट ऑर्डर को रद्द कर मामले को दोबारा असेसमेंट अथॉरिटी के पास भेज दिया।
अब अथॉरिटी को कंपनी को उचित समय देकर उसके जवाब और दस्तावेजों पर विचार करने के बाद नया ऑर्डर जारी करना होगा।
3 दिन से भी कम समय में ₹7 करोड़ से ज्यादा के एडिशन पर जवाब मांगा
मामला मामला बीकानेर जिले के नोखा की जेपी कंस्ट्रक्शन प्राइवेट लिमिटेड के इनकम टैक्स असेसमेंट से जुड़ा है। कंपनी के खिलाफ नेशनल फेसलेस असेसमेंट सेंटर ने 21 मार्च 2024 को असेसमेंट ऑर्डर पास किया था।
इससे पहले 11 मार्च 2024 को कंपनी को एक नोटिस जारी किया गया था। इसमें टैक्स में बड़ी रकम जोड़ने का प्रस्ताव रखा गया था।
कंपनी को इस नोटिस का जवाब देने के लिए 14 मार्च 2024 सुबह 10 बजे तक का समय दिया गया था। यानी नोटिस जारी होने के बाद जवाब देने के लिए तीन दिन से भी कम समय मिला।
जबकि संबंधित स्टैंडिंग ऑर्डर के मुताबिक ऐसे मामले में जवाब देने के लिए कम से कम एक सप्ताह का समय दिया जाना चाहिए।
हाईकोर्ट ने माना कि 7 करोड़ रुपये से ज्यादा की राशि जोड़ने जैसे गंभीर टैक्स मामले में इतना कम समय कंपनी को अपना पक्ष रखने के लिए पर्याप्त नहीं था।
जवाब देने की कोशिश की, लेकिन पोर्टल पर दिक्कत आई
कंपनी का कहना था कि उसने अपना जवाब तैयार कर लिया था और समय पर उसे इनकम टैक्स विभाग के ई-फाइलिंग पोर्टल पर जमा करने की कोशिश की। लेकिन पोर्टल पर ‘जवाब जमा करें’ वाला विकल्प काम नहीं कर रहा था।
इसके बाद कंपनी के अधिकृत प्रतिनिधि ने 14 मार्च को विभाग के हेल्पडेस्क पर शिकायत दर्ज कराई। कंपनी ने उसी दिन शाम को ई-मेल के जरिए अपना विस्तृत जवाब और जरूरी दस्तावेज भी भेज दिए।
इसके अगले दिन 15 मार्च को नेशनल फेसलेस असेसमेंट सेंटर ने कंपनी को ई-मेल भेजकर बताया कि उसके भेजे गए जवाब और दस्तावेज संबंधित असेसमेंट यूनिट को आगे भेज दिए गए हैं।
कंपनी ने उसी दिन अपने स्थानीय असेसिंग ऑफिसर के पास जवाब की हार्ड कॉपी भी जमा कर दी और उसे ई-फाइलिंग पोर्टल पर अपलोड करने का अनुरोध किया।
फिर भी विभाग ने कहा- कंपनी ने जवाब नहीं दिया
इसके बावजूद 21 मार्च 2024 को असेसमेंट यूनिट ने कंपनी के खिलाफ ऑर्डर जारी कर दिया। इसमें कहा गया कि कंपनी ने 11 मार्च के नोटिस का पालन नहीं किया और कोई जवाब दाखिल नहीं किया।
हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद पाया कि कंपनी ने वास्तव में अपना जवाब भेजा था। ई-मेल के जरिए भेजा गया जवाब और दस्तावेज विभाग को मिल चुके थे, लेकिन ऑर्डर जारी करते समय इन पर विचार नहीं किया गया।
हाईकोर्ट ने कहा- अपना पक्ष रखने का उचित मौका मिलना जरूरी
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी कंपनी के खिलाफ कोई फैसला लेने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का उचित मौका मिलना चाहिए।
इस मामले में कंपनी को जवाब देने के लिए तीन दिन से भी कम समय मिला। इसके अलावा, ई-फाइलिंग पोर्टल पर जवाब जमा करने में भी उसे परेशानी हुई।
हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि किसी के खिलाफ फैसला लेने से पहले उसे अपना पक्ष रखने का पर्याप्त मौका देना जरूरी है। अगर ऐसा मौका नहीं दिया जाता है तो उस आधार पर जारी किया गया ऑर्डर कानूनी तौर पर सही नहीं हो सकता।
पुराना ऑर्डर रद्द, अब दोबारा होगा असेसमेंट
हाईकोर्ट ने 21 मार्च 2024 का असेसमेंट ऑर्डर रद्द कर दिया और मामले को संबंधित असेसमेंट अथॉरिटी के पास वापस भेज दिया।
हाईकोर्ट ने कहा कि कंपनी को अपना पक्ष रखने का उचित मौका दिया जाए और उसके पहले से जमा जवाब व दस्तावेजों पर विचार करने के बाद कानून के मुताबिक नया ऑर्डर जारी किया जाए।
हालांकि, हाईकोर्ट ने यह नहीं कहा कि कंपनी पर लगाई गई 6.93 करोड़ रुपये की राशि गलत है या कंपनी को यह रकम नहीं देनी होगी।
हाईकोर्ट ने सिर्फ इतना माना कि पिछला असेसमेंट ऑर्डर कंपनी को अपना पक्ष रखने का उचित मौका दिए बिना जारी किया गया था। टैक्स विवाद के असली मुद्दे पर हाईकोर्ट ने कोई राय नहीं दी है।