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‘कर्मचारी को सजा देने से पहले सुनवाई का मौका देना जरूरी’, हाईकोर्ट ने कांस्टेबल की सजा और अपील-रिव्यू के आदेश किए रद्द, कहा- जांच रिपोर्ट से असहमति के कारण बताना जरूरी

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जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने चोरी के मामले में विभागीय कार्रवाई का सामना करने वाले रेलवे पुलिस के एक कांस्टेबल को बड़ी राहत दी है।

हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए कांस्टेबल नरपत सिंह के वेतनमान को न्यूनतम स्तर पर करने का 2004 का आदेश रद्द कर दिया है। कोर्ट ने अपील और रिव्यू खारिज करने वाले आदेशों को भी निरस्त कर दिया।

हाईकोर्ट ने पाया कि विभागीय जांच में जांच अधिकारी ने चोरी से जुड़े आरोप साबित नहीं माने थे, लेकिन अनुशासनात्मक अधिकारी ने असहमति के कारण बताए बिना कर्मचारी को सजा दे दी। कोर्ट ने इसे नियमों के तहत तय प्रक्रिया का उल्लंघन माना।

जस्टिस आनंद शर्मा ने नरपत सिंह की याचिका स्वीकार करते हुए विभाग को उन्हें फैसले के अनुसार सभी लाभ देने के निर्देश दिए हैं। कोर्ट ने आदेश की कॉपी मिलने के 60 दिन के भीतर इसकी पालना करने को कहा है।

याचिकाकर्ता नरपत सिंह की ओर से अधिवक्ता एम.एफ. बैग ने पैरवी की, जबकि राज्य सरकार की ओर से डिप्टी गवर्नमेंट काउंसिल सोमित्र चतुर्वेदी ने पक्ष रखा।

चोरी के आरोप में दर्ज हुई थी FIR

मामला रेलवे पुलिस, अजमेर में कांस्टेबल रहे नरपत सिंह से जुड़ा है। वर्ष 2000 में चोरी की एक घटना को लेकर पुलिस ने FIR दर्ज की थी।

नरपत सिंह को भी इस मामले में गिरफ्तार किया गया और जांच के बाद उनके खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 380 और 457 के तहत चार्जशीट पेश की गई।

गिरफ्तारी के बाद शुरू हुई विभागीय कार्रवाई

आपराधिक मुकदमा चलने के दौरान पुलिस विभाग ने नरपत सिंह के खिलाफ अलग से विभागीय जांच शुरू कर दी। इसमें कुल 5 आरोप लगाए गए थे।

इनमें चोरी, चोरी के सामान की बरामदगी, आपराधिक मुकदमा दर्ज होने से पुलिस विभाग की छवि खराब होने और ड्यूटी से गैरहाजिर रहने के आरोप शामिल थे।

जांच अधिकारी ने चोरी के आरोप साबित नहीं माने थे

विभागीय जांच पूरी होने के बाद 8 नवंबर 2001 को जांच रिपोर्ट पेश की गई। जिनमें जांच अधिकारी ने चोरी, सामान की बरामदगी और आपराधिक मामले से जुड़े पहले तीन आरोप साबित नहीं माने।

वहीं ड्यूटी से गैरहाजिर रहने के आरोप में भी अधिकारी ने माना कि 15 अक्टूबर 2000 को नरपत सिंह की गैरहाजिरी मर्जी से नहीं थी, क्योंकि उस दिन उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। हालांकि, 14 अक्टूबर को ड्यूटी पर अनुपस्थित रहने का आरोप साबित माना गया।

हालांकि पुलिस विभाग की छवि खराब करने से जुड़े आरोप पर जांच अधिकारी ने कहा कि इस पहलू का निष्कर्ष आपराधिक मामले के फैसले के बाद निकाला जाना चाहिए।

यानी जांच रिपोर्ट में चोरी के आरोपों को साबित नहीं माना गया था, लेकिन विभाग ने इसके बाद भी कर्मचारी के खिलाफ सजा का आदेश जारी कर दिया।

कार्रवाई करके वेतनमान घटाया, अपील और रिव्यू भी खारिज

विभागीय जांच के बाद 26 जून 2004 को अनुशासनात्मक अधिकारी ने नरपत सिंह का वेतनमान घटाकर उस वेतनमान के न्यूनतम स्तर पर कर दिया।

नरपत सिंह ने इस फैसले के खिलाफ अपील की, लेकिन 17 दिसंबर 2012 को उनकी अपील खारिज कर दी गई। इसके बाद रिव्यू याचिका भी 22 सितंबर 2015 को खारिज हो गई। नरपत सिंह ने इन आदेशों को हाईकोर्ट में चुनौती दी।

उनकी दलील थी कि जांच अधिकारी ने उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर चोरी से जुड़े आरोप साबित नहीं माने थे। इसके बावजूद अनुशासनात्मक अधिकारी ने जांच रिपोर्ट से अलग जाकर सजा दी, लेकिन यह नहीं बताया कि वह जांच अधिकारी के निष्कर्षों से क्यों असहमत हैं।

‘सजा देने से पहले कर्मचारी को जवाब का मौका देना जरूरी’

हाईकोर्ट ने रिकॉर्ड देखने के बाद कहा कि अगर अनुशासनात्मक अधिकारी जांच अधिकारी की रिपोर्ट से सहमत नहीं था, तो उसे अपनी असहमति के कारण स्पष्ट करने चाहिए थे।

साथ ही, नरपत सिंह को इन कारणों पर जवाब देने का मौका भी देना जरूरी था। लेकिन ऐसा नहीं किया गया, इसलिए कोर्ट ने इसे नियमों का उल्लंघन माना।

हाईकोर्ट ने विभागीय कार्रवाई पर भी उठाए सवाल

नरपत सिंह को 12 जुलाई 2012 को आपराधिक मामले में भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 380 और 457 के आरोपों से बरी कर दिया गया था। विभागीय जांच में भी आरोप इसी घटना से जुड़े थे।

हाईकोर्ट ने यह भी पाया कि अपील और रिव्यू अधिकारियों ने मामले पर ठीक से विचार नहीं किया। उनके आदेशों में फैसले के पीछे पर्याप्त कारण नहीं बताए गए थे। कोर्ट ने इन कमियों को भी ध्यान में रखा।

हाईकोर्ट ने कहा- असहमति के कारण बताना जरूरी था

नरपत सिंह की ओर से दलील दी गई कि जब जांच अधिकारी ने चोरी से जुड़े अधिकांश आरोप साबित नहीं माने थे, तो अनुशासनात्मक अधिकारी को सजा देने से पहले अपनी असहमति के कारण बताने चाहिए थे। नियमों के मुताबिक, कर्मचारी को इन कारणों की जानकारी देना और अपना पक्ष रखने का मौका देना जरूरी था।

रिकॉर्ड देखने के बाद हाईकोर्ट ने पाया कि अनुशासनात्मक अधिकारी ने जांच रिपोर्ट के निष्कर्षों से असहमति के बिंदु स्पष्ट नहीं किए और न ही नरपत सिंह को इस बारे में बताया। कोर्ट ने कहा कि राजस्थान सिविल सेवा (CCA) नियम, 1958 के नियम 16(10-A) के तहत ऐसा करना जरूरी था।

हाईकोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी की रिपोर्ट से असहमत होने पर अनुशासनात्मक अधिकारी को पहले अपने कारण बताने चाहिए थे। साथ ही, नरपत सिंह को उन कारणों पर जवाब देने का मौका देना भी जरूरी था। लेकिन इस मामले में तय प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया।

तीनों आदेश रद्द, 60 दिन में देना होगा लाभ

इन आधारों पर हाईकोर्ट ने नरपत सिंह की याचिका स्वीकार कर ली। कोर्ट ने 26 जून 2004 के सजा आदेश, 17 दिसंबर 2012 के अपील आदेश और 22 सितंबर 2015 के रिव्यू आदेश को रद्द कर दिया।

हाईकोर्ट ने विभाग को निर्देश दिया कि नरपत सिंह को फैसले के अनुसार मिलने वाले सभी लाभ दिए जाएं। इसके लिए आदेश की प्रमाणित प्रति मिलने के 60 दिनों के भीतर जरूरी कार्रवाई करनी होगी।

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