जयपुर बेंच का रिपोर्टेबल फैसला, कहा– विभागीय कार्रवाई को वर्षों तक लंबित रखकर अचानक पुनः प्रारंभ करना अवैध है, विशेषकर जब देरी का कोई ठोस कारण न बताया गया हो।
जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट जयपुर पीठ ने एक महत्वपूर्ण और रिपोर्टेबल फैसले में 11 वर्ष बाद शुरू की गई विभागीय ‘डी-नोवो जांच’ को अवैध ठहराते हुए निरस्त कर दिया।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट कहा है कि जब सिविल न्यायालय का निर्णय अंतिम रूप से पारित हो चुका हो और उसमें नई जांच शुरू करने की कोई अनुमति न दी गई हो, तो विभाग द्वारा वर्षों बाद उन्हीं आरोपों पर दोबारा जांच प्रारंभ करना कानून सम्मत नहीं है।
जस्टिस प्रवीर भटनागर की एकलपीठ ने याचिकाकर्ता कर्मचारी कल्याण प्रसाद की ओर से दायर याचिका पर निर्णय दिया है।
39 वर्ष पुराना मामला
याचिकाकर्ता कल्याण प्रसाद, जो राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (रोडवेज) के चूरू डिपो में परिचालक के पद पर कार्यरत थे, को 26 मार्च 1987 को विभागीय आरोपों के आधार पर सेवा से बर्खास्त कर दिया गया था।
इस बर्खास्तगी को उन्होंने सिविल न्यायालय में चुनौती दी। अतिरिक्त मुंसिफ एवं न्यायिक मजिस्ट्रेट संख्या-2, जयपुर शहर ने 14 मार्च 1991 को उनके पक्ष में निर्णय देते हुए बर्खास्तगी आदेश को निरस्त कर पुनः सेवा में बहाली के निर्देश दिए।
निगम ने इस निर्णय के विरुद्ध अपील दायर की, लेकिन 16 मई 1996 को वह अपील भी खारिज कर दी गई। इस प्रकार सिविल न्यायालय का आदेश अंतिम रूप से प्रभावी हो गया।
11 साल बाद फिर से जांच क्यों?
सभी न्यायिक आदेश अंतिम होने के बाद, वर्ष 2003 में 24 नवंबर को निगम ने एक कार्यालय आदेश जारी कर उन्हीं पुराने आरोपों पर ‘डी-नोवो जांच’ शुरू करने के निर्देश दे दिए।
महत्वपूर्ण तथ्य यह था कि न तो मूल निर्णय में और न ही अपीलीय आदेश में यह निर्देश दिया गया था कि विभाग चाहे तो नई विभागीय जांच शुरू कर सकता है।
बिना किसी आधार के 24.11.2003 को जारी आदेश को याचिकाकर्ता ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
याचिका में दलील
याचिकाकर्ता का कहना था कि 1987 के आरोपों पर 11 वर्ष बाद पुनः जांच प्रारंभ करना न केवल विधि के विरुद्ध है, बल्कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी उल्लंघन है।
याचिकाकर्ता के अधिवक्ता ने दलील दी कि जब सिविल न्यायालय ने बर्खास्तगी को रद्द कर दिया और अपील भी खारिज हो गई, तो विभाग को पुनः वही आरोप जीवित करने का कोई अधिकार नहीं बचता। इतने लंबे अंतराल के बाद जांच शुरू करना कर्मचारी के साथ अन्याय है।
निगम की दलील
निगम की ओर से यह तर्क रखा गया कि सिविल न्यायालय ने बर्खास्तगी आदेश को प्रक्रियात्मक आधार पर निरस्त किया था, न कि आरोपों के गुण-दोष (मेरिट) पर। इसलिए विभाग को यह अधिकार है कि वह नियमों के अनुसार पुनः जांच कर सकता है।
निगम के अधिवक्ता ने अदालत से आग्रह किया कि डी-नोवो जांच का आदेश विधिसम्मत है और रिट याचिका को खारिज किया जाए।
हाईकोर्ट का फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने पाया कि याचिकाकर्ता को 26.03.1987 को बर्खास्त किया गया था और सिविल न्यायालय ने 14.03.1991 को बर्खास्तगी रद्द कर दी। यानी 16.05.1996 को अपील भी खारिज हो गई और निर्णय अंतिम हो गया।
हाईकोर्ट ने कहा कि किसी भी न्यायालय ने विभाग को नई जांच प्रारंभ करने की अनुमति नहीं दी थी।
इसके बावजूद 11 वर्ष बाद उन्हीं आरोपों पर पुनः जांच का आदेश जारी कर दिया गया।
हाईकोर्ट ने घनश्याम शर्मा बनाम राजस्थान राज्य पथ परिवहन निगम (RLW 2009 (2) Raj 1078) फैसले का हवाला देते हुए कहा कि पुनर्बहाली के बाद विभागीय कार्रवाई को वर्षों तक लंबित रखकर अचानक पुनः प्रारंभ करना अवैध है, विशेषकर जब देरी का कोई ठोस कारण न बताया गया हो।
देरी पर अदालत की सख्त राय
हाईकोर्ट ने स्पष्ट कहा कि 6 वर्ष से अधिक की अकारण देरी को भी अदालतों ने अवैध ठहराया है। ऐसे में 11 वर्ष बाद जांच शुरू करना और भी गंभीर मामला है।
कोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड में ऐसा कोई तथ्य नहीं था, जिससे यह सिद्ध हो सके कि देरी के लिए याचिकाकर्ता जिम्मेदार था।
अदालत ने माना कि जब अपीलीय न्यायालय का आदेश अंतिम हो चुका है और उसमें नई जांच का कोई निर्देश नहीं है, तो विभाग का यह कदम न्यायिक आदेश की अवहेलना के समान है।
अंतिम आदेश
हाईकोर्ट ने कहा कि अपीलीय आदेश अंतिम हो जाने के बाद बिना किसी न्यायिक अनुमति के डी-नोवो जांच प्रारंभ करना विधि सम्मत नहीं है।
हाईकोर्ट ने विभाग द्वारा 24 नवंबर 2003 को जारी किया गया आदेश रद्द करने का फैसला सुनाया है।
