1986 से सरकारी सेवा में कार्यरत पशु चिकित्सा सहायक की बर्खास्तगी का आदेश हाईकोर्ट ने किया रद्द, 50 प्रतिशत पिछला वेतन देने के आदेश
जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसले में स्पष्ट किया है कि किसी सरकारी कर्मचारी की आपराधिक मामले में दोषसिद्धि होने मात्र से उसे स्वतः सरकारी सेवा से बर्खास्त नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने कहा कि राजस्थान सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम, 1958 के नियम 19 के तहत विभागीय जांच से छूट हो सकती है, लेकिन सक्षम प्राधिकारी को दोषसिद्धि के आधारभूत आचरण, अपराध की प्रकृति एवं गंभीरता तथा मामले की परिस्थितियों पर स्वतंत्र रूप से विचार करके ही यह तय करना होगा कि कौन-सा दंड उचित है।
कोर्ट ने कहा कि आपराधिक मामले में दोषसिद्धि अपने आप बर्खास्तगी, सेवा से हटाने या पदावनति का परिणाम नहीं बनती।
राजस्थान हाईकोर्ट ने यह सिद्धांत स्पष्ट किया कि आपराधिक मामले में सरकारी कर्मचारी की दोषसिद्धि होने पर विभाग नियम 19 के तहत नियमित विभागीय जांच के बिना कार्रवाई कर सकता है, लेकिन सक्षम प्राधिकारी को दोषसिद्धि के आधार पर सीधे अधिकतम दंड नहीं देना चाहिए।
दंड तय करते समय मामले की परिस्थितियों, अपराध की प्रकृति एवं गंभीरता, संबंधित आचरण और सेवा से उसके संबंध सहित प्रासंगिक तथ्यों पर स्वतंत्र, निष्पक्ष और कारणयुक्त विचार करना अनिवार्य है।
जस्टिस कुलदीप माथुर ने दलवीर सिंह राजावत की ओर से दायर याचिका को स्वीकार करते हुए पशुपालन विभाग के निदेशक द्वारा 4 जुलाई 2023 को पारित बर्खास्तगी आदेश को रद्द कर दिया हैं।
हालांकि कोर्ट ने पिछला वेतन पूरी तरह देने के बजाय 50 प्रतिशत बैक वेज तक सीमित किया है।
कोर्ट ने राज्य सरकार को मामले पर कानून के अनुसार नए सिरे से विचार करने की स्वतंत्रता भी दी है।
1986 में हुई थी सरकारी सेवा में नियुक्ति
याचिकाकर्ता दलवीर सिंह राजावत को 27 अक्टूबर 1986 को राजस्थान पशुपालन विभाग में पशुधन सहायक के पद पर नियुक्त किया गया था।
प्रशिक्षण के बाद उन्होंने विभाग के विभिन्न स्थानों पर सेवाएं दीं और बाद में पदोन्नति प्राप्त कर पशु चिकित्सा सहायक के रूप में कार्यरत थे।
वर्ष 2020 में उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज होने के बाद उन्हें 7 अक्टूबर 2020 को Awaiting Posting Order (APO) पर रखा गया और जयपुर स्थित पशुपालन निदेशालय में कार्यभार ग्रहण करने के निर्देश दिए गए।
इसके बाद उन्हें सिरोही जिले के भूतगांव स्थित पशु चिकित्सालय में पदस्थापित किया गया।
बाद में उनका स्थानांतरण दौसा जिले के लवाण स्थित पशु चिकित्सालय में कर दिया गया।
विशेष अदालत ने किया था दोषसिद्ध
आपराधिक प्रकरण की सुनवाई विशेष न्यायालय, अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम, सिरोही में हुई।
18 नवंबर 2021 को याचिकाकर्ता को भारतीय दंड संहिता की धारा 332/34 और 353/34 तथा अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण अधिनियम की धारा 3(2)(v-a) एवं 3(1)(R)(S) के तहत दोषी ठहराया गया।
इसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने राजस्थान हाईकोर्ट में आपराधिक अपील दायर की।
हाईकोर्ट ने 10 दिसंबर 2021 को उनकी सजा पर रोक लगा दी थी, लेकिन दोषसिद्धि पर रोक नहीं लगाई थी।
इसके बाद पशुपालन विभाग के निदेशक ने राजस्थान सिविल सेवा नियम, 1958 के नियम 19 के तहत 4 जुलाई 2023 को उन्हें तत्काल प्रभाव से सरकारी सेवा से बर्खास्त कर दिया।
आदेश में कहा गया कि जिस आचरण के कारण कर्मचारी को दोषी ठहराया गया है, उसके कारण उसे सरकारी सेवा में बनाए रखना उचित नहीं है।
याचिकाकर्ता की ओर से क्या दलील दी गई?
याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता ने हाईकोर्ट के समक्ष बर्खास्तगी आदेश को चुनौती देते हुए कई महत्वपूर्ण तर्क रखे।
अधिवक्ता ने कहा कि बर्खास्तगी से पहले याचिकाकर्ता को न तो कोई नोटिस दिया गया और न ही सुनवाई का अवसर प्रदान किया गया।
उन्हें कोई आरोप-पत्र भी नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ता की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि बर्खास्तगी आदेश बेहद संक्षिप्त और कारणविहीन आदेश है।
आदेश में केवल आपराधिक मामले में दोषसिद्धि का उल्लेख करते हुए यह कहा गया कि कर्मचारी को सेवा में बनाए रखना उचित नहीं है।
लेकिन सक्षम अधिकारी ने अपराध की प्रकृति, घटना की परिस्थितियों, कथित कृत्य की गंभीरता और बर्खास्तगी जैसे सबसे कठोर दंड की आवश्यकता पर स्वतंत्र रूप से विचार नहीं किया।
याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि केवल दोषसिद्धि अपने आप में हर मामले में बर्खास्तगी का आधार नहीं बन सकती।
सक्षम प्राधिकारी को यह देखना आवश्यक है कि अपराध की प्रकृति क्या थी, किन परिस्थितियों में अपराध हुआ और कर्मचारी के आचरण के अनुरूप कौन-सा दंड उचित होगा।
साथ ही, 1986 से चली आ रही उनकी लंबी सरकारी सेवा को भी ध्यान में रखा जाना चाहिए था।
याचिकाकर्ता की ओर से यह महत्वपूर्ण तर्क भी रखा गया कि जिन अपराधों में उन्हें दोषी ठहराया गया, वे उनके पशु चिकित्सा सहायक के रूप में आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन से संबंधित नहीं थे।
इसलिए दोषसिद्धि को यांत्रिक रूप से सरकारी सेवा के लिए अयोग्यता का आधार नहीं माना जा सकता।
इसके अलावा, अधिवक्ता ने कहा कि बर्खास्तगी आदेश में यह भी नहीं बताया गया कि कथित आचरण में नैतिक अधमता का ऐसा तत्व क्या था, जिसके आधार पर उन्हें सरकारी सेवा से बाहर करना आवश्यक हो गया।
उन्होंने प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का भी हवाला देते हुए कहा कि कर्मचारी को अपनी परिस्थितियां, सेवा रिकॉर्ड और लंबित आपराधिक अपील के संबंध में अपना पक्ष रखने का अवसर मिलना चाहिए था।
राज्य सरकार ने बर्खास्तगी का किया बचाव
राज्य सरकार की ओर से अधिवक्ता रवींद्र जाला, अतिरिक्त महाधिवक्ता एस.एस. लढ़ेचा उपस्थित हुए।
राज्य की ओर से याचिका का विरोध करते हुए कहा गया कि बर्खास्तगी किसी नियमित विभागीय जांच के बाद लगाया गया दंड नहीं था, बल्कि आपराधिक मामले में दोषसिद्धि के बाद नियम 19 के तहत विशेष प्रक्रिया अपनाते हुए की गई कार्रवाई थी।
राज्य की ओर से राजस्थान सरकार के कार्मिक विभाग द्वारा जारी 31 दिसंबर 1996 के परिपत्र का भी हवाला दिया गया।
दलील दी गई कि यदि किसी सरकारी कर्मचारी को ऐसे अपराध में दोषी ठहराया गया है, जिसमें उसे सरकारी सेवा में बनाए रखना प्रथम दृष्टया अवांछनीय हो, तो दोषसिद्धि के बाद तत्काल बर्खास्तगी, सेवा से हटाने या अनिवार्य सेवानिवृत्ति की कार्रवाई की जा सकती है।
राज्य ने यह भी कहा कि नियम 19 के तहत कार्रवाई के लिए नियम 16 में निर्धारित विस्तृत विभागीय जांच आवश्यक नहीं है।
चूंकि आपराधिक अदालत द्वारा दोषसिद्धि हो चुकी थी, इसलिए वही नियम 19 के तहत कार्रवाई का आधार बन सकती थी।
राज्य की ओर से यह भी तर्क दिया गया कि हाईकोर्ट ने आपराधिक अपील में केवल सजा को निलंबित किया था, दोषसिद्धि को नहीं।
इसलिए दोषसिद्धि प्रभावी बनी हुई थी और उस आधार पर नियम 19 के तहत कार्रवाई की जा सकती थी।
राज्य ने बर्खास्तगी आदेश को वैधानिक नियमों एवं विभागीय निर्देशों के अनुरूप बताते हुए याचिका खारिज करने की मांग की।
हाईकोर्ट ने क्या कहा?
जस्टिस कुलदीप माथुर ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद कहा कि इस मामले में मुख्य प्रश्न यह है कि क्या नियम 19 के तहत पारित बर्खास्तगी आदेश उस स्थिति में कायम रह सकता है, जब सक्षम प्राधिकारी ने मामले की परिस्थितियों और सबसे कठोर दंड देने के कारणों पर विचार ही नहीं किया हो।
कोर्ट ने राजस्थान सिविल सेवा नियम, 1958 के नियम 14 का उल्लेख करते हुए कहा कि सरकारी कर्मचारी पर अलग-अलग स्तर के दंड लगाए जा सकते हैं।
इनमें निंदा, वेतनवृद्धि या पदोन्नति रोकना, निम्न पद पर भेजना, अनिवार्य सेवानिवृत्ति, सेवा से हटाना और बर्खास्तगी शामिल हैं।
नियम 14 में यह भी स्पष्ट है कि दंड लगाने के लिए “good and sufficient reasons” दर्ज किए जाने चाहिए।
विभागीय जांच से छूट, लेकिन दंड चुनने की जिम्मेदारी खत्म नहीं
हाईकोर्ट ने राज्य की एक दलील को स्वीकार किया कि नियम 19 के तहत आपराधिक दोषसिद्धि के आधार पर कार्रवाई के मामले में नियम 16 के तहत नियमित विभागीय जांच आवश्यक नहीं है।
लेकिन कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इसका अर्थ यह नहीं है कि दोषसिद्धि होते ही कर्मचारी को स्वतः बर्खास्त कर दिया जाए।
कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के संविधान पीठ के निर्णय Union of India v. Tulsiram Patel का हवाला देते हुए कहा कि आपराधिक दोषसिद्धि के बाद सक्षम प्राधिकारी को यह विचार करना होता है कि कर्मचारी का वह आचरण, जिसके कारण दोषसिद्धि हुई, किस दंड को उचित बनाता है।
नियमित विभागीय जांच से छूट हो सकती है, लेकिन उचित दंड चुनने का विवेक सक्षम प्राधिकारी के पास रहता है।
“दोषसिद्धि दंड का निर्धारण नहीं करती”
कोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए कहा कि दोषसिद्धि नियम 19 के तहत कार्रवाई का आधार तो बन सकती है, लेकिन दोषसिद्धि अपने आप यह निर्धारित नहीं करती कि कर्मचारी को कौन-सा दंड दिया जाना चाहिए।
कोर्ट के अनुसार, सक्षम प्राधिकारी को अपराध के पीछे के आचरण, परिस्थितियों और मामले के अन्य प्रासंगिक पहलुओं पर विचार करने के बाद दंड तय करना होगा।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि “a conviction on a criminal charge does not automatically entail dismissal, removal or reduction in rank”—अर्थात आपराधिक मामले में दोषसिद्धि अपने आप बर्खास्तगी, सेवा से हटाने या पदावनति का परिणाम नहीं बनती।
“प्राधिकारी को वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से विचार करना होगा”
हाईकोर्ट ने अपने पुराने फैसले Hanuman Singh v. State of Rajasthan का भी हवाला दिया.
कोर्ट ने कहा कि नियम 19 के तहत कार्रवाई करते समय सक्षम प्राधिकारी को मामले के तथ्यों पर वस्तुनिष्ठ, निष्पक्ष और न्यायपूर्ण तरीके से अपना विवेक लागू करना होगा तथा कारण दर्ज करने होंगे।
वर्तमान मामले में कोर्ट ने कहा कि अधिकारी को याचिकाकर्ता के उस आचरण पर विचार करना चाहिए था जिसके कारण दोषसिद्धि हुई, अपराध किन परिस्थितियों में हुआ, याचिकाकर्ता की भूमिका कितनी गंभीर थी और सेवा में बनाए रखने से संबंधित कौन-कौन से तथ्य प्रासंगिक थे।
इसके बाद ही यह तय किया जाना चाहिए था कि कौन-सा दंड उचित होगा।
बर्खास्तगी आदेश में नहीं बताया गया कि सबसे कठोर दंड क्यों जरूरी था
हाईकोर्ट ने पाया कि 4 जुलाई 2023 का बर्खास्तगी आदेश अत्यंत संक्षिप्त था।
इसमें केवल आपराधिक मामले में दोषसिद्धि का उल्लेख किया गया और यह कहा गया कि संबंधित आचरण के कारण कर्मचारी को सरकारी सेवा में बनाए रखना उचित नहीं है। इसके बाद सीधे बर्खास्तगी का आदेश दे दिया गया।
कोर्ट ने कहा कि आदेश में यह चर्चा नहीं थी कि दोषसिद्धि के पीछे का आचरण क्या था, उसका सरकारी सेवा से क्या संबंध था और ऐसा कौन-सा कारण था जिसके चलते नियम 14 के तहत उपलब्ध अन्य दंडों के बजाय सबसे कठोर दंड—बर्खास्तगी—ही आवश्यक थी।
कोर्ट ने यह भी कहा कि विभाग बाद में हाईकोर्ट के समक्ष दाखिल जवाब में कारण देकर मूल आदेश की कमी को दूर नहीं कर सकता।
वैधानिक विवेक का इस्तेमाल करते समय कारण मूल आदेश में ही दर्ज होने चाहिए।
सरकारी ड्यूटी से अपराध का संबंध भी प्रासंगिक
हाईकोर्ट ने कहा कि रिकॉर्ड के अनुसार जिन अपराधों में याचिकाकर्ता को दोषी ठहराया गया, वे उसके पशु चिकित्सा सहायक के रूप में आधिकारिक कर्तव्यों के निर्वहन के दौरान किए गए कृत्य से संबंधित नहीं थे।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह परिस्थिति याचिकाकर्ता को दोषसिद्धि के परिणामों से मुक्त नहीं करती, लेकिन दंड तय करते समय यह एक प्रासंगिक परिस्थिति थी, जिस पर सक्षम प्राधिकारी को विचार करना चाहिए था।
हाईकोर्ट ने बर्खास्तगी आदेश किया रद्द
कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि विभाग ने दोषसिद्धि को कार्रवाई का आधार मानने के बाद उसी को निर्णय प्रक्रिया का अंतिम बिंदु मान लिया और सीधे अधिकतम दंड—बर्खास्तगी—लगा दी।
सक्षम प्राधिकारी ने यह निर्धारित करने की वैधानिक प्रक्रिया पूरी नहीं की कि मामले की परिस्थितियों में कौन-सा दंड उचित था।
हाईकोर्ट ने माना कि बर्खास्तगी आदेश विवेक के उचित प्रयोग का अभाव, कारणों की अनुपस्थिति और नियम 14 के साथ पढ़े गए नियम 19(i) के तहत उपलब्ध विवेकाधिकार का सही तरीके से इस्तेमाल नहीं किए जाने के कारण टिकाऊ नहीं है।
50 प्रतिशत बैक वेज, नए सिरे से कार्रवाई की स्वतंत्रता
हाईकोर्ट ने 4 जुलाई 2023 का बर्खास्तगी आदेश रद्द कर दिया। हालांकि, मामले की परिस्थितियों और “No Work No Pay” के सिद्धांत को ध्यान में रखते हुए याचिकाकर्ता को केवल 50 प्रतिशत पिछला वेतन देने का आदेश दिया।
साथ ही कोर्ट ने राज्य के सक्षम प्राधिकारी को नियम 19(i) के तहत मामले पर नए सिरे से विचार करने की स्वतंत्रता दी है।
नए सिरे से विचार करते समय दोषसिद्धि के फैसले, उस दोषसिद्धि का कारण बने आचरण तथा अपराध की प्रकृति और गंभीरता को ध्यान में रखना होगा।
सक्षम प्राधिकारी को नियम 14 और नियम 19(i) के अनुसार यह तय करना होगा कि कोई दंड लगाया जाना चाहिए या नहीं और यदि दंड लगाया जाना है तो मामले के आचरण एवं परिस्थितियों के अनुरूप कौन-सा दंड उचित होगा।
नया आदेश कारणयुक्त और स्पष्ट (speaking order) होना चाहिए। यह पूरी प्रक्रिया प्रमाणित आदेश की प्रति प्राप्त होने की तारीख से अधिमानतः तीन माह के भीतर पूरी करने के निर्देश दिए गए हैं।
हाईकोर्ट ने दोषसिद्धि पर कोई राय नहीं दी
महत्वपूर्ण रूप से हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि वर्तमान निर्णय को याचिकाकर्ता की आपराधिक दोषसिद्धि की सही या गलत होने के संबंध में किसी निष्कर्ष के रूप में नहीं माना जाएगा।
आपराधिक अपील अभी लंबित है और हाईकोर्ट द्वारा पहले केवल सजा निलंबित की गई थी, दोषसिद्धि नहीं।