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22 साल तक फरार रहे कैदी की पैरोल याचिका खारिज करने का आदेश रद्द, जिला पैरोल समिति को नए सिरे करना होगा विचार-राजस्थान हाईकोर्ट का पैरोल पर बड़ा फैसला:

Life Sentence in Murder Case: Rajasthan High Court Rejects Plea for Suspension of Sentence, Says Exceptional Circumstances Needed

जोधपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने पैरोल से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में जिला पैरोल समिति द्वारा बिना कारण बताए पैरोल आवेदन खारिज करने के आदेश को निरस्त कर दिया है।

हालांकि अदालत ने अपने आदेश में यह भी स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ता द्वारा करीब 22 वर्षों तक फरार रहना 1958 के पैरोल नियमों के लाभ का गंभीर दुरुपयोग था।

इसके बावजूद, समिति द्वारा आवेदन खारिज करते समय कोई कारण दर्ज नहीं किया गया था।

जस्टिस विनीत कुमार माथुर और जस्टिस चंद्र शेखर शर्मा की खंडपीठ ने लाल सिंह की ओर से दायर याचिका पर आदेश दिया हैं.

7 दिन की पैरोल के लिए दायर की थी याचिका

याचिकाकर्ता जैसलमेर जिला निवासी लाल सिंह वर्तमान में केंद्रीय कारागार, जोधपुर में बंद है।

उसकी पत्नी शोभा कंवर के माध्यम से हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई थी।

याचिका में राजस्थान कैदी पैरोल पर रिहाई नियम, 1958 के तहत सात दिन की पैरोल दिए जाने की मांग की गई थी।

याचिकाकर्ता के अधिवक्ताओं ने अदालत को बताया कि लाल सिंह वर्ष 1997 के एक सत्र प्रकरण में हुई सजा के बाद जेल में है और नियमों के तहत सात दिन की पैरोल के लिए पात्र है।

जेल अधीक्षक ने भी 1958 के नियमों के नियम 18 के तहत उसकी पैरोल की सिफारिश की थी।

जिला पैरोल समिति ने बिना कारण आवेदन कर दिया था खारिज

जेल अधीक्षक की सिफारिश के बावजूद जिला पैरोल समिति ने 13 मई 2026 की बैठक में सात दिन की पैरोल का आवेदन खारिज कर दिया।

याचिकाकर्ता की ओर से हाईकोर्ट में मुख्य आपत्ति यह थी कि समिति ने आवेदन खारिज करते समय कोई कारण दर्ज नहीं किया, यानी आदेश एक non-speaking order था।

22 साल रहा फरार

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता दीपक चौधरी ने पैरोल का विरोध किया।

उन्होंने अदालत को बताया कि लाल सिंह को 7 दिसंबर 2001 को 30 दिनों की दूसरी पैरोल पर रिहा किया गया था, लेकिन पैरोल अवधि समाप्त होने के बाद वह वापस जेल नहीं लौटा और करीब 22 वर्षों तक फरार रहा।

सरकार के अनुसार, इस संबंध में रातानाडा पुलिस थाना, जोधपुर में एफआईआर दर्ज की गई थी। करीब 22 वर्ष बाद उसे 13 अप्रैल 2024 को गिरफ्तार किया जा सका।

राज्य की ओर से यह भी बताया गया कि फरारी की इस अवधि के दौरान उसके खिलाफ 14 आपराधिक मामले दर्ज हुए थे।

सरकार ने इन्हीं परिस्थितियों के आधार पर जिला पैरोल समिति के फैसले को उचित बताया।

AAG ने भी माना-खारिज आदेश में कारण दर्ज नहीं

सुनवाई के दौरान अतिरिक्त महाधिवक्ता ने यह स्वीकार किया कि 13 मई 2026 के आदेश में पैरोल आवेदन खारिज करने के कारण दर्ज नहीं किए गए थे।

उन्होंने अदालत से आग्रह किया कि मामले को 1958 के नियमों के अनुसार पुनः विचार के लिए जिला पैरोल समिति के पास भेजा जाए और समिति को कारणयुक्त एवं speaking order पारित करने का आदेश दिया जाए।

हाईकोर्ट ने कहा-पैरोल नियम कल्याणकारी कानून

खंडपीठ ने 1958 के पैरोल नियमों के उद्देश्य पर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की।

अदालत ने कहा कि ये नियम कल्याणकारी प्रकृति के हैं, जिनका उद्देश्य लंबे समय से कारावास में रह रहे कैदियों और उनके परिवारों के बीच टूटे सामाजिक एवं पारिवारिक संबंधों को फिर से मजबूत करने और परिवार से जुड़े मुद्दों के समाधान में सहायता करना है।

22 साल की फरारी को कोर्ट ने माना पैरोल लाभ का गंभीर दुरुपयोग

हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता के आचरण को लेकर भी स्पष्ट टिप्पणी की।

खंडपीठ ने कहा कि याचिकाकर्ता 22 वर्षों से अधिक समय तक फरार रहा, इसलिए यह 1958 के नियमों के तहत दिए गए लाभों के स्पष्ट दुरुपयोग का मामला है।

इसके बावजूद अदालत ने कहा कि जिला पैरोल समिति का आदेश non-speaking होने के कारण याचिका स्वीकार किए जाने योग्य है।

खारिज आदेश रद्द, नए सिरे से आवेदन का मौका

हाईकोर्ट ने 13 मई 2026 को जिला पैरोल समिति द्वारा पारित आदेश को निरस्त कर दिया।

अदालत ने याचिकाकर्ता को जिला पैरोल समिति के समक्ष सात दिन की पैरोल के लिए नया आवेदन प्रस्तुत करने की स्वतंत्रता दी है।

अदालत ने साथ ही आदेश दिया कि यदि याचिकाकर्ता नया आवेदन दाखिल करता है, तो जिला पैरोल समिति कानून के अनुसार उसके मामले पर पुनः विचार करे और कारणयुक्त आदेश पारित करे।

समिति को यह भी आदेश दिया गया कि वह हाईकोर्ट की ओर से की गई टिप्पणियों से प्रभावित हुए बिना मामले का निर्णय करे।

पैरोल मंजूर नहीं हुई, केवल नए सिरे से विचार का रास्ता खुला

इस आदेश का महत्वपूर्ण पहलू यह है कि हाईकोर्ट ने लाल सिंह को सात दिन की पैरोल मंजूर नहीं की है।

अदालत ने केवल जिला पैरोल समिति के बिना कारण वाले आदेश को रद्द करते हुए नए आवेदन पर कानून के अनुसार पुनर्विचार का रास्ता खोला है।

अब यदि याचिकाकर्ता नया आवेदन प्रस्तुत करता है, तो जिला पैरोल समिति को 1958 के नियमों के तहत उसके मामले पर दोबारा विचार कर कारणयुक्त आदेश पारित करना होगा।

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